WARIS AHLUWALIA BIOGRAPHY IN HINDI



वारिस अहलूवालिया


(अमेरिकी डिजाइनर, अभिनेता)


अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद सिख होने की वजह से अपमान सहना पड़ा।

 लेकिन मैं डरा नहीं।

 हर किसी को अपने धर्म के हिसाब से जीने की आजादी होनी चाहिए।

 इसके लिए लोगों को जागरूक करना होगा।

 सभ्य समाज में नस्ली भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होती।




पंजाब की धार्मिक नगरी अमृतसर में जन्मे वारिस अमेरिका में पले-बढ़े। पिता पंजाब की गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे और मां एक निजी स्कूल चलाती थीं। वारिस पांच साल के थे, जब मम्मी-पापा उन्हें लेकर अमेरिका घूमने निकले। 1979 में वे अमेरिका के ब्रुकलिन शहर पहुंचे। दिलचस्प बात यह थी कि उनकी मां ने मास्टर्स की पढ़ाई अमेरिका में ही की थी, इसलिए उन्हें वहां का माहौल बहुत अच्छा लगा। दोनों ने वहीं बसने का इरादा कर लिया।

परदेस में रहने के बावजूद परिवार ने सिख परंपराओं का पूरी तरह निर्वाह किया। वारिस को स्कूल जाने से पहले रोज घर में अरदास, यानी प्रार्थना करनी होती थी।

 वारिस बताते हैं- स्कूल में मैं अकेला सिख बच्च था। मेरे बाल व पगड़ी देखकर अमेरिकी बच्चों को अजीब लगता था। मगर इसे लेकर कभी कोई दिक्कत नहीं आई। मेरी सबसे बनती थी। एक दिन स्कूल टीचर ने मां से कहा कि आपका बेटा बहुत बढ़िया वक्ता है। इसे तो वकील होना चाहिए। इस खूबी को निखारने के लिए वारिस को लीडरशिप ट्रेनिंग में भेजा गया। उन्होंने सिख यूथ कैंपों में भी हिस्सा लिया। वह सार्वजनिक मंचों से नस्ली भेदभाव व सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करने लगे।स्कूली पढ़ाई के बाद वारिस न्यूयॉर्क के लिबरल आर्ट कॉलेज गए। वहां तमाम अफ्रीकी और एशियाई देशों के छात्र पढ़ते थे। 

वारिस बताते हैं- कॉलेज में मैं अकेला छात्र था, जो पटका पहनता था। हम संग घूमते-फिरते थे। मैंने हमेशा अपने धार्मिक संस्कारों का पालन किया, साथ ही दूसरे धर्मो का भी सम्मान किया। दो साल तक न्यूयॉर्क में पढ़ाई के बाद वह इंग्लैंड की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी चले गए। ब्रिटेन उन्हें काफी अच्छा लगा, पर इसी बीच पिता के निधन की एक बुरी खबर आई। वह न्यूयॉर्क लौट आए। तय किया कि अब मां के पास ही रहूंगा। वारिस ने नौकरी के लिए कई जगह इंटरव्यू दिए। म्यूजिक पत्रिका निकालने की कोशिश की, एक इंटरनेट कंपनी खोली। मगर कहीं कामयाबी नहीं मिली।

 वह न्यूयॉर्क छोड़कर लॉस एंजेलिस आ गए। वहां एक दिलचस्प वाकया हुआ। एक दिन वह वहां के सबसे मशहूर बुटीक पहुंचे थे। वहां हॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारे आया करते थे। तभी स्टोर में मौजूद एक अधिकारी ने उनके हाथ में हीरे की खूबसूरत अंगूठी को देख पूछा, यह अंगूठी कहां से खरीदी? क्या आप हमें इसी डिजाइन की कुछ अंगूठियां बनवाकर दे सकते हैं? वारिस ने झट से हां कर दी। वह एक ज्वैलरी डिजाइनर से मिले व उसी डिजाइन की अंगूठियां स्टोर को पहुंचा दीं।कुछ दिनों के बाद वे अंगूठियां कुछ मशहूर हॉलीवुड सितारों की उंगलियों में नजर आईं। फैशन मैग्जीन में उन अंगूठियों की चर्चा होने लगी। जेवरात डिजाइन की बारीकियों को समझने के लिए उन्होंने ट्रेनिंग ली। जल्द ही उन्होंने हाउस ऑफ वारिस स्टोर खोल लिया। प्राचीन व मॉर्डन डिजाइन का संगम उनके जेवरात की खूबी थी। फैशन पत्रिकाओं में उनका ब्रांड छा गया।

 जिंदगी पटरी पर दौड़ रही थी कि अचानक एक बड़ा झटका लगा। सितंबर, 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमलों के बाद नफरत फैलने लगी। उसकी चपेट में सिख समुदाय भी आ गया। वारिस भी गुस्से का शिकार बने। हमलावरों ने उन्हें ओसामा बिन लादेन कहकर अमेरिका छोड़कर जाने को कहा।

 वारिस कहते हैं- जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तो कई बच्चे मेरी पगड़ी को देखकर कहते थे- देखो, वह गांधी जा रहा है। मगर जब लोगों ने मुङो लादेन कहा, तो मेरा दिल रो पड़ा। डरने की बजाय वारिस लोगों को जागरूक करने में जुट गए।एक दिन वह हॉलीवुड डायरेक्टर वेन्स एंडरसन के संग डिनर कर रहे थे। उन्होंने वारिस से पूछा, तुम मेरी फिल्म में काम करोगे? वारिस ने कहा- हां, क्यों नहीं! 2004 में उन्हें द लाइफ एक्वेटिक विद स्टीव जिसौ फिल्म में रोल मिल गया।

 यह नए सफर का आगाज था। एक तरफ उनका ज्वैलरी ब्रांड मशहूर हो रहा था, तो दूसरी तरफ हॉलीवुड में अदाकारी से पहचान मिलने लगी थी। कुछ दिनों के बाद ही उन्हें हॉलीवुड फिल्म निर्देशक स्पाइक ली की फिल्म इनसाइड मैन में एक महत्वपूर्ण रोल मिल गया। कई फैशन कंपनियों के लिए उन्होंने मॉडलिंग भी की।

 वर्ष 2013 में फैशन ब्रांड गैप के पोस्टर पर उनकी तस्वीर छपी, तो हंगामा मच गया। तस्वीर में वह पगड़ी पहने नजर आए। पोस्टर पर नस्ली टिप्पणी हुई। मगर वह डटे रहे। फैशन हो या फिल्म का मंच, वारिस बड़े शान से अपनी दाढ़ी और पगड़ी के संग नजर आए। 2010 में उन्हें वेनिटी फेयर में सर्वश्रेष्ठ पहनावे का अवॉर्ड मिला। वोग ने उन्हें दस प्रभावशाली लोगों में शुमार किया।19 अक्तूबर, 2016 को न्यूयॉर्क के मेयर ने धार्मिक सहिष्णुता के क्षेत्र में योगदान के लिए वारिस अहलूवालिया दिवस मनाने का एलान किया।

 मगर इस साल फरवरी में एक बार फिर उन्हें अपमानित किया गया। मैक्सिको से न्यूयॉर्क आते वक्त उनसे पगड़ी उतारकर तलाशी देने को कहा गया। वारिस कहते हैं- मैं सिख हूं, मैं पगड़ी पहनता हूं। इस बात पर मुङो गर्व है। नस्ली टिप्पणियों के बावजूद मैंने अपने पहनावे में कोई बदलाव नहीं किया और न ही करूंगा।

साभार हिंदुस्तान 

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GAURI SAWANT BIOGRAPHY IN HINDI


गौरी सावंत

(सामाजिक कार्यकर्ता)

मेरी सबसे बड़ी पहचान यह है कि मैं गायत्री की मां हूं।

 मुङो मां का प्यार नसीब नहीं हुआ,

 लेकिन मैं अपनी बच्ची को यह कमी कभी महसूस नहीं होने दूंगी।

 वह मेरा गुरूर है। मैं उसे खूब पढ़ाऊंगी।

 मेरा सपना है कि वह एक आत्मनिर्भर इंसान बने।



गौरी का जन्म पुणो के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। उनका नाम गणोश सुरेश सावंत रखा गया था। तब वह एक लड़का थीं। गौरी नौ साल की थीं, तभी मां चल बसीं। मां के जाने के बाद दादी ने पाला। वह लड़का थीं, लेकिन उनकी चाल-ढाल लड़कियों जैसी थी।स्कूल के दिनों में ही वह अपने अंदर अजीब-सा बदलाव महसूस करने लगीं। उन्हें एहसास होने लगा कि वह लड़का नहीं, लड़की हैं। 

अक्सर घर में चुपके से दादी की साड़ी पहनकर चेहरे पर मेकअप लगा लेतीं। आईने में निहारतीं, तो खुद पर इतराना आता। मगर मन में खौफ रहता कि कहीं कोई देख न ले। पिताजी पुलिस में थे। उन्हें बेटे के तौर-तरीके बिल्कुल पसंद नहीं थे।

 गौरी बताती हैं- घर में मां नहीं थी, स्कूल में दोस्त नहीं थे। ऐसा कोई करीबी न था, जिससे मन की बातें कर पातीं। पिताजी नफरत ही करते थे।जिंदगी बदतर होती जा रही थी। पड़ोस के बच्चे मजाक उड़ाते थे। कुछ तो उनको ‘हिजड़ा’ कहकर चिढ़ाने लगे। समय के साथ यह एहसास मजबूत होता गया कि वह लड़की हैं, लड़का नहीं। मुश्किलों से जूझते हुए स्कूली पढ़ाई पूरी कर वह कॉलेज में दाखिल हुईं। एमएसडब्ल्यू में स्नातक किया। घरवाले चाहते थे कि वह अच्छे बेटे की तरह नौकरी करें और परिवार की जिम्मेदारी संभालें। मगर वह तय कर चुकी थीं कि अब वह लड़के की जिंदगी नहीं जी सकतीं। 

एक रात किसी से बिना कुछ कहे वह घर से निकल पड़ीं। वह रात उन्होंने दादर रेलवे स्टेशन पर गुजारी। अगले दिन चंपा नाम की एक किन्नर उन्हें अपने घर ले गई। फिर नौकरी के लिए संघर्ष शुरू हुआ, पर लोग एक किन्नर को नौकरी देने को तैयार नहीं थे। कुछ दिन भीख मांगकर काम चलाना पड़ा।इसी बीच गौरी एक गैर-सरकारी संगठन के संपर्क में आईं। मेडिकल काउंसलिंग के बाद उन्होंने सेक्स बदलने का फैसला किया। वह गणोश सावंत से गौरी सावंत बन गईं। इसके बाद उन्होंने इलाके के एक शेल्टर होम में अनाथ बच्चों की मदद करनी चाही, पर उसके संचालकों ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया।

 गौरी बताती हैं- मैं बच्चों के पास न जाऊं, इसलिए उन्होंने मुङो काफी प्रताड़ित किया। बहुत निराशा हुई। आखिर लोग किन्नरों से इतनी नफरत क्यों करते हैं?

वर्ष 2000 में उन्होंने किन्नरों व ट्रांसजेंडर लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के मकसद से एक संगठन बनाया। जिंदगी पटरी पर आने लगी। बात साल 2001 की है। उनके जीवन में एक अहम पड़ाव आया।

 मुंबई में एक सेक्स वर्कर की मौत हो गई। यह मौत उसकी नन्ही बेटी गायत्री पर कहर बनकर टूटी। बच्ची की दादी ने उसे एक दलाल को बेच दिया, मगर पड़ोसियों ने उसे बचा लिया। कुछ समय के लिए बच्ची को अनाथालय भेज दिया गया। गौरी को यह बात पता चली, तो वह उनसे मिलने पहुंची।

 गौरी बताती हैं- पहली बार गायत्री से मिली, तो लगा कि वह मेरी बेटी है। मेरे अंदर ममता उमड़ पड़ी। मैंने तय किया कि इसे गोद लूंगी।गायत्री अपनी नई मां के संग उनके घराने में रहने लगीं। उस घराने में गौरी के गुरु और चेले रहते हैं। जाहिर है, वे सभी किन्नर व ट्रांसजेंडर हैं। नए घर में गायत्री को खूब प्यार मिला। कोई सिर में तेल की चंपी करता, तो कोई आइसक्रीम ले आता। काफी दिनों बाद उन्हें इतना दुलार मिला। जल्दी वह स्कूल जाने लगीं। गौरी अक्सर बेटी के संग घूमने जातीं। शॉपिंग करतीं और पार्क में सैर भी करतीं। वह आम महिला की तरह जीना चाहती थीं, लेकिन दुनिया वाले ताने मारने से नहीं चूकते।

 गौरी बताती हैं- एक बार मैं और गायत्री कहीं जा रहे थे। रास्ते में ऑटोवाले ने पूछा, क्या यह भी तुम जैसी है? गायत्री ने चिल्लाकर कहा, मैं हिजड़ा नहीं हूं। हम मां-बेटी को अक्सर ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है। बेटी को अच्छे संस्कार मिले, इसलिए गौरी अक्सर शाम को उसे रामायण और महाभारत की कहानियां सुनातीं। गायत्री बड़े ध्यान से पौराणिक कहानियां सुनतीं और तमाम सवाल भी पूछतीं। गौरी बताती हैं- मेरी बेटी के मन में हर बात को लेकर उत्सुकता रहती है। मैं उसके हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करती हूं, ताकि वह एक जागरूक नागरिक बने।

 जल्द ही पूरे महाराष्ट्र में इस बात की चर्चा होने लगी कि एक किन्नर ने बच्ची को गोद लिया है। कुछ लोगों ने इसकी तारीफ की, तो कुछ ने सवाल उठाए। आजकल टीवी पर एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है। इस विज्ञापन में एक किन्नर अपनी बेटी को बोर्डिग स्कूल में छोड़ने जाती है। बेटी वकील बनकर अपनी मां को उनका हक दिलाने का संकल्प करती है। यह विज्ञापन गौरी के निजी जीवन पर आधारित है। दिलचस्प बात है कि इसमें किन्नर मां का किरदार खुद गौरी ने निभाया है। उन्हें उम्मीद है कि इस तरह के विज्ञापन किन्नरों के प्रति समाज का नजरिया बदलने में कारगर साबित होंगे।

 गौरी बताती हैं- स्कूल में गायत्री की पढ़ाई ठीक नहीं चल रही थी, इसलिए मैंने उसे हॉस्टल में भेजने का फैसला किया। मैं उस पर अपने सपने थोपना नहीं चाहती, लेकिन मेरी तमन्ना है कि मेरी बेटी खूब पढ़े और आत्मनिर्भर बने। उसे बोर्डिग स्कूल भेजते समय मुङो बहुत रोना आया, मगर उसके बेहतर भविष्य के लिए शायद यही सही था।

साभार -हिंदुस्तान अख़बार 

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LILLY SINGH BIOGRAPHY IN HINDI


लिली सिंह
 ( यू-ट्यूबसेलिब्रिटी,कॉमेडियन )

उन दिनों मैं डिप्रेशन से लड़ रही थी। 
अपने मन की खुशी के लिए कुछ कॉमेडी वीडियो बनाए।
 नहीं पता था कि यू-ट्यूब में इतनी कामयाबी और शोहरत मिल जाएगी।
 अगर मम्मी-पापा साथ नहीं देते, 
तो मैं यह मुकाम कभी हासिल नहीं कर पाती।







लिली के माता-पिता पंजाब के रहने वाले थे। कनाडा में बस गए। ओनटेरियो सिटी में जन्मी लिली को माता-पिता से भारतीय संस्कार मिले। आम हिन्दुस्तानी परिवार की तरह मां चाहती थीं कि बेटी पढ़ाई के साथ-साथ घर के कामकाज भी सीखे। उन्हें व उनकी बड़ी बहन को हिदायत थी कि वे स्कूल के बाद सीधे घर आएं। देर शाम दोस्तों के संग की इजाजत बिल्कुल नहीं थी। पापा चाहते थे कि स्नातक के बाद वह मनोविज्ञान में मास्टर्स करें और टीचिंग लाइन में जाएं।

बात 2009 की है। उनका मन पढ़ाई से उचटने लगा। वह अनमनी सी रहने लगीं। दोस्तों के संग घूमना बंद हो गया। आए दिन मॉल में शॉपिंग के लिए जिद करने वाली लड़की अचानक अपने कमरे में कैद होकर रह गई। मां परेशान थीं कि यह क्या हो गया लाडली को? जब मम्मी पूछतीं- क्या हुआ बेटा, तो लिली उनके गले से लिपटकर रो पड़तीं। फि र डॉक्टर ने बताया कि बेटी डिप्रेशन में है। इलाज शुरू हुआ। 

करीब एक साल लगा डिप्रेशन से बाहर आने में। लिली बताती हैं- मुङो सुबह उठना अच्छा नहीं लगता था। दोस्तों के फोन उठाने बंद कर दिए मैंने। मन में डरावने ख्याल आते थे। लगता था, मैं बेकार में जी रही हूं। मैंने खाना-पीना भी छोड़ दिया था।लिली जानती थीं कि डिप्रेशन से बाहर आने के लिए खुश रहना जरूरी है। जिंदगी उन्हें नीरस लगने लगी थी, पर बचपन की यादें बेहद खुशनुमा थीं। स्कूल के दिन याद आने लगे, जब वह अपनी नादानियों से मम्मी को खूब परेशान करती थीं और मम्मी खीझकर डांट लगाती थीं। पुराने दिनों को याद करके उन्हें खूब हंसी आती। उन यादों ने डिप्रेशन से बाहर आने में काफी मदद की। 

तब उन्होंने सोचा कि क्यों न खूबसूरत यादों को सहेजकर वीडियो बनाया जाए। शुरुआत में कुछ बातें यूं ही मोबाइल पर रिकॉर्ड कर ली। अपने वीडियो देखकर खूब हंसी आई। पहली बार एहसास हुआ कि वह तो अच्छी कॉमेडी कर लेती हैं। फिर ख्याल आया कि क्यों न इस तरह के वीडियो बनाकर दूसरों को भी हंसाया जाए।उन्होंने पापा से कहा, मैं यू-ट्यूब के लिए कॉमेडी वीडियो बनाना चाहती हूं। पापा को यह आइडिया कुछ ठीक नहीं लगा। उनका जवाब था, समय बरबाद करने से बेहतर है कि तुम मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करो। 

पिता सुखविंदर सिंह बताते हैं- लिली ने मुझसे कहा कि पापा, बस मुङो एक साल की मोहलत दीजिए। अगर मैं यू-ट्यूब पर सफल नहीं हुई, तो वापस यूनिवर्सिटी जाकर पढ़ाई शुरू कर दूंगी। मुङो लगा, बेटी की खुशी के लिए उसे एक मौका देना चाहिए।

 अक्तूबर, 2010 में लिली ने सुपर वुमेन नाम से यू-ट्यूब पर चैनल शुरू किया। उनके कॉमेडी वीडियो हिट हो गए। इस वीडियो में तीन किरदार हैं। एक किशोर लड़की और उसके मम्मी-पापा। तीनों किरदार में लिली अलग-अलग अंदाज में नजर आती हैं। जहां किशोरी की भूमिका में उनका अंदाज बिंदास और अल्लहड़ है, वहीं मम्मी-पापा के किरदार में ठेठ पंजाबीपन झलकता है। तीनों के बीच होने वाली दिलचस्प नोक-झोंक ने दर्शकों को खूब हंसाया।

 लिली कहती हैं- मेरा मकसद किसी के माता-पिता का मजाक उड़ाना नहीं है। मैं तो माता-पिता व किशोर बच्चों के बीच होने वाले प्यार भरे झगड़ों को दिलचस्प अंदाज में पेश करती हूं, ताकि लोगों को हंसी आए। ऐसी नोक-झोंक दुनिया के हर घर में होती है।

उनके वीडियो कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, भारत समेत पूरी दुनिया में मशहूर हो गए। चैनल पर दर्शकों की संख्या लाखों-करोड़ों में पहुंच गई। सब्सक्राइबर संख्या भी तेजी से बढ़ने लगी। वह दुनिया के टॉप यू-ट्यूबर में शुमार होने लगीं। 

उन्हें दक्षिण एशिया की पहली यू-ट्यूब कॉमेडियन होने का तमगा मिला। आज उनके चैनल पर करीब एक करोड़, दस लाख सब्सक्राइबर हैं। उनकी कमाई भी करोड़ों में है। यू-ट्यूब पर मशहूर होने के बाद उन्होंने सोचा कि क्यों न पूरी दुनिया के सामने यह बात साझा की जाए कि वह डिप्रेशन का शिकार रही हैं। मगर मन में हिचक थी। आज भी हमारे समाज में मानसिक बीमारियों को लेकर बहुत सी गलतफहमियां हैं। लोगों को लगता है कि अगर रिश्तेदार व पड़ोसियों को यह बात पता चली कि कोई लड़का या लड़की डिप्रेशन से पीड़ित है, तो वे उसे पागल समङोंगे।

 मगर लिली ने हिम्मत दिखाई। एक वीडियो जारी करके उन्होंने खुलासा किया कि वह डिप्रेशन की शिकार रही हैं, पर अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे मानसिक बीमारियों का इलाज कराएं। इस वीडियो को शुरू में ही करीब 50 लाख लोगों ने देखा और उन्हें शुक्रिया कहा।

लिली बताती हैं, सबके सामने डिप्रेशन की बात स्वीकार करना मुश्किल था। पर मुङो लगा कि शायद मेरी कहानी सुनकर समाज में डिप्रेशन जैसी बीमारी को लेकर भ्रम दूर हो सकेगा। साल 2015 में यूनीकॉर्न कार्यक्रम के साथ वह विश्व भ्रमण पर निकलीं। तमाम देशों में स्टेज शो किए। इस विश्व भ्रमण पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी, जो हिट रही। 

2016 में फोर्ब्स ने उन्हें यू-ट्यूब पर सबसे अधिक कमाई वाली सेलिब्रिटी में शामिल किया। हाल में उनकी किताब- हाउ टु बी ए बावसे, ए गाइड टु कॉन्क्वेरिंग लाइफ रिलीज हुई, जो चर्चा में है।

VIA- HINDUSTAN PAPER

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CHETESHWAR PUJARA BIOGRAPHY IN HINDI


चेतेश्वर पुजारा

स्टार क्रिकेटर






मां की मौत के बाद पापा की जिम्मेदारी बढ़ गई।
 घर में सुबह जल्दी उठकर मां की तरह मेरे लिए नाश्ता बनाते।
 मेरी हर जरूरत का ध्यान रखते। 
स्टेडियम में पहुंचते ही कोच बनकर मुङो क्रिकेट की ट्रेनिंग देते। 
मेरी कामयाबी पापा की मेहनत का नतीजा है।





गुजरात के राजकोट शहर में जन्मे चेतेश्वर ने बचपन से परिवार में क्रिकेट का माहौल देखा। पिता अरविंद शिवलाल रणजी खिलाड़ी थे। घर में क्रिकेटरों का आना-जाना लगा रहता था। पापा के संग अक्सर स्टेडियम में मैच देखने का मौका भी मिलता था।

पांच साल की उम्र से उनका स्कूल जाना शुरू हुआ। पढ़ाई में तेज थे, पर मन बैट-बॉल में ज्यादा लगता था। पापा ने भी तय कर लिया कि अगर बेटा क्रिकेटर बनना चाहता है, तो उसे रोकूंगा नहीं। आठ साल की उम्र से उनकी ट्रेनिंग शुरू हो गई। क्लास में पढ़ाई के बाद वह सीधे क्रिकेट एकेडमी चले जाते और फिर शाम को पापा के संग घर लौटते। शुरुआती ट्रेनिंग पापा से मिली। बतौर कोच वह बहुत सख्त थे। घंटों प्रैक्टिस कराते और गलती होने पर सबके सामने खूब डांट लगाते। टाइम को लेकर बहुत पाबंद थे। सोकर देर से उठना या फिर ट्रेनिंग के लिए देरी करना उन्हें कतई पसंद नहीं था। 

चेतेश्वर बताते हैं, ट्रेनिंग के दौरान पापा सख्त कोच की तरह व्यवहार करते थे। एकेडमी में उनके लिए सभी बच्चे एकसमान थे। वह सभी खिलाड़ियों के कोच थे, सिर्फ मेरे नहीं।तेरह साल की उम्र में चेतेश्वर को राज्य की टीम में खेलने का मौका मिला। उनका प्रदर्शन उम्दा रहा। इस दौरान मां ने पापा के निर्देश के मुताबिक, बेटे के खान-पान और फिटनेस का पूरा ख्याल रखा। पापा का सपना था कि बेटा देश के लिए खेले, और चेतेश्वर जानते थे कि इस सपने को साकार करने के लिए अनुशासन जरूरी है। उन्होंने पिता के हर निर्देश का पूरी शिद्दत से पालन किया। 

चेतेश्वर बताते हैं, आज भी मैं खान-पान को लेकर बहुत अनुशासित हूं। सही समय पर सोना और डाइट के मुताबिक खाना मेरी आदत में शुमार है।समय के साथ उनके खेल में निखार आता गया। दरअसल, 12 साल की उम्र में उन्होंने सौराष्ट्र की टीम से खेलते हुए अंडर 14 मैच में बड़ौदा के खिलाफ 306 रन बनाकर सुर्खियां बटोरी थीं। एक तरफ पिता बेटे को महान क्रिकेटर बनाने का सपना बुन रहे थे, तो दूसरी तरफ मां का इस बात पर जोर था कि बेटा सफल खिलाड़ी बनने के साथ अच्छा इंसान भी बने। वह हमेशा उन्हें सलाह देतीं कि सुबह उठकर ईश्वर की प्रार्थना करने के बाद ही घर से बाहर निकलो। 

चेतेश्वर बताते हैं, मां बहुत धार्मिक थीं। उन्होंने मुङो प्रार्थना करना सिखाया। वह चाहती थीं कि मैं एक अच्छा इंसान बनूं। उनके लिए कामयाबी से ज्यादा महत्वपूर्ण यह बात थी। दिलचस्प बात यह रही कि उन्होंने खेल के साथ पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया। स्कूल में वह हर कक्षा में टॉपर रहे। कई साल तक क्लास मॉनीटर भी रहे।बात 2005 की है। उन दिनों वह अंडर 19 टीम में थे। अचानक मां की तबियत खराब हुई। जांच के बाद पता चला कैंसर है। यह सुनकर चेतेश्वर सन्न रह गए। मगर पापा ने यकीन दिलाया कि इलाज के बाद सब ठीक हो जाएगा। मां अस्प्ताल में थीं। इधर, चेतेश्वर को क्रिकेट मैच के लिए अक्सर बाहर जाना पड़ता था। रोजाना मां से बात होती थी फोन पर। वह मां को अपनी सेहत का ख्याल रखने को कहते और मां उन्हें दिल लगाकर खेलने को कहतीं।

 चेतेश्वर बताते हैं, उस दिन मैं भावनगर में खेल रहा था। सुबह मां से फोन पर बात हुई। शाम को खेल के बाद लौट रहा था कि रास्ते में मां के निधन की खबर मिली। उस लम्हे को बयां करना मुश्किल है।मां के गुजर जाने के बाद अचानक उनका जीवन बदल गया। तब वह महज 19 साल के थे। समझ में नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या होगा? क्या पहले की तरह पढ़ाई के साथ क्रिकेट खेल पाएंगे? घर के तमाम काम, जो मां बड़ी आसानी से संभाल लेती थीं, उन्हें अब कौन संभालेगा? उनकी छोटी-बड़ी जरूरतों का ध्यान कौन रखेगा? मगर पापा ने उनसे कहा, तुम कुछ मत सोचो। बस क्रिकेट पर ध्यान दो। मां का सपना पूरा करना है, तो बस बैट-बॉल पर ध्यान दो। 

पापा ने घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली। वह मां की तरह बेटे के खान-पान और कपड़ों का ध्यान रखने लगे। चेतेश्वर बताते हैं, मां के जाने के बाद घर में बस मैं और पापा रह गए। पापा जल्दी सुबह उठते, घर के काम निपटाते, मेरे लिए नाश्ता तैयार करते और फिर ऑफिस जाते। मेरे लिए उन्होंने मां और पिता, दोनों की भूमिका निभाई।

समय के साथ चेतेश्वर का क्रिकेट सफर रफ्तार पकड़ता गया। अक्तूबर, 2010 में उनकी इंट्री अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टेस्ट मैच के साथ हुई। 2012 में न्यूजीलैंड के खिलाफ खेलते हुए शतक जड़ा। उसी साल नवंबर में इंग्लैंड के खिलाफ खेलते हुए दोहरा शतक लगाया। साल 2013 में एक बार फिर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेलते हुए दोहरा शतक बनाया। जल्द ही वह देश के बेहतरीन बल्लेबाजों में शुमार किए जाने लगे। पिछले सप्ताह रांची टेस्ट में वह 500 गेंद खेलने वाले भारत के पहले बल्लेबाज बने। इस मैच में उन्होंने दोहरा शतक जमाया। चेतेश्वर कहते हैं, इस कामयाबी के पीछे मेरे पापा की मेहनत और उनका संघर्ष है। साथ ही, मां का आशीर्वाद भी मेरे साथ है, जो मुङो सफल खिलाड़ी और नेक इंसान बनाना चाहती थीं।।

साभार-हिंदुस्तान

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