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MEHARSHALA KARIM ALI BIOGRAPHY IN HINDI



मेहरशाला करीम अली
(ऑस्कर विजेता)



मां ने दूसरी शादी कर ली।
 दूसरे पिता से मेरी कभी नहीं पटी।
 मुझे लगता था कि मम्मी-पापा मुझे नहीं समझते हैं। 
खुद को अकेला महसूस करने लगा, 
इसलिए मन की बातें कागज पर दर्ज करने लगा। 
ऐसा करने पर दिल को बड़ा सुकून मिलता था।




मेहरशाला का जन्म कैलिफोर्निया के ऑकलैंड में हुआ। उनके बचपन का नाम मेहरशालासबाज गिलमोर था। पिता के पास कमाई का कोई खास जरिया नहीं था। पत्नी व बेटे की जिम्मेदारी उनके लिए बोझ थी। इस बात पर परिवार में झगड़े बढ़ने लगे। अंतत: एक दिन पिता घर छोड़कर चले गए। मेहरशाला तब तीन साल के थे। मां घर चलाने के लिए हेयर ड्रेसर का काम करने लगीं। यह पार्ट-टाइम नौकरी थी। मां की कमाई परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी नहीं थी। लिहाजा मेहरशाला का बचपन दुश्वारियों से घिरा रहा। 

पिता के जाने के बाद मां नानी के संग रहने आ गईं। देखते-देखते छह साल बीत गए। मेहरशाला अब नौ साल के हो चुके थे। बेटे को बेहतर जिंदगी देने और दोबारा घर बसाने के सपने के साथ मां ने दूसरी शादी कर ली। उन्होंने सोचा कि पति की कमाई से परिवार के आर्थिक हालात सुधरेंगे और बेटे को भी पिता का साया नसीब होगा। मगर हालात संभलने की बजाय और बिगड़ गए।सौतेले पिता से मेहरशाला की कभी नहीं बनी। नए पिता काफी सख्त मिजाज थे। वह अक्सर रोक-टोक करते थे, जो मेहरशाला को बिल्कुल पसंद नहीं था। 

मेहरशाला बताते हैं, मुझे अपने दोस्तों की तरह घूमने-फिरने की आजादी नहीं थी। इस बात को लेकर अक्सर पापा से बहस हो जाती थी। मां से भी मैं नाराज था, क्योंकि मुझे लगता था कि वह मुझे नहीं समझती हैं। मां की दूसरी शादी के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति थोड़ी सुधरी जरूर, पर हालात इतने भी अच्छे नहीं थे कि मेहरशाला अपनी हर ख्वाहिश पूरी कर पाते। उनके शौक को फिजूलखर्ची कहकर टाल दिया जाता। यह बात उन्हें बहुत बुरी लगती थी।

स्कूल में पढ़ाई के दौरान खेल में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी। उन्हें बास्केटबॉल और बाइकिंग पसंद थी। मगर रेसिंग के मामले में वह पड़ोस के बच्चों से अक्सर पीछे रह जाते। मेहरशाला बताते हैं, मुङो खेलना पसंद था, पर किसी को हराना मेरे मिजाज में नहीं रहा। हार-जीत के ख्याल से मेरा मन घबराने लगता था। वह जिस मोहल्ले में रहते थे, वह अश्वेतों का इलाका था। इलाके के बाहर वह कई बार नस्ली भेदभाव का शिकार बने।

 उनके मोहल्ले में ड्रग्स का कारोबार चलता था। पड़ोस के तमाम परिवार इस धंधे में शामिल थे। आए दिन पुलिस के छापे पड़ते। पुलिसवाले महिलाओं और युवकों को पकड़कर ले जाते। उनके एक दोस्त की मां भी ड्रग्स का काम करती थी। स्कूल के कई दोस्त ड्रग्स की चपेट में आ चुके थे। उन्हें यह सब बहुत खराब लगता था। 

मेहरशाला बताते हैं, मेरे स्कूल के कई साथी पढ़ाई और खेल में अच्छे होने के बाद भी ड्रग्स की लत की वजह से बरबाद हो गए। इस माहौल में मैं घुटन महसूस करने लगा था।इलाके में ड्रग्स के साथ-साथ अपराध भी बढ़ने लगे। उनके जान-पहचान के कई लोग एड्स की चपेट में आ गए। तब मेहरशाला 12 साल के थे। उनका मन उचटने लगा। वह अनिद्रा के शिकार हो गए। मां-पिता से उनकी दूरी बढ़ने लगी थी। कोई करीबी दोस्त भी नहीं था, जिससे वह अपने मन की बात कह पाते।

 फिर एक दिन उन्होंने अपने मन की सारी बातें एक कागज पर लिख डाली। ऐसा करके उन्हें अच्छा महसूस हुआ। वह अक्सर मन का दर्द कागज पर लिखने लगे। इस आदत ने उनके अंदर नई ऊर्जा पैदा की। अनजाने में लिखी गई ये बातें कविता या डायलॉग बन जाया करती थीं। धीरे-धीरे लेखन, अभिनय व संगीत की ओर उनका रुझान बढ़ने लगा। 

माता-पिता उनकी भावनाओं से अनजान थे। उन्हें लगता था कि बेटा करियर को लेकर गंभीर नहीं है। मेहरशाला बताते हैं, मम्मी-पापा के ख्याल मुझसे अलग थे। हमारे बीच इतनी दूरी आ गई कि मैंने बरसों उनसे बात नहीं की।वर्ष 1996 में उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में डिग्री हासिल की। 

इस बीच कॉलेज में उनकी मुलाकात एक लड़की से हुई। उसका नाम अमेतस शमी करीम था। दोनों की खूब पटने लगी। वे एक-दूसरे के धर्म पर खुलकर बातें करते। उन्हें पहली बार कोई ऐसा साथी मिला था, जो उनके दिल की बातें समझता था। उनके संग वक्त बिताना उन्हें अच्छा लगता था। लंबी दोस्ती के बाद उन्होंने अमेतस से शादी कर ली। अब उन दोनों की एक बेटी है। यही वह दौर था, जब धर्म के प्रति उनकी भावना बदलने लगी। 

फिर एक दिन उन्होंने ईसाई धर्म छोड़कर इस्लाम कबूल करने का फैसला किया। कई साल तक उन्होंने यह बात घरवालों से छिपाकर रखी। पहली बार जब मां को पता चला कि बेटे ने धर्म बदल लिया है, तो उन्हें अच्छा नहीं लगा। करीब दस साल लगे उन्हें अपने बेटे को दोबारा अपनाने में।

मेहरशाला कॉलेज के दिनों से ही स्टेज शो करने लगे थे। फिर कैलिफोर्निया के शेक्सपियर थियेटर में एक्टिंग की ट्रेनिंग ली। इस दौरान उनके कई म्यूजिक अलबम रिलीज हुए। मगर उनका सपना था अभिनय करना। वर्ष 2008 में उनकी पहली फिल्म डेविड फिंचर रिलीज हुई। दर्शकों ने उसे काफी पसंद किया। इसके बाद शोहरत व बुलंदियां कदम चूमने लगीं। पिछले हफ्ते मूनलाइट फिल्म में बेहतरीन अदाकारी के लिए उन्हें ऑस्कर से नवाजा गया।
साभार - हिंदुस्तान अख़बार 

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