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SONAL MAN SINGH BIOGRAPHY IN HINDI

सोनल मानसिंह प्रसिद्ध नृत्यांगना


(SONAL MAN SINGH)


यह कहानी एक ऐसे साहसिक लड़की की है जिसने परिस्थितियों आगे अपने घुटने नहीं टेके | जिस लड़की के लिए नृत्य ही जिंदगी थी  उसे एक बार लगा की वह कभी नृत्य ही नहीं कर पायेगी | एक दुर्घटना में उसे अपनी रीढ़ की हड्डी गवानी पड़ी और उसके शारीर पर पैरालीसिस का भी खतरा मंडरा रहा  था | फिर भी उसने हौसला नहीं हारा और इन सबसे उबर कर कैसे उसने फिर से स्टेज की और रुख किया ,जानिए सोनल मानसिंह की कहानी 

Sonal Mansingh


घरवाले चाहते थे मै वकील बनू 

मुंबई के एल्फीन्स्टन कॉलेज की मेरी पढ़ाई 1963 में खत्म होने के बाद घर पर सभी लोग चाहते थे कि मैं मास्टर्स करने के लिए जर्मनी चली जाऊं। पिताजी, मां, दादा, हर कोई यही कहता था कि जर्मनी जाकर पढ़ाई पूरी करो। दादाजी काफी प्रतिष्ठित वकील थे, इसलिए इस बात पर जोर था कि वकालत कर लो। मैं किसी सूरत में वकालत नहीं करना चाहती थी। आखिरकार एक रोज मैंने कह ही दिया- ‘मैं वकालत नहीं करूंगी। मेरे वश का नहीं है कि अदालत में खड़ी होकर मैं मी लॉर्ड करती रहूं’। वकालत से पीछा छूटा, तो दूसरी परेशानी आ गई। परिवार मेरी शादी के लिए पीछे पड़ गया। बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी। मेरे लिए भी ढेरो रिश्ते आ रहे थे। एक रोज मैंने खुलकर कहा कि मुझे शादी नहीं करनी है। घरवाले चौंक गए। उन्होंने पूछा कि वकालत नहीं करनी है, शादी नहीं करनी है, तो फिर क्या करना है? मैंने पूरी हिम्मत से जवाब दिया-मुझे डांस करना है। घरवालों का जवाब मिला- शादी कर लो, डांस भी करती रहना। मैंने कहा, ‘मुझे डांस भी नहीं करना, मुझे डांस ही करना है’।

डांस का बचपन से था शौक 

डांस का शौक मुझे बचपन से था। कुछ बड़ी होने पर मैंने बेंगलुरु में प्रोफेसर यूएस कृष्णराव और उनकी पत्नी चंद्रभागा देवी से नृत्य सीखना शुरू किया। वे दोनों भारतीय नृत्य की बहुत बड़ी शख्सियत थे। गुरुजी को मेरे डांस में हर चीज खूब भाती थी, लेकिन वह चाहते थे कि मैं भाव पक्ष को लेकर और मेहनत करूं। उस वक्त मैं 1961 में ‘अरंगेत्रम’ की आखिरी तैयारियों में लगी हुई थी। जून का महीना था। बहुत गरमी भी थी। इसकी वजह से मेरे चेहरे पर शायद वैसे भाव नहीं आ रहे थे, जैसा गुरुजी चाहते थे। एक रोज उनके घर के बाहर एक मदारी आया। गुरुजी ने मुझे बुलाया। उन्होंने बंदरों की तरफ दिखाते हुए पूछा कि ‘ये क्या है’? मैंने जवाब दिया- ‘बंदर-बंदरिया डांस कर रहे हैं गुरुजी। गुरुजी ने तत्तकली दिखाते हुए कहा- ‘शो मी द डिफरेंस बिटवीन मंकी ऐंड यू’। उनकी बात समझ में आ गई। यही वाकया मेरी जिंदगी को परिभाषित करने वाला रहा। दक्षिण भारत की नृत्य विधाओं में गुरु छोटी मजबूत लकड़ी को बजाकर लय विन्यास सिखाते हैं। उसे तत्तकली कहा जाता है। शिष्य की अंगशुद्धि के लिए इससे पिटाई भी की जाती है। 

घर से भी भागी 

इसके बाद साल 1961 में उन दोनों के निर्देशन में राजभवन में मेरा ‘अरंग्रेत्रम’ हुआ। मेरे दादाजी मंगलदास पक्कासा उन दिनों मैसूर के राज्यपाल थे। देविका रानी, उनके पति चित्रकार रोरिक, मैसूर के महाराजा, दक्षिण के जाने-माने कला आलोचक और तमाम गुरुगणों ने एक आवाज में मेरी प्रशंसा की, जिससे मेरे भीतर इस मार्ग पर आगे बढ़ने का साहस बढ़ा, और उत्कंठा बढ़ी। अगले दो साल में मैंने जर्मन साहित्य में मुंबई से स्नातक ऑनर्स पूरा किया। लेकिन नृत्य को लेकर मेरी जिद की वजह से घर पर लगभग सभी लोग मुझसे नाराज थे, खासकर मेरी मां। साल 1963 में मैंने एक दिन स्कॉलरशिप के पैसे लिए और बगैर किसी से कुछ बोले घर छोड़ दिया। कहीं से बस पकड़ी, कहीं से ट्रेन ली और सीधे बेंगलुरु पहुंच गई। जब गुरुजी के घर पहुंची, तो वह फिल्म देखने गए थे। मैं बाहर ही बैठकर उनका इंतजार करती रही। वह वापस लौटे, तो उनकी गाड़ी की रोशनी मेरे ऊपर पड़ी। उन्होंने पूछा- वहां कौन है? मैंने कहा- सोनल। फिर मैंने उन्हें पूरा किस्सा बताया। उन्होंने ही सबसे पहले मेरे घर पर जानकारी दी कि मैं सुरक्षित हूं। इसके बाद तो मैंने अपना जीवन ही डांस के नाम कर दिया। 

उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती

उस दिन को मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती। तारीख थी 24 अगस्त, 1974। जर्मनी के बैरुथ में मैं अंतरराष्ट्रीय युवा महोत्सव के विद्यार्थियों को भरतनाट्यम का प्रशिक्षण दे रही थी। मैं अपने मंगेतर जॉर्ज लैश्नर के साथ कार से जा रही थी। रात का वक्त था। सड़क बारिश से भीगी हुई थी। हम जिस ‘बीटल फॉक्सवैगन’ में थे, उसमें डिक्की आगे होती थी और इंजन पीछे, यानी कार आगे से हल्की थी। उन दिनों सीट बेल्ट नहीं होती थी। रास्ता बिल्कुल सुनसान था। कार की रफ्तार सौ किलोमीटर प्रति घंटे के करीब रही होगी। अचानक लैश्नर को कार के सामने एक हिरन दिखाई दिया। उन्होंने उसे बचाने के लिए पूरी ताकत से ब्रेक लगाई। हमारी कार ने तीन बार गुलाटियां खाई और पलट गई। मैं कार से बाहर करीब 12-15 फीट दूर जाकर गिरी। उस वक्त मैं हिलने-डुलने या चिल्लाने तक के लायक नहीं थी। 

मेरी रीढ़ की हड्डी और चार पसलियां टूटी 

कुछ देर बाद लोगों ने मेरे मुंह पर पानी छिड़का। मुझे बहुत ठंड लग रही थी।  मैंने बुदबुदाते हुए कहा कि मुझे कुछ ओढ़ने के लिए चाहिए। इतनी देर में पुलिस आ गई। थोड़ी देर बाद एंबुलेंस आई। मेल नर्सेस ने उठाया। मुझे अस्पताल पहुंचाया गया। वह म्यूनिसिपल अस्पताल था। सबसे पहले मुझे दर्द कम करने के लिए कुछ इंजेक्शन दिए गए और इसके बाद तुरंत एक्स-रे के लिए भेज दिया गया। मेरे एक्स-रे से पता चला कि चोट कितनी गंभीर थी। मेरी रीढ़ की हड्डी, गले के पास की हड्िडयां और चार पसलियां टूट चुकी थीं। इनके अलावा और भी कई चोटें थीं। रीढ़ की हड्डी की बारहवीं कड़ी टूटकर चकनाचूर हो गई थी। उस बुरे वक्त में राहत की खबर बस इतनी थी कि रीढ़ की हड्िडयों को आपस में जोड़ने वाला सूत्र बच गया था। चोट की गंभीरता को देखते हुए उस अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि मुझे यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक ले जाया जाए, क्योंकि वहां इलाज का इंतजाम बेहतर था। मेरा एक्सीडेंट पेग्नीत्स शहर में हुआ था, जबकि यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक दूसरे शहर एरलांगन में थी।   

टॉर्च की रोशनी से  मुझे ढूंढा गया 

लैश्नर मुझे वहां से लेकर यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक गए। मैं होश में तो थी, मगर बेतहाशा दर्द में थी। रास्ते में उन्होंने बताया कि एक्सीडेंट के बाद वह सीट और स्टीयरिंग के बीच फंस गए थे। उन्होंने पहले मुझे कार के भीतर ढूंढ़ा, लेकिन वहां मैं नहीं दिखाई दी, तो वह बहुत घबरा गए थे। तभी एक कार वहां आकर रुकी और फिर सबने मिलकर मुझे ढूंढ़ा। मुझे ढूंढ़ने के लिए टॉर्च की रोशनी का सहारा लिया गया।  

तीन दिनों तक मुझे ‘फोम रबर’ पर रखा

एरलांगन में यूनिवर्सिटी सर्जिकल क्लीनिक में तीन दिनों तक डॉक्टरों ने मुझे ‘फोम रबर’ पर रखा और इलाज की प्रक्रिया के बारे में वे सलाह-मशविरा करते रहे। उनके लिए ‘स्पाइनल कॉर्ड’ से ज्यादा बड़ी मुसीबत थी खून का जमना। मेरी रीढ़ की हड्डी के पास बहुत सा खून जम गया था, जो रीढ़ पर दबाव बना रहा था। डॉक्टरों का मानना था कि अगर इसका तुरंत हल नहीं निकाला गया, तो मुझे ‘पैरालिसिस’ हो जाएगा। मेरे शरीर की तमाम मांसपेशियों में हरकत खत्म हो जाएगी। फिर उन्होंने तय किया कि वे मेरा ऑपरेशन करेंगे। ऑपरेशन के बाद मेरी रीढ़ की हड्डी को स्टील के रॉड से टिका दिया जाएगा, ताकि रीढ़ की हड्डी को सहारा मिल सके। ऐसा करके वे मुझे ‘पैरालिसिस’ से बचा सकते थे। मैं दवाई की वजह से हल्की बेहोशी में थी, पर ऑपरेशन की बात सुनते ही मैंने इशारे से मना किया। लैश्नर ने मेरे इशारे को समझ लिया। उसने डॉक्टरों से गुजारिश की कि ऑपरेशन को आखिरी विकल्प की तरह देखा जाए। डॉक्टरों ने भी लैश्नर की बात मान ली। बगैर ऑपरेशन मेरा इलाज शुरू किया गया। ऊपर वाले की दया से मेरे शरीर की सूजन अगले दो दिनों में कम हो गई।

चार किलो प्लास्टर कास्ट में मेरे आधे शरीर को बांध गया 

उसके बाद का इलाज आज भी याद करूं, तो सिहरन सी होती है। शरीर की सूजन कम होने के बाद मुझे प्लास्टर वाले कमरे में ले जाया गया। मुझे पट्टों की मदद से उलटा लटकाया गया। मेरी ठुड्डी के नीचे एक टेबल थी और दूसरी टेबल घुटनों के नीचे। शरीर के बीच का पूरा हिस्सा हवा में लटका हुआ था। इसके बाद डॉक्टर हवा में लटके उस हिस्से को दबा-दबाकर इस बात की जांच करते थे कि दर्द कहां-कहां हो रहा है। फिर मेरे पूरे शरीर को प्लास्टर के घोल में डूबी रूई की कई परतों में लपेट दिया गया। बेतहाशा दर्द हो रहा था। डॉक्टरों ने इस प्लास्टर को बांधने के दौरान अगल-बगल रूई की मोटी परतें लगा दी थीं। ऐसा इसलिए कि दर्द की हालत में अगर मैं हिलूं, तो नुकसान न हो। पूरी प्रक्रिया में कोई एक घंटे का वक्त लगा होगा। मैं दर्द में छटपटाती हुई डॉक्टरों को यह सब करते सिर्फ देख रही थी। जिस प्लास्टर कास्ट में मेरे आधे शरीर को बांध दिया गया था, वह कम से कम चार किलो का था। एक घंटे के बाद मुझे उस कमरे से बाहर निकाला गया। वहां से बाहर आने के बाद डॉक्टरों ने लैश्नर से सिर्फ इतना कहा कि सोनल दो वर्ष के बाद ही ठीक से चल-फिर सकेंगी, लेकिन नृत्य का ख्याल छोड़ना पड़ेगा।

 जिंदगी रुक-सी गई

बगैर ऑपरेशन मेरा इलाज तो कर दिया गया, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि फिलहाल मेरे घुटने, एड़ी, कोहनी और पांव के पंजे में मुड़ने की ताकत या लचक खत्म हो गई है। उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा कि लचक धीरे-धीरे लौटेगी, लेकिन इसमें अच्छा-खासा वक्त लगेगा। मुझे भी बहुत मेहनत करनी होगी। 12 दिनों तक मैं अस्पताल में वैसे ही पड़ी रही। ऐसा लग रहा था कि जैसे जिंदगी रुक-सी गई है। फिर डॉक्टरों ने लैश्नर से कहा कि वह मुझे मॉ्ट्रिरयल ले जा सकते हैं। लेकिन पूरे रास्ते पीठ के बल ही लेटकर जाना होगा। लैश्नर वहां गॉथे जर्मन इंस्टीट्यूट के निदेशक थे। फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर उस रोज हम एंबुलेंस से पहुंचे। लेकिन फ्लाइट के कैप्टन ने मुझे विमान में ले जाने से मना कर दिया। उसने कहा कि मरीज की हालत ऐसी नहीं है कि उसे हवाई सफर कराया जाए। लैश्नर ने बहुत ‘रिक्वेस्ट’ की, लेकिन कैप्टन नहीं माना। आखिर कैप्टन को राजी करने के लिए लैश्नर ने मुझसे कहा कि मैं फ्लाइट की सीढि़यों पर चढ़कर उसे दिखा दूं। मैंने लैश्नर के कंधे का सहारा लेते हुए फ्लाइट की लगभग 30 सीढ़ियां चढ़कर दिखा भी दी, लेकिन कैप्टन पर कोई असर नहीं पड़ा। आखिर में उसने कहा कि अगर मुझे फ्लाइट में जाना है, तो किसी डॉक्टर का सर्टिफिकेट चाहिए होगा। लैश्नर ने एक कागज पर सर्टिफिकेट बनाया और अपने ही साइन करके लिखा- डॉक्टर जॉर्ज लैश्नर। इसके बाद फ्लाइट कैप्टन ने मुझे यात्रा करने की मंजूरी दी। मजे की बात यह है कि लैश्नर के पास मेडिकल सांइस में नहीं, फिलॉसफी में डॉक्टरेट की उपाधि थी।

नृत्य न करने के ख्याल से आंखों से नींद गायब हो गई

जब मैं मॉ्ट्रिरयल पहुंची, तो मित्र मंडल में खबर फैल गई। तमाम लोग मुझसे मिलने आए। आने-जाने वालों में से किसी ने लैश्नर को बताया कि वह मुझे डॉक्टर पियेर ग्रावेल को दिखाएं। पियेर ग्रावेल ने मेरी शुरुआती जांच के बाद कहा कि वह मेरे बारे में कोई भी बात तभी कह सकते हैं, जब वह मेरे इलाज की सारी रिपोर्ट्स की ‘स्टडी’ कर लेंगे। पूरी प्रक्रिया के दौरान मुझे यह तो भरोसा था कि मैं ठीक हो जाऊंगी, लेकिन मेरा डर इस बात को लेकर था कि मैं दोबारा नृत्य कर पाऊंगी या नहीं? मैं अपने पैरों में घुंघरू बांध पाऊंगी या नहीं? यह नृत्य ही था, जिसके लिए मैंने अपना घर छोड़ दिया था। यह नृत्य ही था, जिसके लिए मैं अपने पहले पति से अलग हुई थी। मैं लेटे-लेटे सिर्फ छत की ओर देखा करती थी। मेरी आंखों से नींद गायब हो गई थी। भूख खत्म हो चुकी थी।

आशा की एक किरण 

फिर एक दिन पियेर ग्रावेल ने मेरी सारी मांसपेशियों को जांचने के बाद बड़ी ही गंभीरता के साथ कहा- सोनल, मुझे डर है कि... इतना कहने के बाद ग्रावेल चुप हो गए। उनकी चुप्पी भर से मैं निराशा के सागर में डूब गई। मैं रो पड़ी। फिर कुछ देर बाद लगा कि कहीं दूर से आवाज आ रही है कि तुम दोबारा नृत्य करोगी। उनके इतना कहने के बाद तो कमरे में सभी के हाव-भाव ही बदल गए। लैश्नर और उसके इंस्टीट्यूट के साथियों ने ताली बजाते-बजाते जैसे छत को उड़ा दिया। मैं रो रही थी, पर मेरा मन थिरक रहा था। मैंने डॉक्टर ग्रावेल को फिर से इसी वाक्य को दोहराने के लिए कहा। उन्होंने जैसे ही दोबारा यह बात कही, मुझे लगा कि जैसे कमरे में इंद्रधनुष के तमाम रंग बिखर गए हों। 

फिर से पहुची स्टेज पर 

इसके बाद अगले छह महीने तक जबर्दस्त मेहनत का दौर चला। फिर वह दिन भी आया, जब मैंने अपनी पहली क्लास को याद करके डर-डरकर पैर उठाना शुरू किया। 11 महीने के बाद भारत लौटी। बंबई (अब मुंबई) में माता-पिता के साथ 15 दिन रही। उस दौरान स्वामी हरिदास सम्मेलन में 20 अप्रैल, 1975 के दिन भरतनाट्यम करने का निमंत्रण मिला। बंबई का रंगभवन पूरी तरह भरा हुआ था। मैं ग्रीन रूम में थी। अचानक मेरी नजर शीशे पर गई। मुझे पसीने छूटने लगे। बहुत कुछ याद आने लगा। ऐसा लगा कि जैसे हाथ-पांव सुन्न हो गए हों। मुझे याद है कि ऐसा कई साल पहले भी हुआ था, जब मैं पहली बार स्टेज पर नृत्य करने वाली थी। मुझे याद है कि एक अंग्रेज पत्रकार ने तो मेरे नृत्य को देखने के बाद लिखा था- सोनल मानसिंह का नृत्य देखकर ही समझ आता है कि शास्त्रीय नृत्य को देवताओं की विरासत क्यों मानते हैं? 

एक बार फिर से मेरी जिंदगी की शुरुआत हुयी 

मैं घबराए मन से स्टेज पर गई। हाथ जोड़कर दर्शकों का अभिवादन किया। इसके बाद मैंने लगभग डेढ़ घंटे तक भरतनाट्यम किया। सौभाग्यवश कथक क्वीन के विशेषण से प्रख्यात सितारा देवी, जो वहां दर्शक थीं, मंच पर चढ़ीं, अपनी बांहों में जकड़कर मेरे माथे पर हाथ रखा, गले से काला धागा उतारकर मेरे गले में यह कहते हुए पहनाया कि ईश्वर तुम्हें बुरी नजर से बचाए। इसके बाद मैं दिल्ली आई। जहां चार-छह घंटों तक भरतनाट्यम संगीत मंडली के साथ अभ्यास शुरू हुआ। चार मई, 1975 को होटल अशोक के विशाल कन्वेंशन सेंटर में मेरा ढाई घंटे का कार्यक्रम हुआ। डॉ. कर्ण सिंह, डॉ. कपिला वात्सायन आदि ने खुलकर प्रशंसा की। आज भी उस कार्यक्रम की चर्चा होती है।

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