Tuesday, August 2, 2016

RENUKA YADAV BIOGRAPHY IN HINDI

रेणुका यादव 

(हॉकी  खिलाडी)


मेरी राह कभी आसान नहीं रही।

 मैं गरीब परिवार से आती हूं, 

जहां दो वक्त के खाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

 खुशनसीब हूं कि माता-पिता ने कभी मुङो खेलने या पढ़ाई से नहीं रोका।






छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में पली-बढ़ी रेणुका का परिवार बहुत गरीब था। रेणुका की मां दूसरों के घरों में झाड़-पोंछा लगाने का काम करती थीं। पिता मजदूरी करके रोजी-रोटी कमाते थे। बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो पाता था। माता-पिता खुद कभी स्कूल नहीं गए, मगर मन में बेटी को बेहतर जिंदगी देने की ख्वाहिश थी। पापा मोतीलाल बिल्कुल नहीं चाहते थे कि बेटी बड़ी होकर मां की तरह दूसरों के घरों में काम करे। इसलिए उन्हें स्कूल भेजा।

राजनांदगांव में बेटियों को पढ़ाने का रिवाज नहीं था। परिवार के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि बेटी को कस्बे के प्राइवेट स्कूल में भेज सकें। लिहाजा पास के प्राइमरी स्कूल में रेणुका का दाखिला हो गया। कक्षा एक से पांच तक रेणुका ने उसी स्कूल में पढ़ाई की। इसके बाद महारानी हाई स्कूल में पढ़ने लगीं। वह पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहती थीं। रेणुका शहर के बड़े कॉलेज में पढ़ने के सपने देखने लगी थीं। मगर घर की माली हालत अच्छी न होने की वजह से कई बार लगा कि पढ़ाई बीच में ही छूट जाएगी। इस बीच पिता ने दूध बेचने का काम शुरू कर दिया। पापा की मदद के लिए रेणुका भी घर-घर जाकर दूध बेचने लगीं। 

स्कूल जाने से पहले वह सुबह-सुबह पापा की साइकिल पर सवार होकर दूध बेचने जातीं और लौटकर फटाफट स्कूल के लिए निकल पड़तीं। उन दिनों वह कक्षा सात में पढ़ रही थीं। स्कूल के खेल टीचर ने उनसे पूछा, क्या तुम हॉकी खेलना चाहोगी? रेणुका के लिए यह खेल नया था, मगर उन्होंने बिना सोचे ‘हां’ कह दिया। शुरुआत में दिक्कत आई, लेकिन कुछ दिनों के अभ्यास के बाद मजा आने लगा। उनके खेल टीचर भूषण राव कहते हैं- रेणुका के अंदर शुरू से लगन थी। जब उसने हॉकी खेलनी शुरू की, तो वह खेल के प्रति भी गंभीर हो गई। जल्द ही स्कूल की हॉकी टीम में उनका चयन हो गया। जिले के स्कूल टूर्नामेंट में उनका प्रदर्शन शानदार रहा। खुश होकर खेल टीचर ने उन्हें हॉकी स्टिक खरीदकर दी। रेणुका बताती हैं- पहली बार नई हॉकी स्टिक पाकर मैं बहुत खुश हुई। दौड़ते हुए घर गई और पापा को स्टिक से खेलकर दिखाया।








दसवीं पास करने के बाद ग्वालियर की गल्र्स हॉकी एकेडमी में उनका चयन हो गया। शुरू में पापा बेटी को बाहर भेजने के नाम पर घबराए। सवाल था, बेटी घर से दूर अकेली कैसे रहेगी? पर जब उन्हें पता चला कि रेणुका की तरह दूसरी लड़कियां भी बाहर रहकर ट्रेनिंग लेती हैं, तो फिर वह राजी हो गए। उनकी ट्रेनिंग का सारा खर्च खेल एकेडमी ने उठाया। रेणुका कहती हैं- मैं शुक्रगुजार हूं अपने गुरु भूषण राव का, जिन्होंने मुङो हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। अगर वह नहीं होते, तो मैं यह मुकाम कभी नहीं हासिल कर पाती। ग्वालियर पहुंचने के बाद रेणुका एक नई दुनिया से रूबरू हुईं। 

यहां ट्रेनिंग की बेहतरीन सुविधाएं थीं। काफी अनुभवी कोच मिले। पहली बार उन्हें पता चला कि खेल में अच्छे प्रदर्शन के लिए फिटनेस पर ध्यान देना कितना जरूरी है। अब उनकी दिनचर्या बदल चुकी थी। खान-पान और ट्रेनिंग को लेकर सख्त नियम थे। रेणुका कहती हैं- ग्वालियर पहुंचने के बाद मैंने महसूस किया कि मैं हॉकी के लिए ही बनी हूं। मेरे लिए इससे बेहतर कोई और खेल नहीं हो सकता। एकेडमी में राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आए खिलाड़ियों के संग खेलने का मौका मिला। अपनी कमियों और दूसरे की खूबियों को समझते हुए रेणुका आगे बढ़ने लगीं। समय के साथ उनका प्रदर्शन बेहतर होता गया।अब हॉकी ही उनका जीवन था। तड़के सुबह उठना, लंबी दौड़ लगाना, व्यायाम करना व फिर अभ्यास करना। यही उनकी दिनचर्या थी। घर पर बात करने के लिए फोन नहीं था। पापा दो-तीन महीने में एक बार मिलने आ जाते थे। हर बार यही कहते- बेटा, तुम घर की चिंता मत करना। बस, अपने खेल पर ध्यान दो। 

आमतौर पर खिलाड़ी दिन में दो बार अभ्यास करते थे, पर रेणुका के अंदर अजीब सी धुन थी। तय समय के अलावा जब भी मौका मिलता, वह अभ्यास करने लगतीं। सफलता का सफर शुरू हो चुका था। पहले राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय मैचों में लगातार जीत हासिल की। समय-समय पर मेडल जीतने की खबरें राजनांदगांव तक पहुंचती रहतीं। अब वह इलाके की सेलिब्रिटी बिटिया बन चुकी थीं। रेणुका कहती हैं- मेरी राह कभी आसान नहीं रही। मैं गरीब परिवार से आती हूं, जहां दो वक्त के खाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। खुशनसीब हूं कि माता-पिता ने कभी मुङो खेलने या पढ़ाई से नहीं रोका। घर से दूर रहकर भी मन में हर पल मां-पापा की चिंता बनी रहती थी। जब खेल कोटे से रेणुका को मुंबई सेंट्रल रेलवे में टिकट कलेक्टर की नौकरी मिली, तो वह परिवार की आर्थिक मदद करने लगीं। हाल में उन्हें ओलंपिक के लिए भारतीय महिला हॉकी टीम में शामिल किया गया है। वह ओलंपिक में हिस्सा लेने वाली छत्तीसगढ़ की पहली महिला खिलाड़ी हैं। रेणुका कहती हैं- ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करना गर्व की बात है। मैं अपने देश के लिए मेडल जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ंगी।






साभार -हिंदुस्तान अख़बार


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