एक ऐसा बिहारी नेता जिसने भारतीय राजनीती और दलित समाज को नयी दिशा प्रदान की

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तुल न सके धरती धन धाम,
धन्य तुम्हारा पावन नाम,
लेकर तुम सा लक्ष्य ललाम,
सफल काम जगजीवन राम।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की देश के विख्यात राजनेता जगजीवन राम के बारे में कही गयी ये पंक्तियां उनके व्यक्तित्व का प्रतिबिंब हैं। आजादी के बाद भारतीय राजनीति में ऐसे कम ही नेता रहे हैं जिन्होंने न केवल मंत्री के रूप में अकेले कई मंत्रालयों की चुनौतियों को स्वीकारा बल्कि उन चुनौतियों को अंतिम अंजाम तक पहुंचाया. आधुनिक भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष रहे जगजीवन राम को मंत्री के रूप में जो भी विभाग मिला उन्होंने अपनी प्रशासनिक दक्षता से उसका सफल संचालन किया.

जगजीवन राम का एक ऐसा व्यक्तित्व था कि जो वह एक बार ठान लेते थे उसे पूरा करके ही छोड़ते थे. उनमें संघर्ष का जबरदस्त माद्दा था. चुनौतियों का सामना करना उन्हें भाता था. उनके व्यक्तित्व ने अन्याय से कभी समझौता नहीं किया. वह हमेशा दलितों के सम्मान के लिए संघर्षरत रहे.

जगजीवन राम का जन्म

एक दलित परिवार में जन्म लेकर राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर छा जाने वाले बाबू जगजीवन राम का जन्म बिहार की उस धरती पर हुआ था जिसकी भारतीय इतिहास और राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल, 1908  को बिहार के शाहाबाद जिले (वर्तमान भोजपुर जिला ) के एक छोटे से गांव चंदवा में शोभी राम और वसंती देवी के यहां हुआ था। जगजीवन राम को आदर्श मानवीय मूल्य और सूझबूझ  अपने पिता से विरासत में मिली जो धार्मिक प्रविृति के थे । जब वे विद्यालय में ही थे तब उनके पिता का स्वर्गवास हो गया और उनका पालन-पोषण उनकी माता जी को करना पड़ा।

जगजीवन राम की शिक्षा 

जगजीवन राम को उस समय अस्पृश्यता की दर्दनाक वेदना झेलनी पड़ी, जब उस स्कूल में अछूत जातियों के लिए उन्होंने अलग घड़े से पानी पीने की व्यवस्था देखी। आक्रोशित होकर उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार वह घड़ा फोड़ा। अंततः स्कूल के प्रधानाचार्य ने यह व्यवस्था दी कि जगजीवन भी उसी घड़े से पानी पिएंगे और जिसे एतराज हो, वह अपनी पृथक व्यवस्था स्वयं करे। एक मेधावी छात्र के रूप में जगजीवन प्रत्येक कक्षा में छात्रवृत्ति लेकर पढ़े और वैज्ञानिक बनने का सपना संजोये रहे, परंतु तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें देश की आजादी ज्यादा जरूरी लगी और वे भी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

बाबूजी ने वर्ष 1920 में आरा स्थित अग्रवाल विद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु प्रवेश लिया | आयु वृद्धि के साथ ही उनमें परिपक्वता का भी समावेश हो रहा था | उनकी विदेशी भाषाओं को समझने व सीखने की जिज्ञासा के बल पर उन्होंने अंग्रेज़ी में निपुणता हासिल की, साथ ही माननीय श्री बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रचित ‘आनंद मठ’ की मूल पुस्तक (जो बांगाली में लिखित है) को पढ़ने के लिए बांगाली तक सीख गए | वे अंग्रेज़ी व बांगाली के साथ-साथ हिंदी व संस्कृत में भी माहिर थे | 1925 में पंडित मदन मोहन मालवीय जब आरा पधारे तो वे युवा जगजीवन के व्यापक ज्ञान व सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन को देखकर अचंभित रह गए तथा उन्हें तभी आभास हो गया कि ये किशोर भविष्य में देश की आज़ादी व राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभा सकता है | उन्होंने युवा जगजीवन से स्वयं मुलाकात की व बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आने का निमंत्रण दिया | परन्तु जगजीवन राम को वहाँ जाति के आधार पर भेद भाव झेलना पड़ा | क्रांतिकारी स्वाभाव के जगजीवन ने इसका खुल कर विरोध किया और वे सफल भी हुए | आतंरिक विज्ञान परीक्षा में वे उत्तम अंकों से उत्तीर्ण हुए व वर्ष 1931 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक में उच्चतम अंकों से उत्तीर्ण हुए |

दलित वर्ग के लिए उठाई आवाज 

जगजीवन राम ने अनेक रविदास सम्मेलन आयोजित किए थे और कलकत्ता (कोलकाता) के विभिन्न भागों में गुरू रविदास जयंती मनाई थी। वर्ष 1934 में, आपने कलकत्ता में अखिल भारतीय रविदास महासभा और अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग की स्थापना की। इन संगठनों के माध्यम से आपने दलित वर्गों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल किया। आपका विचार था कि दलित नेताओं को न केवल समाज सुधार के लिए संघर्ष करना चाहिए बल्कि राजनीतिक, प्रतिनिधित्व की मांग भी करनी चाहिए। अगले वर्ष अर्थात 19 अक्तूबर, 1935 में बाबूजी रांची में हेमंड आयोग के समक्ष उपस्थित हुए और आपने पहली बार दलितों के लिए मतदान के अधिकार की मांग की।

अंग्रजो से मिलने से किया साफ इंकार 

28 साल की उम्र में ही 1936 में उन्हें बिहार विधान परिषद् का सदस्य नामांकित कर दिया गया था। जब गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत 1937 में चुनाव हुए तो बाबूजी डिप्रेस्ड क्लास लीग के उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध एमएलए चुने गए। अंग्रेज बिहार में अपनी पिट्ठू सरकार बनाने के प्रयास में थे। उनकी कोशिश थी कि जगजीवन राम को लालच देकर अपने साथ मिला लिया जाए। उन्हे मत्री पद और पैसे का लालच दिया गया, लेकिन जगजीवन राम ने अंग्रेजों का साथ देने से साफ इनकार कर दिया। उसके बाद ही बिहार में काग्रेस की सरकार बनी, जिसमें वह मत्री बने। साल भर के अंदर ही अंग्रेजों के गैरजिम्मेदार रुख के कारण महात्मा गांधी की सलाह पर काग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया। बाबूजी इस काम में सबसे आगे थे। पद का लालच उन्हें छू तक नहीं गया था।

आजादी की लड़ाई में सक्रियता

 

बाबू जगजीवन राम ने स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। गांधीजी से प्रेरणा पाकर बाबूजी ने 10 दिसम्बर, 1940 को अपनी गिरफ्तारी दी। रिहा होने के बाद, आपने सविनय अवज्ञा आंदोलन और सत्याग्रह में सक्रिय रूप से भाग लिया। बाबूजी को इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा आरंम्भ किए गए भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए 19 अगस्त, 1942 को पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और बाबूजी का पांच दशक से भी अधिक का लंबा और उत्कृष्ट राजनीतिक जीवन था।

मंत्री के रूप में लंबा कार्यकाल

बाबू जगजीवन 1952 से 1984 तक लगातार सांसद चुने गए. वह सबसे लंबे समय तक (लगभग 30 साल) देश के केंद्रीय मंत्री रहे. पहले नेहरू के मंत्रिमंडल में, फिर इंदिरा गांधी के कार्यकाल में और अंत में जनता सरकार में उप प्रधानमंत्री के रूप में. केंद्र सरकार में अपने लंबे कॅरियर के दौरान उन्होंने श्रम, कृषि संचार रेलवे और रक्षा जैसे अनेक चुनौतीपूर्ण मंत्रालयों का जिम्मा संभाला. उन्होंने श्रम के रूप में मजदूरों की स्थिति में आवश्यक सुधार लाने और उनकी सामाजिक आर्थिक सुरक्षा के लिए विशिष्ट कानून के प्रावधान किए जो आज भी हमारे देश की श्रम नीति का मूलाधार है.

दलित समाज के मसीहा

जगजीवन राम को भारतीय समाज और राजनीति में दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है. वह स्वतंत्र भारत के उन गिने चुने नेताओं में से एक थे जिन्होंने राजनीति के साथ ही दलित समाज के लिए नई दिशा प्रदान की. उन्होंने उन लाखों-करोड़ो दमितों की आवाज उठाई जिन्हें सवर्ण जातियों के साथ चलने की मनाही थी, जिनके खाने के बर्तन अलग थे, जिन्हें छूना पाप समझा जाता था और जो हमेशा दूसरों की दया के सहारे रहते थे. पांच दशक तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे जगजीवन राम ने अपना सारा जीवन देश की सेवा और दलितों के उत्थान के लिए अर्पित कर दिया.

 

जगजीवन बाबु की शादी 

जून, 1935 में बाबूजी का विवाह इंद्राणी देवी से हुआ था। इंद्राणी देवी स्वयं एक स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद थीं। उनके पिता डा. बीरबल एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे और उन्होंने ब्रिटिश सेना में कार्य किया था तथा 1889-90 में चीन-लुशई युद्ध में उनकी सेवाओं के लिए तत्कालीन वायसराय लार्ड लैंसडाउन द्वारा उन्हें विक्टोरिया मैडल से सम्मानित किया गया था। 17 जुलाई, 1938 को उनके पुत्र सुरेश कुमार और 31 मार्च, 1945 को पुत्री मीरा कुमार का जन्म हुआ। 21 मई, 1985 को सुरेश कुमार का निधन हो गया जिससे आपके माता-पिता को अत्यंत आघात पहुंचा। मीरा कुमार भारत की  पहली महिला लोकसभाध्यक्ष है |

आपातकाल व नयी शुरुआत

25 जून 1975 को श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा देश भर में आपातकाल की घोषणा कर दी गयी | इस आपातकाल ने संविधान के मौलिक अधिकारों को सवालों के घेरे में ला दिया | श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 18 जनवरी 1977 को आम चुनाव की घोषणा तो कर दी थी किन्तु देश को आपातकाल का डर था | इस परिस्थिति से निपटने के लिए बाबूजी ने अपने पद का त्याग कर दिया व कांग्रेस पार्टी से भी इस्तीफ़ा दे दिया | उन्होंने उसी दिवस ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ (सी.एफ़.डी.) नामक एक नयी पार्टी की रचना की | वर्ष 1977 के आम चुनावों में बाबूजी की विजय हुई व उन्हें रक्षा मंत्रालय का दायित्व दिया गया | 25 मार्च 1977 को कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी, जनता पार्टी में सम्मिलित कर ली गयी | जनवरी 1979 में बाबूजी भारत वर्ष के उपप्रधानमंत्री के रूप में घोषित किये गए | वर्ष 1980 में जनता पार्टी का आपसी मनमुटावों के कारण बंटवारा हो गया एवं बाबूजी ने मार्च 1980 में अंततः कांग्रेस (जे) का निर्माण किया | वर्ष 1984 के आम चुनावों में सासाराम की जनता ने अपने विश्वनीय प्रतिनिधि बाबू जगजीवन राम के लिए एक बार पुनः लोकसभा के द्वार खोल दिए |

जगजीवन बाबु के बारे में लोगो की राय

डॉ अंबेडकर ने जगजीवन राम के बारे में कहा था-‘बाबू जगजीवन राम भारत के चोटी के विचारक, भविष्यदृष्टा और ऋषि राजनेता हैं जो सबके कल्याण की सोचते हैं।’ जगजीवन राम ने आरंभ से ही समाज के पद्दलित लोगों के अधिकार और सम्मान के लिए अथक संघर्ष किया। सुभाष चंद्र बोस ने उस समय कहा था-‘जगजीवन राम ने जिस ढंग से श्रमिक व हरिजन सुधार आंदोलन का संगठन किया है, वह सभी के लिए अनुकरणीय है।

निधन

6 जुलाई, 1986 को 78 साल की उम्र में इस महान् राजनीतिज्ञ का निधन हो गया। बाबू जगजीवन राम को भारतीय समाज और राजनीति में दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है। वह स्वतंत्र भारत के उन गिने चुने नेताओं में थे जिन्होंने देश की राजनीति के साथ ही दलित समाज को भी नयी दिशा प्रदान की।

 

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