Thursday, May 18, 2017

KISHORE KUMAR BIOGRAPHY IN HINDI



एक हादसा जिसने किशोर को 

सुरीला बना दिया

KISHORE KUMAR BIOGRAPHY IN HINDI


उनका बचपन से गला खराब रहता था और लगातार खांसते रहते थे | 
बचपन में किशोर कुमार के साथ एक घटना हुयी
 जिसमे उनके पैर की एक अंगुली कट गयी थी | 
अब दर्द के मारे किशोर कुमार का बुरा हाल हो गया था
 और उस समय ऐसी दवाईया नही थी जो दर्द को कम कर सके | 
अब दर्द के कारण दिन के अधिकतर समय रोते रहते थे और दवा देने के बाद चुप होते थे | 
अब एक महीने तक उनके रोने का सिलसिला युही चलता रहा 
और इसी कारण बचपन से खासते रहने वाले किशोर कुमार का गला साफ हो गया |
 उसके बाद उन्होंने गाना शुरू किया |








'खंडवा के किशोर कुमार!' वो किसी जनसभा या महफिलों में जाते थे तो खुद का परिचय इसी नाम से कराते। उन्हें अपने घर मध्यप्रदेश के खंडवा से वैसा ही लगाव था जैसा किसी बच्चे को अपनी मां से होता है। उनका असल नाम आभास कुमार गांगुली था। फिल्मी दुनिया ने उनका नाम बदल कर किशोर कुमार कर दिया। किशोर कुमार एकांतवासी थे। वे अपने में ही मगन रहना पसंद करते थे। उनकी अपनी ही कहानियां थीं, अपने ही गढ़े कुछ दोस्त थे, जिनके साथ खेलना उन्हें खुश कर देता था। हम उन्हें जिन दो रूपों के लिए याद करते हैं, उनमें पहला है गायक और दूजा एक्टर।

जीवन परिचय 


 किशोर कुमार (Kishore Kumar) का जन्म मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में गांगुली परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम कुंजालाल गांगुली और माता का नाम गौरी देवी थे | किशोर कुमार का बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था और वो एक बहुत सम्पन्न परिवार से थे | किशोर कुमार अपने भाई बहनों में सबसे छोटे थे | उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार एक महान और मशहूर अभिनेता रह चुके थे | अशोक कुमार से छोटी उनकी बहन और उनसे छोटा एक भाई अनूप कुमार था | जब किशोर कुमार फिल्मो में अभिनेता बन चुके थे तब किशोर कुमार बालक थे |

 वो हादसा, जिसने किशोर को सुरीला बना दिया

अशोक कुमार बताते है कि उनका बचपन से गला खराब रहता था और लगातार खांसते रहते थे | बचपन में किशोर कुमार के साथ एक घटना हुयी जिसमे उनके पैर की एक अंगुली कट गयी थी | अब दर्द के मारे किशोर कुमार का बुरा हाल हो गया था और उस समय ऐसी दवाईया नही थी जो दर्द को कम कर सके | अब दर्द के कारण दिन के अधिकतर समय रोते रहते थे और दवा देने के बाद चुप होते थे | अब एक महीने तक उनके रोने का सिलसिला युही चलता रहा और इसी कारण बचपन से खासते रहने वाले किशोर कुमार का गला साफ हो गया | उसके बाद उन्होंने गाना शुरू किया | 
अपनी आवाज से खुश किशोर कुमार मस्तमगन होकर गाते रहते थे। ऐसे ही एक दिन अशोक कुमार से मिलने केएल सहगल आये, उन्होंने अशोक से पूछा कि ये कौन गा रहा है। अशोक ने बताया कि मेरा छोटा भाई है और उसे गाने का बहुत शौक है। इसके बाद धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया में लोग किशोर कुमार की आवाज के पीछे पागल होने लगे।


के एल  सेहगल के फैन


किशोर कुमार बचपन से ही  के एल  सेहगल के फैन थे और उनको ही अपनी प्रेरणा बनाकर गाते रहते थे | उनके बड़े भाई उनको अक्सर चिढाया करते थे कि वो सेहगल की तरह नही गा सकते है | अब किशोर कुमार अपने बड़े भाई की मदद से बॉम्बे टॉकीज में Chorus Singer के रूप में अपने करियर की शुरवात की | किशोर कुमार पहली बार अपने बड़े भाई की फिल्म शिकारी (1946 ) में नजर आये जहा उनको अभिनय करने का मौका मिला | संगीतकार खेमचंद ने उनको पहले बार फिल्मो में गाना गाने का मौका दिया और उन्होंने 1948 में देवानंद की फिल्म जिद्दी के लिए “मरने की दुआए क्यों मांगू ” गाना गाया | उनके इस गाने के बाद फिल्मो के कई ऑफर आये लेकिन उस समय फिल्मो में आने के लिए ज्यादा सीरियस नही थे |

1949 में वो मुंबई में रहने लग गये और 1951 में आयी आन्दोलन फिल्म में उन्हें मुख्य अभिनेता का किरदार निभाने को मिला | अपने बड़े भाई की वजह से उनको फिल्मो के कई ऑफर आये लेकिन वो गायक बनने में ज्यादा रूचि रखते थे | अशोक कुमार जो उस समय तक एक मंझे हुए अभिनेता बन गये थे ,चाहते थे कि किशोर कुमार भी उनकी तरह अच्छा अभिनेता बने | अब किशोर कुमार अभिनय तो करते थे लेकिन उनको कॉमेडी रोल करना पसंद था |
फ़िल्मी सफ़र 


 किशोर कुमार ने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नही ली थी इसलिए संगीतकार उनको गाने में लेने के लिए कतराते थे फिर भी एक बार संगीतकारसलील चौधरी ने उनकी आवाज सुनकर उनको गाने के कई मौके दिए थे | इसके बाद किशोर कुमार ने न्यू दिल्ली , आशा , चलती का नाम गाडी , हाफ टिकट , गंगा की लहरें और पड़ोसन जैसी फिल्मो में हास्य अभिनेता का काम किया | चलती का नाम गाडी उनकी अभिनय के तौर पर एक सफल फिल्म रही जिसमे कार मेकेनिक के रूप में उनके और मधुबाला के बीच रोमांस को दिखाया गया है | इस फिल्म में उनका गाना “एक लडकी भीगी भागी सी ” बहुत लोकप्रिय हुआ था |

संगीतकार SD बर्मन को किशोर कुमार के टैलेंट को समझने और निखारने का श्रेय जाता है जिन्होंने किशोर कुमार को सेहगल की आवाज की नकल करने के बजाय अपनी खुद की धुन निकालने को कहा | उनसे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी खुद की कला “युड्ली” को इजाद किया जो उन्होंने विदेशी संगीतकारो से सुन रखा था | बर्मन ने किशोर कुमार  को कई फिल्मो में काम दिलवाया जिसमे कुछ प्रमुख फिल्मे मुनीमजी , टैक्सी ड्राईवर , House No. 44, फुन्तूश , नौ दो ग्यारह , पेइंग गेस्ट , गाइड , Jewel Thief , प्रेम पुजारी और तेरे मेरे सपने थी | उनके बर्मन साहब के लिए गाय गानों में “माना जनाब ने पुकारा नही ” “हम है राही प्यार के ” “ऐ मेरी टोपी पलट के आ ” “हाल कैसा है जनाब का ” जैसे लोकप्रिय गाने गाये |

1961 में फिल्म झुमरू में उन्हों निर्माता और निर्देशन का काम भी किया | इसके बाद उन्होंने कई गाने गाये लेकिन उस समय तक उनका ज्यादा नाम नही था | 1969 में उन्होंने आराधना फिल्म में “मेरे सपनो की रानी ” गाना गाया जिसने उनको एक स्टार बना दिया और इसी फिल्म के गाने “रूप तेरा मस्ताना ” के लिए उनको पहला फिल्मफेर अवार्ड भी मिला | 1970 और 1980 का दशक उनके लिए स्वर्णिम दशक रहा था जिसमे उन्होंने मशहूर अभिनेताओ राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन , धर्मेन्द्र ,जीतेंद्र ,संजीव कुमार ,देवानंद ,संजय दत्त ,अनिल कपूर ,दिलीप कुमार ,प्राण ,रजनीकान्त ,गोविंदा और जेकी श्राफ के साथ काम किया |किशोर कुमार ने मो.रफी , मुकेश , लता मंगेशकर , आशा भोंसले जैसे दिग्गज गायकों के साथ काम किया | 13 अक्टूबर 1987 को किशोर कुमार की मुत्यु हो गयी और संयोग से उस दिन उनके बड़े भाई अशोक कुमार का जन्मदिन था |


किशोर कुमार ने चार शादिया की थी | उनकी पहली पत्नी गायक और अभिनेत्री रुमा घोष थी और उनकी ये शादी 1950 से 1958 तक चली उनकी दुसरी पत्नी मधुबाला थी जिसके लिए उन्होंने मुस्लिम धर्म परिवर्तन कर दिया था लेकिन उनके परिवार वालो ने कभी मधुबाला को नही अपनाया| 1969 में मधुबाला की मृत्यु हो गयी और उन्होंने योगिता बाली से शादी कर ली जो केवल दो वर्ष 1976 और 1978 तक चली | किशोर कुमार ने अंतिम शादी लीना चंदावर्कर से की और 1980 से लेकर अपनी मौत तक उनसे शादी बनी रही | उनके दो पुत्र है रुमा घोष से उनको अमित कुमार और लीना चंदावर्कर से सुमित कुमार थे |  किशोर कुमार की मौत के बाद भी उनके गाने आज भी हमारे दिलो में जीवित है |

एक्टर किशोर कुमार की कहानी

असल किशोर कुमार को जानना है, उनकी बेचैनी को समझना है, उनके खंडवा प्रेम की गहराई में उतरना है तो उनका ये दिलचस्प इंटरव्यू पढ़ें। इसमें वो ये भी बता रहे हैं, कि कैसे लोगों ने उन्हें एक एक्टर बना दिया जबकि वो अभिनय करना ही नहीं चाहते थे। किशोर कुमार का ये इंटरव्यू प्रीतिश नंदी ने लिया था, जो पहली बार इलेस्ट्रेटेड वीकली के अप्रैल 1985 के अंक में छपा था। इसका हिन्दी अनुवाद रंगनाथ सिंह ने किया है...

मैंने सुना है कि आप बंबई छोड़ कर खंडवा जा रहे हैं?

किशोर: इस अहमक, मित्रविहीन शहर में कौन रह सकता है, जहां हर आदमी हर वक्त आपका शोषण करना चाहता है? क्या तुम यहां किसी का भरोसा कर सकते हो? क्या कोई भरोसेमंद है यहां? क्या ऐसा कोई दोस्त है यहां जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो? मैंने तय कर लिया है कि मैं इस तुच्छ चूहा-दौड़ से बाहर निकलूंगा और वैसे ही जीऊंगा जैसे मैं जीना चाहता था, अपने पैतृक निवास खंडवा में। अपने पुरखों की जमीन पर। इस बदसूरत शहर में कौन मरना चाहता है!!

आप यहां आये ही क्यों?

किशोर: मैं अपने भाई अशोक कुमार से मिलने आया था। उन दिनों वो बहुत बड़े स्टार थे। मुझे लगा कि वो मुझे केएल सहगल से मिलवा सकते हैं, जो मेरे सबसे बड़े आदर्श थे। लोग कहते हैं कि वो नाक से गाते थे, लेकिन क्या हुआ? वो एक महान गायक थे। सबसे महान।

ऐसी खबर है कि आप सहगल के प्रसिद्ध गानों का एक एलबम तैयार करने की योजना बना रहे हैं?

किशोर: मुझसे कहा गया था, मैंने मना कर दिया। उन्हें अप्रचलित करने की कोशिश मुझे क्यों करनी चाहिए? उन्हें हमारी स्मृति में बसे रहने दीजिए। उनके गीतों को उनके गीत ही रहने दीजिए। एक भी व्यक्ति को ये कहने का मौका मत दीजिए कि किशोर कुमार उनसे अच्छा गाता है।

यदि आपको बॉम्बे पसंद नहीं था, तो आप यहां रुके क्यों? प्रसिद्धि के लिए? पैसे के लिए?

किशोर: मैं यहां फंस गया था। मैं सिर्फ गाना चाहता था। कभी भी अभिनय करना नहीं चाहता था। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों की कृपा से मुझे अभिनय करने को कहा गया। मुझे हर क्षण इससे नफरत थी और मैंने इससे बचने का हर संभव तरीका आजमाया। मैं सिरफिरा दिखने के लिए अपनी लाइनें गड़बड़ कर देता था, अपना सिर मुंड़वा दिया, मुसीबत पैदा की, दुखद दृश्यों के बीच में बलबलाने लगता था, जो मुझे किसी फिल्म में बीना राय को कहना था वो मैंने एक दूसरी फिल्म में मीना कुमारी को कह दिया– लेकिन फिर भी उन्होंने मुझे जाने नहीं दिया। मैं चीखा, चिल्लाया, बौड़म बन गया। लेकिन किसे परवाह थी? उन्होंने तो बस तय कर लिया था कि मुझे स्टार बनाना है।

क्यों?

किशोर: क्योंकि मैं दादामुनि का भाई था और वह महान हीरो थे।

लेकिन आप सफल हुए

किशोर: बेशक मैं हुआ। दिलीप कुमार के बाद मैं सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला हीरो था। उन दिनों मैं इतनी फिल्में कर रहा था, कि मुझे एक सेट से दूसरे सेट पर जाने के बच ही कपड़ने बदलने होते थे। जरा कल्पना कीजिए, एक सेट से दूसरे सेट तक जाते हुए मेरी शर्ट उड़ रही है, मेरी पैंट गिर रही है, मेरा विग बाहर निकल रहा है। बहुत बार मैं अपनी लाइनें मिला देता था और रुमानियत वाले दृश्य में गुस्सा दिखता था या तेज लड़ाई के बीच रुमानियत। ये बहुत बुरा था और मुझे इससे नफरत थी। इसने स्कूल के दिनों के दुस्वप्न जगा दिये। निर्देशक स्कूल टीचर जैसे ही थे। ये करो, वो करो, ये मत करो, वो मत करो। मुझे इससे डर लगता था। इसीलिए मैं अक्सर भाग जाता था।

खैर, आप अपने निर्देशकों और निर्माताओं को परेशान करने के लिए बदनाम थे। ऐसा क्यों?

किशोर: बकवास। वे मुझे परेशान करते थे। आप सोचते हैं कि वो मेरी परवाह करते थे? वो मेरी परवाह इसलिए करते थे, क्योंकि मैं बिकता था। मेरे बुरे दिनों में किसने मेरी परवाह की? इस धंधे में कौन किसी की परवाह करता है?

इसीलिए आप एकांतजीवी हो गये?

किशोर: देखिए, मैं सिगरेट नहीं पीता, शराब नहीं पीता, घूमता-फिरता नहीं, पार्टियों में नहीं जाता, अगर ये सब मुझे एकांतजीवी बनाता है, तो ठीक है। मैं इसी तरह खुश हूं। मैं काम पर जाता हूं और सीधे घर आता हूं। अपनी भुतहा फिल्में देखने, अपने भूतों के संग खेलने, अपने पेड़ों से बातें करने, गाना गाने। इस लालची संसार में कोई भी रचनात्मक व्यक्ति एकांतजीवी होने के लिए बाध्य है। आप मुझसे ये हक कैसे छीन सकते हैं।

आपके ज्यादा दोस्त नहीं हैं?

किशोर: एक भी नहीं।

यह तो काफी चालू बात हो गयी...

किशोर: लोगों से मुझे ऊब होती है। फिल्म के लोग मुझे खासतौर पर बोर करते हैं। मैं पेड़ों से बातें करना पसंद करता हूं।

इसका मतलब आपको प्रकृति पसंद है?

किशोर: इसीलिए तो मैं खंडवा जाना चाहता हूं। यहां मेरा प्रकृति से संबंध खत्म हो गया है। मैंने अपने बंगले के चारों तरफ नहर खोदने की कोशिश की थी, जिससे मैं उसमें गंडोला चला सकूं। जब मेरे आदमी खुदाई कर रहे थे, तो नगर महापालिका वाले बंदे बैठे रहते थे, देखते थे और ना-ना में अपनी गर्दन हिलाते रहते थे। लेकिन ये काम नहीं आया। एक दिन किसी को एक हाथ का कंकाल मिला, एड़ियां मिलीं। उसके बाद कोई खुदाई करने को तैयार नहीं था। मेरा दूसरा भाई अनूप गंगाजल छिड़कने लगा, मंत्र पढ़ने लगा। उसने सोचा कि ये घर कब्रिस्तान पर बना है। हो सकता ये बना हो, लेकिन मैंने अपने घर को वेनिस जैसा बनाने का मौका खो दिया।

लोगों ने सोचा होगा कि आप पागल हैं! दरअसल, लोग ऐसा ही सोचते हैं।

किशोर: कौन कहता है, मैं पागल हूं? दुनिया पागल है, मैं नहीं।

यहां सुने किशोर का वो फंटास्टिक गीत, जिसे गाना किसी भी सिंगर के लिए बहुत मुश्किल होगा, लेकिन लोगों ने इस गाने को हल्के में ले लिया...
 लोगों ने सोचा, कि किशोर ने खेल-खेल में कोई गीत गा दिया...

साभार -YOURSTORY.COM

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