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PALAM KALYANSUNDARAM BIOGRAPHY IN HINDI


पालम कल्याणसुंदरम

(सामाजिक कार्यकर्ता)


मैंने शादी नहीं की।

 मेरी जरूरतें बहुत कम रही हैं।

 इसलिए मैं अपना वेतन और पेंशन दान कर देता था।

 यह समाज ही मेरा परिवार है।

 मैं समाज के लिए जीता हूं। 

हर इंसान मौत के बाद इस दुनिया से खाली हाथ जाता है, 

फिर संपत्ति जोड़ने से भला क्या फायदा?






















स्कूल उनके गांव से करीब दस किलोमीटर दूर था। गांव में न सड़क थी, न बिजली। दूर-दूर तक कोई दुकान नहीं थी। गांव में सिर्फ 30 घर थे। कल्याणसुंदरम गांव के अकेले बच्चे थे, जिन्हें स्कूल जाने का मौका मिला। इसके लिए रोज दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।

यह कहानी तमिलनाडु के एक छोटे से गांव मेलाकारुवेलनगुलम की है। यह तिरुनेलवेली जिले में है। कल्याणसुंदरम इसी गांव में पले-बढ़े। एक साल थे जब उनके पिता की मौत हो गई। मां ने उन्हे पाला। पति के निधन के बाद बेटे को पढ़ा-लिखाकर नेक इंसान उनके जीवन का एकमात्र मकसद बन गया। 

कल्याणसुंदरम बताते हैं, मुङो अकेले स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था। मैंने साथी बच्चों से पूछा, वे स्कूल क्यों नहीं जाते, तो जवाब मिला कि उनके परिवार के पास स्कूल की फीस देने के पैसे नहीं हैं। मैं इस बात से बहुत दुखी था। मैं उनकी मदद करना चाहता था, पर तब मैं बहुत छोटा था। गांव में बिजली नहीं थी, लिहाजा मां दीये की रोशनी में काम करती थीं। जब बेटा स्कूल जाने लगा, तो वह घर में लैंप ले आईं, ताकि बेटे को पढ़ाई में दिक्कत न हो। 

कल्याणसुंदरम बताते हैं, मां ने तीन बातें सिखाई। कभी लालच मत करो, अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान करो और हर दिन एक नेक काम करो। मां की बात मन में घर कर गई।तब वह 16 साल के थे। उनकी आवाज लड़कियों जैसी पतली थी। दोस्त चिढ़ाने लगे। धीरे-धीरे वह हीन भावना के शिकार हो गए। आत्महत्या का ख्याल आने लगा। एक सुबह एक पत्रिका में उन्होंने प्रेरक लेख पढ़ा और लेखक से मिलने पहुंच गए। लेखक से उन्होंने कहा, मेरी आवाज लड़कियों जैसी है। सब चिढ़ाते हैं। मन करता है कि जान दे दूं। यह सुनकर लेखक महोदय मुस्कराए और कहा, इस बात की फिक्र मत करो कि तुम कैसा बोलते हो? कुछ ऐसा करो कि लोग तुम्हारे बारे में अच्छा बोलने लगे। यह सुनकर उनके मन की उदासी खत्म हो गई। 

स्कूली पढ़ाई के बाद बाद वह शहर आ गए। स्नातक में तमिल भाषा को मुख्य विषय चुना, फिर इतिहास में एमए किया। शहर में भी मां की सीख याद रही। कॉलेज के दिनों से ही वह आस-पास के बच्चों की पढ़ाई में मदद करने लगे।बात 1962 की है। उन दिनों वह मद्रास यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई कर रहे थे। भारत-चीन के बीच युद्ध चल रहा था। कल्याणसुंदरम बताते हैं, मैंने रेडियो पर नेहरू जी का संदेश सुना। वह देशवासियों से रक्षाकोष में दान देने की अपील कर रहे थे। मैं तुरंत मुख्यमंत्री कामराज के पास गया और अपने गले से सोने की जंजीर उतारते हुए कहा- आप इसे कोष में जमा कर लीजिए। शायद यह सैनिकों के काम आ जाए। मख्यमंत्री इतना प्रभावित हुए कि मई दिवस पर कल्याणसुंदरम को सम्मानित किया।

पढ़ाई के बाद यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन की नौकरी मिल गई। उनका जीवन सादा था। साधारण से घर में रहना, दो जोड़ी कपड़े में गुजारा, पैदल चलना और खुद पकाकर खाना। जरूरतें बहुत कम थीं, लिहाजा वेतन का कुछ ही हिस्सा खर्च कर पाते थे। बाकी पैसे बच्चों के लिए दान करने लगे। बाद में मदद करने का जुनून इस कदर चढ़ा कि वह पूरा वेतन दान करने लगे। नौकरी के पूरे 35 साल यह सिलसिला चला। कल्याणसुंदरम कहते हैं, वेतन के पैसे से गरीब बच्चों को स्कूल जाता देखकर मन को बड़ा सुकून मिलता था।

यह वाकया 1990 का है। उन्हें यूजीसी से एक लाख रुपया एरियर मिला। उन्होंने सोचा, इस पैसे का मैं क्या करूंगा? वह डीएम कार्यालय पहुंचे और जिलाधिकारी को पूरी राशि देते हुए कहा कि आप इसे अनाथ बच्चों के कल्याण पर खर्च कीजिए। डीएम के जरिये यह बात मीडिया तक पहुंची। पहली बार पूरे शहर को इस दानवीर के बारे में पता चला। 

यह खबर सुपरस्टार रजनीकांत तक भी पहुंची। वह उनसे मिलने पहुंचे। अभिनेता ने उन्हें बतौर पिता गोद लेने का एलान किया। वह कल्याणसुंदरम को अपने साथ घर ले जाना चाहते थे, पर वह राजी नहीं हुए।
साल 1998 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पालम नाम की संस्था बनाई। पीएफ के दस लाख रुपये संस्था को दान कर दिए। हर महीने की पेंशन भी दान में जाने लगी। खुद के गुजारे के लिए वह होटल में वेटर का काम करने लगे। 

कल्याणसुंदरम कहते हैं, मैंने शादी नहीं की। मेरी जरूरतें बहुत कम हैं। अपने गुजारे के लिए मैं होटल में काम करता हूं। मेरा खर्च निकल जाता है। मुङो पेंशन की जरूरत नहीं है।वह अपनी सारी पैतृक संपत्ति सामाजिक संस्था को दान कर चुके हैं। उन्होंने मरने के बाद अपनी आंखें और शरीर दान देने का एलान भी किया है। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें 20वीं सदी के बेमिसाल लोगों में शुमार किया। एक अमेरिकी संस्था ने उन्हें ‘मैन ऑफ द मिलेनियम’ अवॉर्ड से सम्मानित किया। इस मौके पर उन्हें बतौर इनाम 30 करोड़ रुपये मिले। यह पैसा भी उन्होंने दान कर दिया। 

कल्याणसुंदरम कहते हैं, इस दुनिया में हर इंसान मृत्यु के बाद खाली हाथ जाता है। फिर संपत्ति जोड़ने की होड़ कैसी? दूसरों के लिए जियो, बड़ा सुकून मिलेगा।

साभार - हिंदुस्तान अख़बार 

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