Saturday, December 3, 2016

NIKKI HALEY BIOGRAPHY IN HINDI



निक्की हेली

(यूएन में अमेरिकी राजदूत)


मेरे माता-पिता भारत से अमेरिका आए थे।
 वे सिख हैं। बचपन में हम गुरुद्वारे जाया करते थे। 
ये बातें हमने कभी नहीं छिपाईं।
 भारत से रिश्ता होना मेरे लिए गर्व की बात है। 
मैंने हमेशा प्रवासियों के हक की आवाज उठाई।
 आगे भी मैं इन मुद्दों पर काम करूंगी।



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निक्की के माता-पिता पंजाब के रहने वाले थे। उनका परिवार अमृतसर शहर में रहता था। पिता अजित सिंह रंधावा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। पीएचडी करने के लिए उन्होंने कई विदेशी यूनिवर्सिटी में आवेदन किए। उनका सपना पूरा हुआ। ब्रिटिश यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया से स्कॉलरशिप मिल गई और वह पत्नी राजकौर के संग कनाडा चले गए। 1969 में अमेरिका की साउथ कैरोलिना में प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। दो साल बाद उनके घर बेटी पैदा हुई। सब उसे प्यार से निक्की बुलाने लगे, जबकि स्कूल में उनका नाम नम्रता रंधावा था। वे साउथ कैरोलिना के बैमबर्ग शहर में रहते थे। पड़ोस में ज्यादातर लोग ईसाई धर्म को मानने वाले थे। 

हर रविवार को नन्ही निक्की मम्मी-पापा के संग गुरुद्वारे जाया करती थीं। स्कूल के दिनों से ही उन्हें नस्ली भेदभाव का एहसास होने लगा। तब वह पांच साल की थीं। स्कूल में बच्चों की फैशन प्रतियोगिता हुई। बच्चों को सुंदर ड्रेस के साथ मंच पर कैटवॉक करना था। निक्की और उनकी छोटी बहन सिमरन ने भी इसमें हिस्सा लिया। मां ने दोनों बेटियों को बड़ी शिद्दत से तैयार किया। उन्हें कैटवॉक करने और बोलने का अभ्यास भी कराया। नियम के मुताबिक, प्रतियोगिता में एक श्वेत और एक अश्वेत लड़की को मिस लिटिल बैमबर्ग का खिताब मिलना था। मगर जज ने निक्की की दावेदारी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह लड़की तो न तो श्वेत है और न अश्वेत। नन्ही निक्की सुबकते हुए लौट आईं। वह नहीं समझ पाईं कि ऐसा क्यों हुआ?

 यही नहीं, स्कूल में साथी बच्चों की छेड़छाड़ से बचने के लिए उनके छोटे भाई को अपने केश कटवाने पड़े। हालांकि उनके परिवार ने इन बातों को कभी अपने बच्चों के मन पर हावी नहीं होने दिया। मां ने बच्चों को भारतीय परंपराओं के साथ-साथ अमेरिकी रिवाज में ढालने की कोशिश की, ताकि वे बाकी बच्चों के संग आसानी से सामंजस्य बिठा सकें। निक्कीबताती हैं, बचपन में हम गुरुद्वारे जाया करते थे। बाद में हम चर्च भी जाने लगे। हम सिख हैं,यह बात हमने कभी किसी से नहीं छिपाई। बल्कि यह तो मेरे लिए गर्व की बात रही है। 

उनकी मां ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की थी। अमेरिका जाने के बाद उन्होंने शिक्षाशास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की और साउथ कैरोलिना के एक पब्लिक स्कूल में पढ़ाने लगीं। पढ़ाई के अलावा उन्हें फैशन डिजाइनिंग में भी दिलचस्पी थी। इसी क्षेत्र में कुछ नया करने के इरादे से उन्होंने 1976 में लेडीज कपड़ों की एक दुकान खोली। दुकान चल पड़ी। शुरुआत में यह एक छोटी-सी बुटीक थे, 1980 में यह इग्जोटिका इंटरनेशनल ब्रांड बन गई। स्कूल के बाद जब भी निक्की को मौका मिलता, वह मां की बुटीक में पहुंच जातीं उनकी मदद करने। जल्द ही वह ग्राहकों से बात करना और मोलभाव करना सीख गईं। मां ने उन्हें अकाउंट की जिम्मेदारी दे दी।

 इस बीच निक्की ने क्लेमसन यूनिवर्सिटी से अकांउटिंग में स्नातक डिग्री हासिल की। एक वेस्ट मैनेजमेंट कंपनी में नौकरी मिली, पर यहां मन नहीं लगा। वर्ष 1994 में वह मां की कंपनी में चीफ फाइनेंस ऑफिसर बनीं। मां के अनुभव और बेटी के नए नजरिये ने बिजनेस को नई बुलंदियों तक पहुंचाया। वर्ष 1996 में उनकी मुलाकात माइकल हेली से हुई, जो उस समय आर्मी नेशनल गार्ड में अफसर थे। दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई। बाद में यह दोस्ती प्यार में बदल गई। वे एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते थे। उन्होंने सिख और ईसाई धर्म के रीति-रिवाज के मुताबिक शादी की। शादी समारोह दो बार हुआ, पहले गुरुद्वारे में और फिर चर्च में। इसके बाद नम्रता रंधावा निक्की हेली के नाम से मशहूर हो गईं। उनके दो बच्चे हैं- रेना और नलिन। बतौर बिजनेस वुमेन निक्की ने खूब शोहरत बटोरी। उनकी कामयाबी महिलाओं के लिए मिसाल बनी। 

उद्यमियों की समस्याओं खासकर टैक्स कम करवाने के लिए उन्होंने कड़ा संघर्ष किया। वर्ष 1998 में उन्हें ऑरेंजबर्ग काउंटी के चैंबर ऑफ कॉमर्स के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल किया गया। साल 2003 में वह नेशनल एसोसिएशन ऑफ वुमेन बिजनेस ऑनर्स की कोषाध्यक्ष बनीं। बाद में साउथ कैरोलिना चेप्टर के महिला बिजनेस एसोसिएशन की अध्यक्ष बनीं। अब वह पूरे प्रांत में लोकप्रिय हो चुकी थीं। 2004 में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उन्होंने साउथ कैरोलिना हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव का चुनाव लड़ा। वर्ष 2010 में वह इस राज्य की पहली भारतीय-अमेरिकी महिला गवर्नर बनीं। साल 2014 में वह फिर गवर्नर चुनी गईं। पिछले सप्ताह अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र में राजदूत नियुक्त करने का एलान किया।

 इतिहास में पहली बार किसी भारतीय-अमेरिकी महिला को यह जिम्मेदारी मिली है। निक्की कहती हैं, अमेरिका में बड़ा बदलाव हो रहा है। ट्रंप चाहते हैं कि मौजूदा माहौल में मैं संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका का नजरिया पेश करूं। खुशी है कि मुङो इस जिम्मेदारी के काबिल माना गया। ट्रंप ने निक्की की तारीफ करते हुए उन्हें बेहतरीन नेता बताया।

साभार - हिंदुस्तान अख़बार 

Sunday, November 6, 2016

AZIM PREMJI BIOGRAPHY IN HINDI


अजीम प्रेमजी

 ( चेयरमैन, विप्रो लिमिटेड )

हम हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। 
यह सोच बदलनी होगी। अगर आप समर्थ हैं। 
आपके पास दौलत है, तो समाज के लिए कुछ करिए। 
जब आपके पास पैसा और ताकत, दोनों हों,
 तब समाज के प्रति आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।



उन दिनों देश में आजादी का आंदोलन चरम पर था। जनता अंग्रेजों की सत्ता से निजात पाने को बेताब थी। गलियों में ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे गूंज रहे थे। 24 जुलाई, 1945 को मुंबई के एक प्रतिष्ठित निजारी इस्माइली शिया मुस्लिम परिवार में अजीम प्रेमजी का जन्म हुआ।
 उनके पिता मोहम्मद हाशिम प्रेमजी तेल और साबुन का कारोबार करते थे। बेटे का जन्म परिवार के लिए खुशियों की सौगात लेकर आया। अजीम जब दो साल के थे, तब देश आजाद हुआ। लेकिन देश विभाजन की मांग ने आजादी के जश्न को रोशन होने से पहले ही बुझा दिया। हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हो गए। सांप्रदायिक नफरत और हिंसा के बीच तमाम मुस्लिम परिवार अपनी सरजमीं छोड़ पाकिस्तान रवाना होने लगे। उदारवादी विचारों वाले अजीम के पिता देश के हालात से बहुत आहत थे।

 विभाजन के बाद पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान आने का न्योता दिया। करीबी रिश्तेदारों की तरफ से मशवरे आए। कहा गया, हिन्दुस्तान में गैरों के बीच रहकर क्या करोगे? पाकिस्तान चले आओ, यहां अपनी कौम के लोगों के बीच जीने का मौका मिलेगा। लेकिन हाशिम ने भारत में ही रहने का फैसला किया। जिस साल अजीम का जन्म हुआ, उसी साल पिता ने महाराष्ट्र के जलगांव जिले में ‘वेस्टर्न इंडियन वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ की स्थापना की। यह कंपनी ‘सनफ्लावर वनस्पति’ और कपड़े धोने के साबुन’ बनाती थी।

 स्कूली पढ़ाई के बाद वह 12वीं कक्षा में पहुंच चुके थे। पिता चाहते थे कि कारोबार की कमान संभालने से पहले बेटा अमेरिका जाकर तालीम हासिल करे। अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचकर अजीम को नया माहौल मिला। उन दिनों अमेरिकियों के लिए कंप्यूटर आम चीज थी, जबकि भारत में कंप्यूटर का चलन बिल्कुल न था। पहली बार उन्होंने आईटी के महत्व को जाना। सुनहरे भविष्य के सपनों के साथ वह पढ़ाई में जुट गए। परदेस में पढ़ाई पूरी करने के बाद वह स्वदेश लौटकर कुछ नया काम शुरू करना चाहते थे।

 इस बीच अचानक पिताजी के इंतकाल की खबर आई। बीच में ही पढ़ाई छोड़कर अजीम घर लौट आए। वह कहते हैं, तब मैं 21 साल का था। कई लोगों ने कहा कि विदेश में पढ़ाई की है। तेल-साबुन के बिजनेस में मत पड़ो। बेहतर है कि मोटे वेतन और बढ़िया सुविधाओं वाली नौकरी कर लो। पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि बिजनेस संभालने का मेरा फैसला सही था। उन्होंने पिता के कारोबार की कमान थाम ली। काम करने का अंदाज ऐसा कि सब कहने लगे, बेटा तो पिता से भी ज्यादा तरक्की करेगा।

उन दिनों देश आईटी क्षेत्र में काफी पीछे था। अमेरिका से लौटे अजीम को इस क्षेत्र में बेशुमार संभावनाएं नजर आईं। उन्होंने इसी क्षेत्र में कंपनी के विस्तार का फैसला किया। सवाल उठा, भारत जैसे देश में, जहां बिजली-पानी के लिए तरसना पड़ता है, वहां भला कंप्यूटर कौन चलाएगा? पर अजीम तय कर चुके थे।

1980 में उन्होंने अपनी कंपनी का नाम बदलकर विप्रो लिमिटेड कर दिया। उनकी कंपनी अमेरिका के सेंटिनल कंप्यूटर कॉरपोरेशन के साथ मिलकर मिनी-कंप्यूटर बनाने लगी। लोगों की आशंकाएं गलत साबित हुईं। कारोबार बढ़ चला। देखते-देखते विप्रो देश की बड़ी कंपनी बन गई।

अजीम कहते हैं- यदि लोग आपके लक्ष्य पर हंस नहीं रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि लक्ष्य बहुत छोटे हैं। इसलिए किसी के हंसने की परवाह मत कीजिए

अजीम भारत के धनाढ्यों में शुमार होने लगे। सन 1999 से लेकर सन 2005 तक वह भारत के सबसे धनी व्यक्ति रहे। सबसे बड़ी बात यह रही कि उन्होंने धन-दौलत के साथ सम्मान भी कमाया। अपनी कंपनी के कर्मचारियों के लिए वह दुनिया के सबसे अच्छे बॉस, तो आम लोगों के लिए सबसे अच्छे इंसान साबित हुए।

साल 2001 में ‘अजीम प्रेमजी फाउंडेशन’ की स्थापना की। इसका मकसद गरीब व बेसहारा लोगों की मदद करना है। यह फाउंडेशन कई राज्यों में सरकार के साथ मिलकर शिक्षा क्षेत्र में काम करता है। अजीम कहते हैं- हमारे देश में लाखों बच्चे स्कूल नहीं जाते। देश को आगे ले जाने के लिए शिक्षा सबसे जरूरी जरिया है।

जून, 2010 में दुनिया के दो सबसे बड़े दौलतमंद कारोबारी बिल गेट्स और वारेन बफेट ने ‘द गिविंग प्लेज’ अभियान शुरू किया। यह अभियान दुनिया के अमीर लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे अपनी अकूत संपत्ति का कुछ हिस्सा परोपकार पर खर्च करें। अजीम इस अभियान में शामिल होने वाले पहले भारतीय बने।

सन 2010 में उन्होंने देश में स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए करीब दो अरब डॉलर का दान दिया। साल 2013 में उन्होंने अपनी दौलत का 25 फीसदी दान में दे दिया। अजीम कहते हैं, मुङो लगता है कि अगर ईश्वर ने हमें दौलत दी है, तो हमें दूसरों के बारे में जरूर सोचना चाहिए। ऐसा करके ही हम एक बेहतर दुनिया बना पाएंगे। टाइम मैग्जीन ने दो बार उन्हें दुनिया के शीर्ष 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया। उन्हें पद्म भूषण व पद्म विभूषण से सम्मानित किया चुका है।प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी
हम हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। यह सोच बदलनी होगी। अगर आप समर्थ हैं। आपके पास दौलत है, तो समाज के लिए कुछ करिए। जब आपके पास पैसा और ताकत, दोनों हों, तब समाज के प्रति आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है।




पुरस्कार और सम्मान

  • बिजनेस वीक द्वारा प्रेमजी को महानतम उद्यमियों में से एक कहा गया है
  • सन 2000 में मणिपाल अकादमी ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया सन
  • सन 2005 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया
  • 2006 में ‘राष्ट्रीय औद्योगिक इंजीनियरिंग संस्थान, मुंबई, द्वारा उन्हें लक्ष्य बिज़नेस विजनरी से सम्मानित किया गया
  • 2009 में उन्हें कनेक्टिकट स्थित मिडलटाउन के वेस्लेयान विश्वविद्यलाय द्वारा उनके उत्कृष्ट लोकोपकारी कार्यों के लिए डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया
  • सन 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वारा देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया
  • सन 2013 में उन्हें ‘इकनोमिक टाइम्स अचीवमेंट अवार्ड’ दिया गया
  • सन 2015 में मैसोर विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया

निजी जीवन

अजीम प्रेमजी का विवाह यास्मीन के साथ हुआ और दंपत्ति के दो पुत्र हैं – रिषद और तारिक। रिषद वर्तमान में विप्रो के आई.टी. बिज़नेस के ‘मुख्य रणनीति अधिकारी’ हैं।

टाइम लाइन (जीवन घटनाक्रम)


1945: 24 जुलाई को अजीम रेमजी का जन्म मुंबई में हुआ

1966: अपने पिता की मृत्यु के बाद अमेरिका से पढ़ाई छोड़ भारत वापस आ गए

1977: कंपनी का नाम बदलकर ‘विप्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ कर दिया गया

1980: विप्रो का आई.टी. क्षेत्र में प्रवेश

1982: कंपनी का नाम ‘विप्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड’ से बदलकर ‘विप्रो लिमिटेड’ कर दिया गया

1999-2005: सबसे धनी भारतीय रहे

2001: उन्होंने ‘अजीम प्रेमजी फाउंडेशन’ की स्थापना की

2004: टाइम मैगज़ीन द्वारा दुनिया के टॉप 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया

2010: एशियावीक के विश्व के 20 सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों की सूचि में नाम

2011: टाइम मैगज़ीन द्वारा दुनिया के टॉप 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल किया

2013: प्रेमजी ने अपने धन का 25 प्रतिशत भाग दान कर दिया और अतिरिक्त 25 प्रतिशत अगले पांच सालों में दान करने की भी घोषणा की


साभार - हिंदुस्तान अख़बार 

Saturday, November 5, 2016

BOB DYLAN BIOGRAPHY IN HINDI

बॉब डिलन

( नोबेल पुरस्कार विजेता )

ज्यादातर लोग वे बातें करते हैं, जिन पर उनका यकीन ही नहीं होता। इसलिए वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। दरअसल, वे अपनी सुविधा के अनुसार काम करते हैं। इससे किसी का भला नहीं होगा, न आपका और न समाज का।

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अमेरिका के एक साधारण यहूदी परिवार में जन्मे बॉब के बचपन का नाम रॉबर्ट ऐलन जिमरमन था। बाद में उन्होंने अपना नाम बॉब डिलन रख लिया। पिता अबराम और मां बीट्रीस का संगीत से कोई नाता न था। अलबत्ता उनके घर में रेडियो पर गीत जरूर सुने जाते थे। नन्हे बॉब को बचपन से गीत सुनने की लत लग गई। खेल-कूद की दुनिया से दूर वह घंटों रेडियो से चिपके रहते थे। वह 1940 का दौर था। उन दिनों अमेरिकी समाज में अश्वेतों की दशा खराब थी। वे भेदभाव और दुर्भावना के शिकार थे। बॉब का बालमन कभी इसे स्वीकार नहीं कर पाया। 

स्कूल के दिनों में उन्होंने दोस्तों के संग मिलकर एक म्यूजिक बैंड बनाया। गीतों के जरिये वह मन की बातें बयान करने लगे। तब बॉब डिलन दसवीं में थे। स्कूल में म्यूजिक टैलेंट शो हुआ। उन्होंने तैयारी की, पर ऑडिशन में रिजेक्ट हो गए। दुख हुआ, पर इससे संगीत के प्रति उनकी दीवानगी कम नहीं हुई। साल 1959 में मिनीसोटा यूनिवर्सिटी में पढ़ने पहुंचे। यहां उनके विचारों को नया आसमान मिला। बड़ी खूबसूरती से उन्होंने अपने विचारों को गीतों में ढाला। शुरुआती दिनों में बॉब कॉलेज के पास एक कॉफी हाउस में गाया करते थे। सुनने वालों के लिए हमेशा यह कौतुहल रहा कि मासूम-सी सूरत वाला यह युवा प्रेम गाने की बजाय विद्रोही विचारों को स्वर क्यों दे रहा है?

 1961 में कॉलेज की पढ़ाई के बाद संगीत में करियर बनाने के इरादे से वह न्यूयॉर्क पहुंचे। यहां एक म्यूजिक क्लब में काम मिला। 1961 में पहला म्यूजिक एलबम आया। बॉब बाकी गायकों की तरह दूसरों के लिखे गीत नहीं, बल्कि अपने गीत गाते थे। उनके गीतों में हमेशा एक खास किस्म का अक्खड़पन रहा। इसी अंदाज में वह आम लोगों के दुख-दर्द बयां करने लगे। उनके गीतों में राजनीतिक, सामाजिक, दार्शनिक और साहित्यिक विधा का खूबसूरत मेल दिखा। गीत लिखने के अलावा वह पेंटिंग के भी शौकीन रहे। बॉब के ज्यादातर मशहूर गीत 1960 के दशक में लिखे गए। 

यह वह दौर था, जब अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में अश्वेत आंदोलन चरम पर था। अश्वेत समुदाय के लोग नागरिक अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर थे। बॉब के गीतों में इस आक्रोश को आवाज मिली। वह मार्टिन लूथर किंग के विचारों के कायल थे। कहते हैं कि लूथर किंग के ऐतिहासिक भाषण आई हैव अ ड्रीम के दौरान वह उनके साथ मंच पर मौजूद थे। यही वह दौर था, जब श्वेत नागरिक भी वियतनाम में अमेरिकी दखल के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। बॉब ने इस जन-असंतोष को अपने गीतों में बड़ी संजीदगी के साथ पेश किया। कुछ लोग उन्हें विद्रोही गीतकार भी कहते हैं। लोक संगीत से लेकर पॉप व रॉक ऐंड रोल गीतों में उन्होंने हालात और समय के मिजाज को व्यक्त किया। उनके गीत ब्लोइंग इन द विंड और द टाइम्स दे आर अ चेंजिंग उस दौर के आंदोलनों के नारे बन गए। जब भी मौका मिला, उन्होंने सामाजिक असमानता के प्रति नाराजगी जाहिर की। 

बॉब कहते हैं, समानता सिर्फ लोगों की बातों में दिखती है। हम सबमें बस एक ही समानता है कि हम सबको मरना है। बाकी सब असमान है। अमेरिकी अवाम के लिए वह सिर्फ गायक कभी नहीं रहे। उनका संगीतमय सफर अपने आप में एक आंदोलन रहा। उनकी कविताओं और गीतों में व्यवस्था बदलने की बेचैनी दिखी, तो प्रशासन को चुनौती देने का साहस भी नजर आया। दासता के खिलाफ वह हमेशा मुखर रहे। बॉब कहते हैं, कोई आजाद नहीं है। यहां तक कि परिंदे भी आसमान की जंजीरों में जकड़े हैं। पिछले साठ साल में उन्होंने शोहरत की बुलंदियों को छुआ। वह दुनिया में सबसे अधिक बिकने वाले गीतकारों में शुमार हैं। सबसे बड़ा सम्मान तो यह है कि दुनिया ने उन्हें आम जनता का गीतकार माना।

 सबसे ज्यादा शोहरत मिली 1965 में, जब उनके छह मिनट के गीत लाइक अ रोलिंग स्टोन ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। उनकी कविताओं में ऐसा जादू था, जिसे सुनकर पॉप संगीत पर थिरकने वाले युवा लोक गीतों के दीवाने हो गए। बॉब ने दुनिया का पहला प्रेम-विरोधी गीत इट एंट मी बेब लिखा। इसे पूरी दुनिया ने सराहा। उनके गीत विजन्स ऑफ जोआना को दुनिया का सबसे महान गीत कहा गया। संगीत के इस लंबे सफर में उन्होंने खुद को सुर्खियों से दूर रखने की पूरी कोशिश की। बॉब कहते हैं, सुर्खियां एक तरह से बोझ हैं, इसलिए मैं खुद को इससे दूर रखता हूं।

 आसमान छूती बुलंदियों और शोहरत के बीच बॉब ने हमेशा सत्ता से दूरी बनाए रखी। वह कभी सत्ता के दबाव में नहीं आए। वह हमेशा बड़े लोगों के करीब आने से बचते रहे। राष्ट्रपति बराक ओबामा एक किस्सा बताते हैं- एक बार मैं बॉब के शो में गया। वह अपना कार्यक्रम देकर मंच से उतरे, दर्शकों के बीच बैठे, मुझसे हाथ मिलाया और बाहर चले गए। उन्होंने मेरे साथ बैठने या फोटो खिंचवाने की जरूरत नहीं समझी। मुङो उनका यह अंदाज अच्छा लगा। इस साल बॉब को साहित्य के नोबेल के लिए चुना गया है। वह एकमात्र ऐसे शख्स हैं, जिन्हें ऑस्कर, नोबेल और ग्रैमी, तीनों अवॉर्ड से नवाजा गया है।

साभार - हिंदुस्तान अख़बार 

Tuesday, September 13, 2016

Jitne Wala Hi nahi

Wo Dost Meri Najaro Me

Sab Kuch Mil Jaye To Jine Ka Kya Maza

Mujhe Itna Bhi Niche Mat Girao

Juba Bhi na Bole To koi Bat Nahi

Jo Tslabo Par Chaukidari Karte Hai

Duniya ki Har Chij Thokar Lagne se Tut Jaya Karti Hai

Yu to Sikhane Ko Jindagi Bahut Kuchh Sikhati Hai

Sabab Talash Karo

सबब तलाश करो

Riste Chahe Kitne Bhi Bure Ho

Monday, September 12, 2016

THERESA MAY BIOGRAPHY IN HINDI


थेरेसा मे

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री 

मेरे पापा चर्च में पादरी थे। उन्होंने मुझे  हमेशा लोगों की सेवा करना सिखाया। मैं एक साधारण परिवार से हूं, इसलिए आम लोगों की दिक्कतें समझती हूं। मैं महिला हूं या मुझे गंभीर डायबिटीज है, इससे मेरे काम पर कोई असर नहीं होगा।



Click here to enlarge image ब्रिटेन के इस्टबार्न इलाके में जन्मी थेरेसा के पिता चर्च में पादरी थे। मां घर संभालती थीं। घर में पूजा-पाठ का माहौल था। वह कैथोलिक स्कूल में पढ़ीं। दिन की शुरुआत प्रार्थना से होती थी। पापा से खूब बनती थी उनकी। अक्सर उनके संग चर्च जातीं और छुट्टी के दिन नृत्य-नाटिकाओं में अभिनय करतीं। गांव वाले नन्ही थेरेसा की भाव-भंगिमा पर मोहित हो जाते। थेरेसा को बचपन से सजना-संवरना पसंद था। पापा की सीमित कमाई थी। परिवार का खर्च आसानी से चल जाता था, पर फिजूलखर्ची के लिए कोई जगह नहीं थी।
 बेटी अब दसवीं में पढ़ने लगी थी। उसे जेब खर्च की जरूरत थी। इसलिए पढ़ाई के साथ बेकरी में पार्टटाइम काम करने लगीं। पापा का सपना था, बेटी किसी बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़े। थेरेसा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचीं। यहां उनकी पहचान एक बेबाक और निडर छात्र की बनी। यूनिवर्सिटी में उनका तीसरा साल था। वह भूगोल से स्नातककर रही थीं। 1976 की बात है। एक डिस्को पार्टी में उनकी मुलाकात फिलिप से हुई। कहते हैं कि इस युवक से उनका परिचय बेनजीर भुट्टो ने करवाया था। वही बेनजीर, जो बाद में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं। थेरेसा और फिलिप में गहरी दोस्ती हो गई। घरवालों को भी फिलिप पसंद आ गए। 1980 में दोनों की शादी हो गई। कॉलेज की पढ़ाई के बाद पहली नौकरी बैंक ऑफ इंग्लैंड में मिली। यहां छह साल काम किया। सब कुछ अच्छा चल रहा था कि एक हादसा हुआ। यह 1991 की बात है। पापा कार दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए। कुछ दिन अस्पताल में भर्ती रहे, फिर उनकी मौत हो गई। थेरेसा के लिए यह एक बड़ा सदमा था। पापा के जाने के गम से वह उबर पातीं कि इसके पहले ही मां भी चल बसीं। वह बहुत निराश रहने लगीं।
 लेकिन इस गंभीर दौर में पति फिलिप ने उनका हौसला टूटने नहीं दिया। बैंक में नौकरी के साथ ही राजनीतिक गतिविधियों में भी हिस्सा लेती रहीं। पति ने उनका उत्साह बढ़ाया। साल 1997 में मेडेनहेड से कंजरवेटिव पार्टी की सांसद बनीं। वर्ष 2002-03 के दौरान कंजरवेटिव पार्टी की चेयरमैन रहीं। थेरेसा कहती हैं, महिला होने की वजह से कभी सरकार या पार्टी के काम करने में दिक्कत नहीं आती। मुङो योग्यता की बदौलत मौके मिले, और मैंने ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। सबसे अहम जिम्मेदारी मिली 2010 में, डेविड कैमरन के नेतृत्व में गठबंधन सरकार के बनने के बाद उन्हें गृह सचिव बनाया गया। 2015 के चुनाव में कंजरवेटिव पार्टी के लगातार दूसरी बार सत्ता में आने के बाद उन्हें फिर गृह सचिव बनाया गया। बतौर गृह सचिव अपराध घटाने को लेकर वह चर्चा में रहीं। थेरेसा कहती हैं- जब गृह सचिव बनी, तो लोगों ने कहा कि तुम अपराध कम नहीं कर पाओगी। फिर कहा गया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना बंद करो। मगर मैंने किसी की नहीं सुनी। मेरे कार्यकाल में अपराध कम हुए। इस बीच थेरेसा की सेहत खराब रहने लगी। पता चला कि डायबिटीज है। साल 2012 में तबियत बिगड़ी। डॉक्टर ने कहा, डायबिटीज टाइप 1बी है। दिन में दो बार इंसुलिन इंजेक्शन लगवाने पड़ेंगे। थेरेसा और उनके पति फिलिप ने यह बात किसी से नहीं छिपाई। हालांकि कुछ विरोधियों ने इसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की।
कहा गया कि उनकी सेहत ठीक नहीं है। इंसुलिन की बदौलत जीने वाली महिला प्रधानमंत्री जैसा अहम पद कैसे संभालेगी?
 पर थेरेसा ने कभी इन चर्चाओं को तवज्जो नहीं दी। दिलचस्प बात यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान दमदार भाषणों के अलावा उनके पहनावे को लेकर काफी चर्चा रही। खासकर उनकी स्टाइलिश जूतियों की फोटो अखबारों में व टीवी पर खूब दिखाई गईं। स्टाइलिश कपड़े पहनने के अलावा उन्हें पहाड़ों पर घूमने व नए-नए व्यंजन पकाने का भी खूब शौक है। जब भी मौका मिलता है, वह घर पर नए पकवान बनाती हैं। मौजूदा साल ब्रिटेन के राजनीतिक इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा। ब्रिटेन के आवाम ने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला किया। देश की जनता दो धड़ों में बंट गई। एक वह, जो यूरोपीय संघ के साथ रहना चाहता था, और दूसरी तरफ वे लोग थे, जो संघ से बाहर होने को बेताब थे। इस सियासी परिस्थिति में थेरेसा कद्दावर नेता बनकर उभरीं। उन्होंने यूरोपीय संघसे अलग होने (ब्रेग्जिट) वाले लोगों का समर्थन किया। जनमत संग्रह हुआ। ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला किया। कैमरन को इस्तीफा देना पड़ा। नए प्रधानमंत्री को चुनने की बारी आई, तो सबको एक ही नाम सूझा, थेरेसा मे। इस दौरान थेरेसा ने तीन मुद्दों पर फोकस किया। ब्रेग्जिट के बाद अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, देश की एकता-अखंडता बनाए रखना और आम लोगों के हितों को सबसे ऊपर रखना। इस साल 13 जुलाई को उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। शपथ के बाद थेरेसा ने कहा, मेरे पिता ने मुङो सिखाया है कि लोगों की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है। वादा है, मैं समाज के हर तबके के लोगों का ख्याल रखूंगी।

साभार -हिंदुस्तान अख़बार 

Wednesday, August 24, 2016

SAKSHI MALIK BIOGRAPHY IN HINDI


साक्षी मलिक

(महिला पहलवान)




जब मेरी ट्रेनिंग शुरू हुई, तो इलाके में कोई महिला पहलवान नहीं थी। 
कई लोगों ने सवाल उठाए कि लड़की पहलवान बनकर क्या करेगी? 
पर मैं ठहरी जिद्दी लड़की। ठान लिया, पहलवान ही बनूंगी।
 इस सफर में मां ने मेरा बहुत साथ दिया। 
उनकी बदौलत ही यह सपना पूरा कर पाई।



हरियाणा के रोहतक जिले में एक गांव है, मोखरा खास। इसकी आबादी करीब 11 हजार है। यहां बेटियों के जन्म पर जश्न नहीं होते। इलाके में सरकारी स्कूल हैं, जहां लड़कियों के मुकाबले लड़के ज्यादा संख्या में पढ़ते हैं। खेती-किसानी पर निर्भर इस गांव में हर परिवार की एक ही ख्वाहिश होती है कि घर में बेटा पैदा हो। शायद इसलिए यहां प्रति हजार लड़कों पर लड़कियों की संख्या 822 है। ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली पहलवान साक्षी इसी गांव की बेटी हैं।

साक्षी के जन्म के कुछ दिनों बाद उनके पापा सुखवीर को दिल्ली में बस कंडक्टर की नौकरी मिल गई और मां सुदेश आंगनवाड़ी में काम करने लगीं। अब सवाल था, साक्षी की देखभाल कौन करेगा? घर चलाने के लिए नौकरी जरूरी थी, इसलिए मम्मी-पापा ने उन्हें दादी के पास छोड़ दिया। दादा बदलूराम पहलवान थे। इलाके में उनका बड़ा रुतबा था। जब भी घर पर कोई उनसे मिलना आता, तो अदब से उनसे कहता, पहलवान जी, नमस्ते! नन्ही साक्षी को यह सुनकर बड़ा अच्छा लगता।
 उनके दिमाग में बड़ा विचार आया, अगर मैं दादाजी की तरह पहलवान बन जाऊं, तो लोग मेरा भी इसी तरह सम्मान करेंगे। सात साल तक साक्षी दादा-दादी के पास रहीं। इसके बाद मम्मी उन्हें अपने संग घर ले आईं।साक्षी का पढ़ाई में खूब मन लगता था। कक्षा में हमेशा अच्छे नंबर आते थे। मगर बड़े होकर टीचर या डॉक्टर बनने का ख्याल मन में कभी नहीं आया। वह कुछ ऐसा करना चाहती थीं, जिससे उन्हें दादाजी की तरह रुतबा हासिल हो।

 एक दिन उन्होंने मां से कहा, मैं पहलवान बनना चाहती हूं। सुनकर मां चौंक गईं। उन्होंने समझाया, लड़कियां पहलवानी नहीं करतीं। तुङो खेलना पसंद है, तो कोई और खेल सीख ले। एक दिन वह साक्षी को लेकर रोहतक के छोटूराम स्टेडियम गईं।साक्षी ने वहां पर बच्चों को जिमनास्टिक, बास्केटबॉल, वॉलीबॉल और बैडमिंटन खेलते हुए देखा। मगर उन्हें मजा नहीं आया।

 इसके बाद मां उसी स्टेडियम में कुश्ती अखाड़े की तरफ ले गईं। उस समय वहां दो पहलवान एक-दूसरे को पटखनी देने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें देखते ही साक्षी चीख उठीं, मुङो यही गेम सीखना है। सुदेश कहती हैं, मैंने समझाया कि यह बड़ा कठिन खेल है। इसमें तेरे हाथ-पैर भी टूट सकते हैं। पर वह जिद पर अड़ गई। हमें उसकी जिद पूरी करनी पड़ी। जब बात उनके दादा और पापा को पता चली, तो वे ज्यादा खुश नहीं हुए। उन्हें चिंता थी कि कुश्ती में बेटी को कोई चोट न लग जाए। हालांकि बाद में दोनों राजी हो गए।

 साक्षी के ताऊ सतबीर कहते हैं, हमारे पिताजी पहलवान थे। गांव के सरपंच और तमाम बड़े-बड़े लोग उनका सम्मान करते थे। शायद यहीं से साक्षी के मन में पहलवान बनने की इच्छा पैदा हुई।बारह साल की उम्र से साक्षी कुश्ती सीखने लगीं। ईश्वर सिंह दहिया उनके पहले कोच थे। दहिया बताते हैं, साक्षी जब मेरे पास आई, तो ऐसा नहीं लगा कि उसे किसी ने भेजा है। यह उसका अपना फैसला था। ऐसे बच्चों को तैयार करना आसान होता है।


उन दिनों गांव में एक भी लड़की पहलवान नहीं थी। अखाड़े में कोच ने लड़कों से उनका मुकाबला कराया। यह देखकर सबको अजीब लगा। सबने कहा, लड़की है, तो इसका मुकाबला लड़की से ही होना चाहिए। यह सुनकर साक्षी भड़क गईं। उन्होंने कहा, मुङो फर्क नहीं पड़ता। लड़का हो या लड़की, जो सामने आएगा, उसे पटक दूंगी। इस तरह उन्होंने लड़कों के साथ अभ्यास करके कुश्ती के दांव-पेच सीखे।उनका सफर आसान नहीं रहा। 

जिन दिनों वह कुश्ती के अखाड़े में उतरीं, उस समय हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने में लड़कियों को लड़कों के मुकाबले कमजोर माना जाता था। मगर वह डटी रहीं। धीरे-धीरे पूरे गांव में मशहूर हो गईं। जब भी रास्ते से गुजरतीं, तो लोग कमेंट करते, देखो, पहलवान जा रही है। कुश्ती के अखाड़े की तरह ही वह स्कूल में भी अव्वल रहीं।


मां सुदेश कहती हैं, साक्षी पढ़ाई में अच्छी थी। उसने अपनी इच्छा से पहलवान बनने का फैसला किया। मुङो खुशी है कि मैंने उसका साथ दिया।दिलचस्प बात यह है कि उनका भाई सचिन क्रिकेट का बड़ा फैन है। वह साक्षी को चिढ़ाता कि खेलना ही है, तो क्रिकेट खेलो। पहलवान बनकर क्या करोगी? मगर साक्षी ने कभी इसे गंभीरता से नहीं लिया।
 देश में कई टूर्नामेंट जीतने के बाद उन्होंने 2014 में ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक जीता और 2015 में एशियन चैंपियनशिप में कांस्य जीता। पापा सुखवीर कहते हैं, साक्षी की कामयाबी में उसकी मां का बड़ा हाथ है। मैं तो दिल्ली में नौकरी कर रहा था। उसकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी मां पर ही थी।पिछले एक साल से साक्षी ओलंपिक की तैयारी में जुटी थीं। रोजाना आठ घंटे के अभ्यास के साथ खान-पान व फिटनेस को लेकर उन्होंने सख्त नियमों का पालन किया। इस दौरान साक्षी ने सब कुछ छोड़ दिया था- टीवी देखना, फोन पर बात करना और रिश्तेदारों से मिलना। उनका पूरा फोकस ओलंपिक पर था। साक्षी कहती हैं, यह सपना था कि ओलंपिक में तिरंगा लहराऊं। मैं ऐसा कर सकी, इसके लिए उन सभी का शुक्रिया, जिन्होंने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया। 



Wining Moment at Rio Olympics

पर कहते है ना, मेहनत कभी बेकार नहीं जाता। इसी साल के अप्रैल में मंगोलियाँ में हुए ओलिम्पिक क्वालिफ़ाइंग टूर्नामेंट में ब्रोंज के लिए हुए बाऊट में देश की पहली महिला पहलवान गीता फ़ौगट नहीं उतरी। जिसके कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।

चूंकि Sakshi Malik भी उसी 58 किलोग्राम के केटेगरी में खेलती है, इसलिए उन्हें रियो ओलिम्पिक में खेलने का मौका मिला।

18 अगस्त 2016 को हुए 58 किलोग्राम के फ्रीस्टाइल रेस्लिंग में साक्षी 4 मैच जीतने में कामयाब रही, पर उन्हें क्वार्टर फाइनल में हार का सामना करना पड़ा।

पर उनके पास ब्रोंज जीतने का एक मौका बचा हुआ था, वो रेपेचेज़ राउंड में किर्गिस्तान के रेसलर के खिलाफ मुक़ाबले में उतरी।

पर सबके उम्मीदों के विपरीत साक्षी 0-5 से पिछड़ गई, अब उनपर प्रेशर आ गया, लेकिन हौसला नहीं खोई। बस मन में एक ही बात चल रहा थी,


रेस्लिंग की बाज़ियाँ तो 2 सेकंड में बदल जाती है, मेरे पास तो 10 सेकंड है।

ठीक इसके कुछ सेकंड बाद वो 4 अंक अर्जित की और 4-5 पर आ गई और अगले पल में लगातार 4 पॉइंट हासिल कर Rio Olympic में भारत के मेडल-सूखे को खत्म कर दी।

इस शानदार जीत के बाद वो काफी खुश हुई, जो उनके आंसूओं के रूप में निकला। कोच उन्हें अपने कंधों पर बिठाकर कर रियो के अखाड़े में घुमाने लगे और कहने लगे,


इस बच्ची ने मुझे जिंदगी का सबसे बेहतरीन तौहफा दे दिया है। मैं जिंदगी भर इसका कर्जदार रहूँगा।

और इस जीत के बाद लेडी सुल्तान कहती है,


आज पूरे दिन नेगेटिविटी नहीं आई। आखिरी पड़ाव पर मेरे पास 10 सेकंड ही थे। मैंने 2-2 सेकंड में कुश्ती बदलते देखी है, तो सोचा 10 सेकंड में ऐसा क्यों नहीं हो सकता ? लड़ना है, मेडल लाना है। यहीं दिमाग में था कि मेडल तो तेरा है।




साभार - हिंदुस्तान

Saturday, August 13, 2016

PRAKASH NANJAPPA BIOGRAPHY IN HINDI

 

प्रकाश नांजप्पा (भारतीय निशानेबाज )


मेरे चेहरे को लकवा मार गया।

डॉक्टर ने कहा कि निशानेबाजी बंद करनी पड़ेगी।

मैं सहम गया। अब क्या होगा?

फिर तय किया कि खुद को हारने नहीं दूंगा।

अगले साल ही मेडल जीतकर साबित किया

कि हौसला साथ हो, तो रास्ते बन ही जाते हैं।


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प्रकाश कर्नाटक के आईटी शहर बेंगलुरु में पले-बढ़े। पापा निशानेबाज थे, पर बेटे को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें शुरू से गणित और विज्ञान पसंद थे। परिवार की तरफ से उन्हें अपना मनपसंद करियर चुनने की पूरी आजादी मिली। शौक के तौर पर उन्हें मोटरबाइक रेसिंग पसंद थी। मगर पढ़ाई के दबाव के चलते इस शौक को वह खास समय नहीं दे पाए।बात वर्ष 1999 की है। एक दिन पापा घर पर निशानेबाजी का अभ्यास कर रहे थे। उन्हें अगले तीन दिन बाद एक राज्य स्तरीय चैंपियनशिप में भाग लेना था। अभ्यास के दौरान पापा के कई निशाने चूक गए। इस पर प्रकाश को हंसी आ गई। उन्होंने कहा, लगता है कि आप सोते हुए निशाने लगा रहे हैं। पापा को बहुत बुरा लगा। उन्होंने कहा, अगर तुम्हें लगता है कि निशाना लगाना इतना आसान है, तो तुम क्यों नहीं हाथ आजमाते। पहले निशाना लगाओ, तब समझ में आएगा कि कितना मुश्किल है। यह सुनकर प्रकाश चुप हो गए। मगर बात मन में घर कर गई। उन दिनों वह कॉलेज में पढ़ रहे थे। पापा की बात को उन्होंने चुनौती की तरह लिया।उन्होंने निशानेबाजी सीखनी शुरू की। मजा आने लगा। अब निशाना लगाना उनका शौक बन गया। लेकिन असल फोकस पढ़ाई पर रहा। इस बीच उन्हें चार साल मिले निशानेबाजी सीखने के लिए। इंजीनियरिंग की डिग्री मिलने के बाद 2003 में कनाडा में एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई। अच्छी नौकरी थी, बढ़िया वेतन था और भविष्य के लिए अच्छी संभावनाएं भी थीं। पर कुछ बात थी, जो उन्हें खल रही थी।फिर सोचा, क्यों न निशानेबाजी की ट्रेनिंग दोबारा शुरू की जाए? जब भी ऑफिस से फुरसत मिलती, टोरंटो के शूटिंग क्लब में निशाना लगाने पहुंच जाते। इस बीच जब भी घर से पापा को फोन आता, निशानेबाजी पर ही चर्चा होती। प्रकाश बताते हैं, वह एक ही बात पूछते कि ऑफिस के बाद शूटिंग के लिए वक्त मिलता है? अगर मैं कहता नहीं, तो वह गुस्सा होकर फोन काट देते। अगले दो-तीन दिन बाद फिर उनका फोन आता और वह वही सवाल पूछते। पापा के लिए निशानेबाजी जुनून था, और वह चाहते थे कि प्रकाश इस क्षेत्र में उनका सपना पूरा करें। यह वह दौर था, जब अभिनव बिंद्रा जैसे निशानेबाज पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर रहे थे। इस बीच 2008 में कनाडा में राष्ट्रीय निशानेबाजी चैंपियनशिप हुई। प्रकाश ने उसमें हिस्सा लिया। नतीजा अप्रत्याशित था। उन्होंने गोल्ड जीता। पहली बार उन्हें लगा कि वह एक अच्छे निशानेबाज हैं। पापा ने उनसे कहा, तुम नौकरी करने के लिए नहीं, निशानेबाजी के लिए बने हो। यही तुम्हारी मंजिल है। घर लौट आओ।इंजीनियर की नौकरी छोड़कर वह स्वदेश लौट आए। कई घरेलू टूर्नामेंट जीते। प्रकाश कहते हैं, जब कनाडा से लौटा, तब नहीं सोचा था कि एक दिन ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर पाऊंगा। यह सफर बहुत शानदार रहा है।वर्ष 2013 में वर्ल्ड कप मेडल जीतने वाले प्रकाश पहले भारतीय निशानेबाज बने। इस कामयाबी को मुश्किल से एक महीने ही बीते थे कि एक हादसा हो गया। वह एक निशानेबाजी प्रतियोगिता के लिए स्पेन जा रहे थे। विमान में अचानक उन्हें महसूस हुआ कि चेहरे पर कुछ हुआ है, पर समझ नहीं पाए क्या हुआ। होटल पहुंचे, शीशे में खुद को देखा, तो घबरा गए। ब्रश करने की कोशिश की, तो मुंह नहीं खुला। एक आंख अचानक बंद हो गई। दौड़कर रिसेप्शन की तरफ भागे। वहां मौजूद लोग उन्हें देखकर चौंक गए। प्रकाश बताते हैं, उस समय मेरा चेहरा बहुत डरावना लग रहा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं? मैं चिल्लाने लगा, मेरी मदद करो।इसके बाद उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। अगले दिन से अभ्यास शुरू होना था, मगर वह अस्तपाल के बेड पर थे। डॉक्टरों ने कहा, आपके चेहरे पर लकवा मार गया है। कब तक ठीक होंगे, कुछ पता नहीं। खबर फैली, तो सब कहने लगे कि प्रकाश का करियर खत्म हो गया। जब तक आंख ठीक नहीं होगी, वह निशानेबाजी कैसे कर पाएंगे? मगर धुन के पक्के इस निशानेबाज ने डॉक्टरों को गलत साबित कर दिया। प्रकाश कहते हैं, जब डॉक्टरों ने कहा कि निशानेबाजी मुङो बंद करनी पड़ेगी, तो मैं अंदर से टूट गया। मैंने उनसे कहा, मैं निशानेबाजी के बिना कैसे जिऊंगा? प्लीज कुछ कीजिए। प्रकाश की हालत सुधरने में कम से कम दो महीने लगे। मगर एक-एक पल बड़ी मुश्किल से बीता। पूरी तरह फिट होने में एक साल लगा, पर वह हारे नहीं। डॉक्टर भी उनका हौसला देखकर दंग थे। सबको लगा था कि इस हादसे के बाद उनका प्रदर्शन पहले जैसा नहीं रहेगा। मगर उन्होंने 2014 में ग्लासगो कॉमनवेल्थ में रजत पदक जीतकर सारे कयासों को गलत साबित कर दिया।इस साल प्रकाश ने ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया। यह बहुत बड़ी कामयाबी थी। हालांकि वह इस बार ओलंपिक में कोई मेडल नहीं जीत सके, पर उनका हौसला सबके लिए प्रेरणास्रोत बना रहा। उन्होंने हारकर भी उन लोगों को जीत का संदेश दिया है, जो छोटी-छोटी मुश्किलों के सामने हिम्मत हार जाते हैं।

साभार - हिंदुस्तान अख़बार

HIRE KA HIRA-CHANDRADHAR SHARMA GULERI

 हीरे का हीरा

रचनाकार: चंद्रधर शर्मा गुलेरी 

  Chandradhar Sharma Guleri



अधिकतर पाठक गुलेरी जी की तीन कहानियों से परिचित हैं जिनमें 'उसने कहा था', 'बुद्धू का काँटा' व 'सुखमय जीवन' सम्मिलित हैं लेकिन कहा जाता है कि 'हीरे का हीरा' कहानी चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था' का अगला भाग है जिसमें 'लहनासिंह की वापसी दिखाई गई है। इस कहानी के मूल रचनाकार गुलेरीजी ही हैं इसपर भी प्रश्न उठे हैं लेकिन यह कहानी गुलेरीजी की ही कहानी के रूप में प्रकाशित हुई है 

आज सवेरे ही से गुलाबदेई काम में लगी हुई है। उसने अपने मिट्टी के घर के आँगन को गोबर से लीपा है, उस पर पीसे हुए चावल से मंडन माँडे हैं। घर की देहली पर उसी चावल के आटे से लीकें खैंची हैं और उन पर अक्षत और बिल्‍वपत्र रक्‍खे हैं। दूब की नौ डालियाँ चुन कर उनने लाल डोरा बाँध कर उसकी कुलदेवी बनाई है और हर एक पत्ते के दूने में चावल भर कर उसे अंदर के घर में, भींत के सहारे एक लकड़ी के देहरे में रक्‍खा है। कल पड़ोसी से माँग कर गुलाबी रंग लाई थी उससे रंगी हुई चादर बिचारी को आज नसीब हुई है। लठिया टेकती हुई बुढ़ि‍या माता की आँखें यदि तीन वर्ष की कंगाली और पुत्र वियोग से और डेढ़ वर्ष की बीमारी की दुखिया के कुछ आँखें और उनमें ज्‍योति बाकी रही हो तो - दरवाजे पर लगी हुई हैं। तीन वर्ष के पतिवियोग और दारिद्र्य की प्रबल छाया से रात-दिन के रोने से पथराई और सफेद हुई गुलाबदेई की आँखों पर आज फिर यौवन की ज्‍योति और हर्ष के लाल डोरे आ गए हैं। और सात वर्ष का बालक हीरा, जिसका एकमात्र वस्‍त्र कुरता खार से धो कर कल ही उजाला कर दिया गया है, कल ही से पड़ोसियों से कहता फिर रहा है कि मेरा चाचा आवेगा।
बाहर खेतों के पास लकड़ी की धमाधम सुनाई पड़ने लगी। जान पड़ता है कि कोई लँगड़ा आदमी चला आ रहा है जिसके एक लकड़ी की टाँग है। दस महीने पहिले एक चिट्ठी आई थी जिसे पास के गाँव के पटवारी ने पढ़ कर गुलाबदेई और उसकी सास को सुनाया था। उसें लिखा था कि लहनासिंह की टाँग चीन की लड़ाई में घायल हो गई है और हांगकांग के अस्पताल में उसकी टाँग काट दी गई है। माता के वात्‍सल्‍यमय और पत्‍नी के प्रेममय हृदय पर इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि बेचारियों ने चार दिन रोटी नहीं खाई थी। तो भी - अपने ऊपर सत्‍य आपत्ति आती हुई और आई हुई जान कर भी हम लोग कैसे आँखें मीच लेते हैं और आशा की कच्‍ची जाली में अपने को छिपा कर कवच से ढका हुआ समझते हैं! - वे कभी-कभी आशा किया करती थीं कि दोनों पैर सही सलामत ले कर लहनासिंह घर आ जाय तो कैसा! और माता अपनी बीमारी से उठते ही पीपल के नीचे के नाग के यहाँ पंचपकवान चढ़ाने गई थी कि 'नाग बाबा! मेरा बेटा दोनों पैरों चलता हुआ राजी-खुशी मेरे पास आवे।' उसी दिन लौटते हुए उसे एक सफेद नाग भी दीखा था जिससे उसे आशा हुई थी कि मेरी प्रार्थना सुन ली गई। पहले पहले तो सुखदेई को ज्‍वर की बेचैनी में पति की टाँग - कभी दहनी और कभी बाईं - किसी दिन कमर के पास से और किसी दिन पिंडली के पास से और फिर कभी टखने के पास से कटी हुई दिखाई देती परंतु फिर जब उसे साधारण स्‍वप्‍न आने लगे तो वह अपने पति को दोनों जाँघों पर खड़ा देखने लगी। उसे यह न जान पड़ा कि मेरे स्‍वस्‍थ मस्तिष्‍क की स्‍वस्‍थ स्‍मृति को अपने पति का वही रूप याद है जो सदा देखा है, परंतु वह समझी की किसी करामात से दोनों पैर चंगे हो गए हैं।
किंतु अब उनकी अविचारित रमणीय कल्‍पनाओं के बादलों को मिटा देने वाला वह भयंकर सत्‍य लकड़ी का शब्‍द आने लगा जिसने उनके हृदय को दहला दिया। लकड़ी की टाँग की प्रत्‍येक खटखट मानो उनकी छाती पर हो रही थी और ज्‍यों-ज्‍यों वह आहट पास आती जा रही थी त्‍यों-त्‍यों उसी प्रेमपात्र के मिलने के लिए उन्‍हें अनिच्‍छा और डर मालूम होते जाते थे कि जिसकी प्रतीक्षा में उसने तीन वर्ष कौए उड़ाते और पल-पल गिनते काटे थे प्रत्‍युत वे अपने हृदय के किसी अंदरी कोने में यह भी इच्‍छा करने लगीं कि जितने पल विलंब से उससे मिलें उतना ही अच्‍छा, और मन की भित्ति पर वे दो जाँघों वाले लहनासिंह की आदर्श मूर्ति को चित्रित करने लगी और उस अब फिर कभी न दिख सकने वाले दुर्लभ चित्र में इतनी लीन हो गई कि एक टाँग वाला सच्‍चा जीता जागता लहनासिंह आँगन में आ कर खड़ा हो गया और उसके इस हँसते हुए वाक्‍यों से उनकी वह व्‍यामोहनिद्रा खुली कि -
'अम्‍मा! क्‍या अंबाले की छावनी से मैंने जो चिट्ठी लिखवाई थी वह नहीं पहुँची?' माता ने झटपट दिया जगाया और सुखदेई मुँह पर घूँघट ले कर कलश ले कर अंदर के घर की दहनी द्वारसाख पर खड़ी हो गई। लहनासिंह ने भीतर जा कर देहरे के सामने सिर नवाया और अपनी पीठ पर की गठरी एक कोने में रख दी। उसने माता के पैर हाथों से छू कर हाथ सिर को लगाया और माता ने उसके सिर को अपनी छाती के पास ले कर उस मुख को आँसुओं की वर्षा से धो दिया जिस पर बाक्‍तरों की गोलियों की वर्षा के चिह्र कम से कम तीन जगह स्‍पष्‍ट दिख रहे थे।
अब माता उसको देख सकी। चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी और उसके बीच-बीच में तीन घावों के खड्डे थे। बालकपन में जहाँ सूर्य, चंद्र, मंगल आदि ग्रहों की कुदृष्टि को बचानेवाला तांबे चाँदी की पतड़ि‍यों और मूँगे आदि का कठला था वहाँ अब लाल फीते से चार चाँदी के गोल-गोल तमगे लटक रहे थे। और जिन टाँगों ने बालकपन में माता की रजाई को पचास-पचास दफा उघाड़ दिया उनमें से एक की जगह चमढ़े के तसमों से बँधा हुआ डंडा था। धूप से स्‍याह पड़े हुए और मेहनत से कुम्‍हलाए हुए मुख पर और महीनों तक खटिया सेने की थकावट से पिलाई हुई आँखों पर भी एक प्रकार की, एक तरह के स्‍वावलंबन की ज्‍योति थी जो अपने पिता, पितामह के घर और उनके पितामहों के गाँव को फिर देख कर खिलने लगती थी।
माता रुँधे हुए गले से न कुछ कह सकी और न कुछ पूछ सकी। चुपचाप उठ कर कुछ सोच-समझ कर बाहर चली गई। गुलाबदेई जिसके सारे अंग में बिजली की धाराएँ दौड़ रही थीं और जिसके नेत्र पलकों को धकेल देते थे इस बात की प्र‍तीक्षा न कर सकी कि पति की खुली हुई बाँहें उसे समेट कर प्राणनाथ के हृदय से लगा लें किंतु उसके पहले ही उसका सिर जो विषाद के अंत और नवसुख के आरंभ से चकरा गया था पति की छाती पर गिर गया और हिंदुस्‍तान की स्त्रियों के एकमात्र हाव-भाव - अश्रु - के द्वारा उनकी तीन वर्ष की कैद हुई मनोवेदना बहने लगी।
वह रोती गई और रोती गई। क्‍या यह आश्‍चर्य की बात है? जहाँ की स्त्रियाँ पत्र लिखना-पढ़ना नहीं जानतीं और शुद्ध भाषा में अपने भाव नहीं प्रकाश कर सकतीं और जहाँ उन्‍हें पति से बात करने का समय भी चोरी से ही मिलता है वहाँ नित्‍य अविनाशी प्रेम का प्रवाह क्‍यों न‍हीं अश्रुओं की धारा की भाषा में... ( गुलेरी जी इस कहानी को यहीं तक लिख पाए थे। आगे की कहानी कथाकार डॉ. सुशील कुमार फुल्ल ने पूरी की है) ...उमड़ेगा। प्रेम का अमर नाम आनंद है। इसकी बेल जन्‍म-जन्‍मांतर तक चलती है। गुलाबदेई को तीन वर्ष के बाद पति-स्‍पर्श का मिला था। पहले तो वह लाजवंती-सी छुईमुई हुई, फिर वह फूली हुई बनिए की लड़की-सी पति में ही धसती चली गई। पहाड़ी नदी के बाँध टूटना ही चाहते थे कि लहनासिंह लड़खड़ा गया और गिरते-गिरते बचा। सकुचायी-सी, शर्मायी-सी गुलाबदेई ने लहनासिंह को चिकुटी काटते हुए कहा - बस... और आँखों ही आँखों में बिहारी की नायिका के समान भरे मान में मानो कहा - कबाड़ी के सामने भी कोई लहँगा पसारेगी?
'हारे को हरिनाम, गुलाबदेई। मेरी प्राणप्‍यारी। मैं हारा नहीं हूँ। सुनो... मर्द और कर्द कभी खुन्‍ने नहीं होते गुलाबो... और चीन की लड़ाई ने तो मेरी धार और तेज कर दी है।' लहनासिंह तन कर खड़ा हो गया था! गुलाबदेई सरसों-सी खिल आई। मानो लहनासिंह उसे कल ही ब्‍याह कर लाया हो।
माँ रसोई करने चली गई थी। तीन साल बाद बेटा आया था। उसके कानों में बैसाखियों की खड़खड़ाहट अब भी सुनाई दे रही थी। भगवती से कितनी मन्‍नतें मानी थीं। वह शिवजी के मंदिर में भी हो आई थी! आखिर देवी-देवता चाहें तो वह सही सलामत भी आ सकता था परंतु अब तो वह साक्षात सामने था। फिर भी माँ को किसी चमत्‍कार की आशा थी, वह सीडूं बाबा से पुच्‍छ लेने जाएगी। फिर देगची में कड़छी हिलाते हुए सोचने लगी... देश के लिए एक टाँग गँवा दी तो क्‍या हुआ। उसकी छाती फूल गई। बेटे ने माँ के दूध की लाज रखी थी।
'चाचा, तुम आ गए!'
'हाँ बेटा।' लहनासिंह ने उसे अंक में भरते हुए कहा।
'चाचा... इतने दिन कहाँ थे?'
'बेटा मैं लाम पर था। चीन से युद्ध हो रहा था न...'
'चीन कहाँ है?' मासूमियत से बालक ने पूछा!
'हिमालय के उस पार।'
'मुझे भी ले चलोगे न?'
'अब मैं नहीं जाऊँगा। फौज से मेरी छुट्टी हो गई!' कुछ सोच कर उसने फिर कहा - 'बेटा, तुम बड़े हो जाओगे तो फौज में भर्ती हो जाना।'
'मैं भी चीनियों को मार गिराऊँगा! लेकिन चाचा क्‍या मेरी भी टाँग कट जाएगी?'
'धत तेरी! ऐसा नहीं बोलते। टाँग कटे दुश्‍मनों की।' फिर हीरे ने जेब में आम की गुठली से बनाई पीपनी निकाली और बजाने लगा। बरसात में आम की गुठलियाँ उग आती हैं, तो बच्‍चे उस पौधों को उखाड़ कर गुइली में से गिट्टक निकाल कर बजाने लगते हैं। बड़े-बूढ़े खौफ दिखाते है। कि गुठलियों में साँप के बच्‍चे होते हैं परंतु इन बंदरों को कौन समझाए... आदमी के पूर्वज जो ठ‍हरे !
'तुम मदरसे जाते हो?'
'हूँ... लेकिन मौलवी की लंबी दाढ़ी से डर लगता है...'
'क्‍यों ?'
'दाढ़ी में उसका मुँह ही दिखायी नहीं देता...'
'तुम्‍हें मुँह से क्‍या लेना है। अच्‍छे बच्‍चे गुरुओं के बारे में ऐसी बात न‍हीं करते।'
'मेरा नाम तो अभी कच्‍चा है...'
'नाम कच्‍चा है या कच्‍ची में ही...'
'मैं पक्‍की में हो जाऊँगा लेकिन बड़ी माँ ने अधन्‍नी नही दी... फीस लगती है चाचा।' और वह पीपनी बजाता हुआ गयब हो गया।
लहनासिंह सोचने लगा... उमर कैसे ढल जाती है... पहाड़ी नदी-नाले मैदान तक पहुँचते-पहुँचते संयत हो जाते हैं... ढलती हुई उमर में वर्तमान के खिसकने और भविष्‍य के अनिश्‍चय घेर लेते हैं। चीन की लड़ाई में जख्मी होने पर जब अस्‍पताल में था... तो हर नर्स उसे आठ-नौ साल की सूबेदारनी दिखाई देती... सिस्‍टर नैन्‍सी से एक दिन उसने पूछा भी था - 'सिस्‍टर क्‍या कभी तुम आठ साल की थीं?'
'अरे बिना आठ की उमर पार किए मैं बाईस की कैसे हो सकती हूँ... तुम्‍हें कोई याद आ रहा है...
'हाँ... वह आठ साल की छोकरी... दही में नहाई हुई... बहार के फूलों-सी मुस्‍कराती हुई मेरी जिंदगी में आई थी... और फिर एकएक बिलुप्त हो गई... सूबेदारनी बन गई... कहते-कहते वह खो गया था!
'हवलदार... तुम परी-कथाओं में विश्‍वास रखते हो ?'
'परियों के पंख होते हैं न... वे उड़ कर जहाँ चाहें चली जाएँ... कल्‍पना ही तो जीवन है।'
परंतु तुम्‍हें तो शौर्य-मेडल मिला है।'
'अगर मेरी कल्‍पना में वह आठ वर्षिय कन्‍या न होती तो मुझे कभी शौर्य-मेडल न मिलता... मेरी प्रेरणा वही थी...
'तुमने विवाह नहीं बनाया।' नैन्‍सी ने पूछा !
'विवाह तो बनाया... कनेर के फूल-सी लहलहाती मेरी पत्‍नी है... एक बेटा है... और मेरी बूढ़ी माँ है...'
'तो फिर परियों की कल्‍पना... आठ वर्ष की कन्या का ध्‍यान...'
'हाँ, सिस्‍टर... मैंने 35 साल पहले उस कन्‍या को देखा था... फिर वह ऐसे गायब हुई जैसे कुरली बरसात के बाद कही अदृश्‍य हो जाती है... और मैं निपट... अकेला... नैन्‍सी चली गई थी। वह सोचता रहा था - स्‍वप्‍न में सफेद कौओं का दिखाई देना शुभ लक्षण है या अशुभ का प्रतीक... अस्‍पताल में अर्ध-निमीलित आँखों में अनेक देवता आते... कभी उसे लगता कि फनियर नाग ने उसे कमर से कस लिया है...शायद यह नपुंसकता का संकेत न हो... वह दहल जाता... माँ... पत्‍नी... और हीरा... कैसे होंगे... गाँव में वैसे तो ऐसा कुछ नहीं जो भय पैदा करे... लेकिन तीन साल तो बहुत होते हैं... वे कैसे रहती होंगी... युद्ध में तो तनख्वाह भी न‍हीं पहुँचती होगी... फिर उसे ध्‍यान आया कि जब वह चलने लगा था तो माँ ने कहा था - बेटा... हमारी चिंता नहीं करना। आँगन में पहा‍ड़ि‍ए का बास हमारी रक्षा करेगा... फिर उसे ध्‍यान आया... कई बार पहाड़ि‍या नाराज हो जाए तो घर को उलटा-पुलटा कर देता है। आप चावल की बोरी को रखें... वह अचानक खुल जाएगी और चावलों का ढेर लग जाएगा। कभी पहाड़ि‍या पशुओं को खोल देगा... अरे नहीं... पहाड़ि‍या तो देवता होता है, जो घर-परिवार की रक्षा करता है। वह आश्‍वस्‍त हो गया था।
'मुन्‍नुआ, तू कुथी चला गिया था?'
'माँ फौजी तो हुक्‍म का गुलाम ओता है।'
'फिरकू तां जर्मन की लड़ाई से वापस आ गया था... उसका तो कोई अंग-भंग वी नईं हुआ था...और तू पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता रहा... तिझो घरे दी वी याद नी आई।'
'अम्‍मा... फिरकू तो फिरकी की भाँति घूम गया होगा लेकिन मैं तो वीर माँ का सपूत हूँ... उस पहाड़ी माँ का जो स्‍वयं बेटे को युद्धभूमि में तिलक लगा कर भेजती है... बहाना बना कर लौटना राजपूत को शोभा नही देता...'
'हाँ, सो तो तमगे से देख रेई हूँ लेकि‍न...'
'लेकिन क्‍या अम्‍मा... तुम चुप क्‍यों हो गई।'
'बुलाबदेई तो वीरांगना है... उसे तो गर्व होना चाहिए...'
'हाँ...बेटा...फौजी की औरत तो तमगों के सहारे ही जीती है लेकिन...'
'लेकिन क्‍या अम्‍मा... कुछ तो बोलो!'
'उसका हाल तो बेहाल रहा... आदमी के बिना औरत अधूरी है... और फौजी की औरत पर तो कितणी उँगलियाँ उठती हैं... तुम क्‍या जानो।' तुम तो नौल के नौलाई रेअ।
'हूँ !'
'क्‍या तमगे तुम्‍हारी दूसरी टाँग वापस ला सकते हैं? और तीन साल से सरकार ने सुध-बुध ही कहाँ ली...'
लहनासिंह के पास कोई जवाब नहीं था। सूबेदारनी ने किस अनुनय-विनय से उसे बींध लिया था... हजारासिंह बोधा सिंह की रक्षा करके उसने कौन-सा मोर्चा मार लिया था... वह युद्ध-भूमि में तड़प रहा था और रैड-क्रास वैन बाप-बेटे को ले कर चली गई थी... उसने जो कहा था मैंने कर दिया... सोच कर फूल उठा लेकिन गुलाबदेई के यौवन का अंधड़ कैसे निकला होगा... लोग कहते होंगे... बरसाती नाले-सा अंधड़ आया और वह झरबेरी-सी बिछ गई थी... तूफान में दबी... सहमी सी लँगड़े खरगोश-सी... नहीं... लँगड़ी वह कहाँ है... लँगड़ा तो लहनासिंह आया है... चीन में नैन्‍सी से बतियाता... खिलखिलाता....
अम्‍मा फिर रसोई में चली गई थी! गुलाबदेई उसकी लकड़ी की टाँग को सहला रही थी... शायद उसमें स्‍पंदन पैदा हो जाए... शायद वह फिर दहाड़ने लगे... तभी लहनासिंह ने कहा था, 'गुलाबो... यह नहीं दूसरी टाँग...'
वह दोनों टाँगों को दबाने लगी थी... और अश्रुधारा उसके मुख को धो रही थी... वह फिर बोला - 'गुलाबो... तुम्‍हें मेरे अपंग होने का दुख है?'
'नहीं तो!'
'फिर रो क्‍यों रही हो...'
'फौजी की बीबी रोए तो भी लोग हँसते हैं और अगर हँसे तो भी व्‍यंग्‍य-वाण छोड़ते हैं... वह तो जैसे लावरिस औरत हो... वह फूट पड़ी थी !'
'मैं तो सदा तुम्‍हारे पास था!'
'अच्‍छा!' अब जरा वह खिलखिलाई।
'हीरे का हीरा पा कर भी तुम बेबस रहीं।'
'और तुम्‍हारे पास क्‍या था?'
'तुम!'
'नहीं... कोई मीम तुम्‍हें सुलाती होगी... और तुम मोम-से पिघल जाते होओगे... मर्द होते ही ऐसे हैं !'
'जरा खुल कर कहो न...'
'गोरी-चिट्टी मीम देखी नहीं कि लट्टू हो गए...'
'तुम्‍हें शंका है ?'
'हूँ... तभी तो इतने साल सुध नहीं ली...'
'मैं तो तुम्‍हारे पास था हमेशा... हमेशा...'
'और वह सूबेदारनी कौन थी?'
'क्‍या मतलब?'
'तुम अब भी माँ से कह रहे थे... उसने कहा था... जो कहा था... मैंने पूरा कर दिया...'
'हाँ... मैं जो कर सकता था... वह कर दिया...'
'लेकिन युद्ध में सूबेदारनी कहाँ से आ गई?'
'वह कल्‍पना थी।'
'तो क्‍या गुलाबो मर गई थी... मैं कल्‍पना में भी याद नहीं आई।'
'मैं तुम्‍हें उसे मिलाने ले चलूँगा।'
'हूँ... मिलोगे खुद और बहाना मेरा... फौजिया तुद घरे नी औणा था !'
'मैं अब चला जाता हूँ...'
'मेरे लिए तो तुम कब के जा चुके थे... और आ कर भी कहाँ आ पाए...'
'गुलाबो... तुम भूल कर रही हो... मैंने कहा था न... मर्द और कर्द कभी खुन्‍ने नहीं होते... उन्‍हें चलाना आना चाहिए...'
'अच्‍छा... अच्‍छा... छोड़ो भी न अब... हीरा आ जाएगा...'
और दोनों ओबरी में चले गए। सदियों बाद जो मिले थे। छोटे छोटे सुख मनोमालिन्‍य को धो डालते हैं और एक-दूसरे के प्रति आश्‍वस्ति जीवन का आधार बनाती है - एक मृगतृष्‍णा का पालन दांपत्‍य-जीवन को हरा-भरा बना देता है... गुलाबदेई लहलहाने लगी थी... और आँगन में अचानक धूप खिल आई थी।
- चंद्रधर शर्मा गुलेरी

USANE KAHA THA- CHARDHAR SHARMA GULERI



उसने कहा था 


चंद्रधर शर्मा गुलेरी

बडे-बडे शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जवान के कोड़ो से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गये हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगायें। जब बडे़-बडे़ शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट-सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरे को चींघकर अपने-ही को सताया हुआ बताते हैं, और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लङ्ढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर, 'बचो खालसाजी। "हटो भाईजी।"ठहरना भाई जी।"आने दो लाला जी।"हटो बाछा।' - कहते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्नें और खोमचे और भारेवालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पडे़। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती नहीं; पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं - 'हट जा जीणे जोगिए'; 'हट जा करमा वालिए'; 'हट जा पुतां प्यारिए'; 'बच जा लम्बी वालिए।' समष्टि में इनके अर्थ हैं, कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है? बच जा। ऐसे बम्बूकार्टवालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दूकान पर आ मिले।
उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिक्ख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बडि़यां। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।
"तेरे घर कहाँ है?"
"मगरे में; और तेरे?"
"माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है?"
"अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं।"
"मैं भी मामा के यहाँ आया हूँ , उनका घर गुरूबाजार में हैं।"
इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जा कर लड़के ने मुस्करा कर पूछा, "तेरी कुड़माई हो गई?"
इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ा कर धत् कह कर दौड़ गई, और लड़का मुँह देखता रह गया।
दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ अकस्मात दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, 'तेरी कुडमाई हो गई?' और उत्तर में वही 'धत्' मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिये पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरूध्द बोली, "हाँ, हो गई।"
"कब?"
"कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढा हुआ सालू।"
लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उडेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।
(दो)
"राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है। दिन-रात खन्दकों में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाडा और मेंह और बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं। जमीन कहीं दिखती नहीं - घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खन्दक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है।
इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का ज़लज़ला सुना था, यहाँ दिन में पचीस ज़लज़ले होते हैं। जो कहीं खन्दक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई, तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।"
"लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खन्दक में बिता ही दिये। परसों रिलीफ आ जायेगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फिरंगी मेम के बाग में - मखमल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती। कहती है, तुम राजा हो , मेरे मुल्क को बचाने आये हो।"
"चार दिन तक पलक नहीं झपपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जरमनों को अकेला मार कर न लौटँ, तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े - संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था - चार मील तक एक जर्मन नहीं छोडा था। पीछे जनरल ने हट जाने का कमान दिया, नहीं तो... "
"नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते! क्यों?" सूबेदार हजारा सिंह ने मुस्कराकर कहा - "लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाये नहीं चलते। बडे अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा?"
"सूबेदारजी, सच है," लहनसिंह बोला - "पर करें क्या? हड्डियों में तो जाड्डा धँस गया है। सूर्य निकलता नहीं, और खाई में दोनों तरफ से चम्बे की बावलियों के से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाय, तो गरमी आ जाए।"
"उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बालटियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंकों। महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदल ले।" - यह कहते हुए सूबेदार सारी खन्दक में चक्कर लगाने लगे।
वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गंदला पानी भर कर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला - "मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!" इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गये।
लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भर कर उसके हाथ में देकर कहा - "अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।"
"हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस धुमा जमीन यहाँ मांग लूंगा और फलों के बूटे लगाऊँगा।"
"लाडी होरा को भी यहाँ बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फरंगी मेम..."
"चुप कर। यहाँ वालों को शरम नहीं।"
"देश-देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तम्बाखू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिये लड़ेगा नहीं।"
"अच्छा, अब बोधसिंह कैसा है?"
"अच्छा है।"
"जैसे मैं जानता ही न होऊँ! रात-भर तुम अपने कम्बल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी क़े सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी क़े तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न मंदे पड़ जाना। जाडा क्या है, मौत है, और निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।"
"मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूंगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाये हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी।"
वजीरासिंह ने त्योरी चढ़ाकर कहा - "क्या मरने-मारने की बात लगाई है? मरें जर्मनी और तुरक ! हाँ, भाइयों, कैसे?"
दिल्ली शहर तें पिशोर नुं जांदिए,
कर लेणा लौंगां दा बपार मड़िए;
कर लेणा नादेड़ा सौदा अड़िए --
(ओय) लाणा चटाका कदुए नुँ।
कद्द बणाया वे मजेदार गोरिये,
हुण लाणा चटाका कदुए नुँ।।
कौन जानता था कि दाढ़ियां वाले, घर-बारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएंगे, पर सारी खन्दक इस गीत से गूँज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गये, मानों चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों!

(तीन)
रात हो गई है। अन्धेरा है। सन्नाटा छाया हुआ है। बोधासिंह खाली बिस्कुटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कम्बल बिछा कर और लहनासिंह के दो कम्बल और एक बरानकोट ओढ़ कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आँख खाई के मुँह पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर। बोधासिंह कराहा।
"क्यों बोधा भाई¸ क्या है?"
" पानी पिला दो।"
लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगा कर पूछा -- " कहो कैसे हो?" पानी पी कर बोधा बोला - " कँपनी छुट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दाँत बज रहे हैं।"
" अच्छा¸ मेरी जरसी पहन लो !"
" और तुम?"
" मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है। पसीना आ रहा है।"
" ना¸ मैं नहीं पहनता। चार दिन से तुम मेरे लिए..."
" हाँ¸ याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सबेरे ही आई है। विलायत से बुन-बुनकर भेज रही हैं मेमें¸ गुरू उनका भला करें।" यों कह कर लहना अपना कोट उतार कर जरसी उतारने लगा।
" सच कहते हो?"
"और नहीं झूठ?" यों कह कर नहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहन-कर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा भर थी।
आधा घंटा बीता। इतने में खाई के मुँह से आवाज आई - " सूबेदार हजारासिंह।"
" कौन लपटन साहब? हुक्म हुजूर !" - कह कर सूबेदार तन कर फौजी सलाम करके सामने हुआ।
" देखो¸ इसी समय धावा करना होगा। मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पचास से ज्यादा जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काट कर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहाँ मोड़ है वहाँ पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूँ। तुम यहाँ दस आदमी छोड़ कर सब को साथ ले उनसे जा मिलो। खन्दक छीन कर वहीं¸ जब तक दूसरा हुक्म न मिले डटे रहो। हम यहाँ रहेगा।"
" जो हुक्म।"
चुपचाप सब तैयार हो गये। बोधा भी कम्बल उतार कर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उँगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझ कर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें¸ इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेर कर खड़े हो गये और जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ा कर कहा- " लो तुम भी पियो।"
आँख मारते-मारते लहनासिंह सब समझ गया। मुँह का भाव छिपा कर बोला - " लाओ साहब।" हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा। बाल देखे। तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में ही कहाँ उड़ गए और उनकी जगह कैदियों से कटे बाल कहाँ से आ गए?"
शायद साहब शराब पिये हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया हैं! लहनासिंह ने जाँचना चाहा। लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे।
" क्यों साहब¸ हमलोग हिन्दुस्तान कब जायेंगे?"
" लड़ाई खत्म होने पर। क्यों¸ क्या यह देश पसंद नहीं?"
" नहीं साहब¸ शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ? याद है¸ पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम आप जगाधरी जिले में शिकार करने गये थे!
हाँ- हाँ, वहीं जब आप खोते पर सवार थे और और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मन्दिर में जल चढ़ाने को रह गया था!
'बेशक पाजी कहीं का!'
सामने से वह नील गाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थीं। और आपकी एक गोली कन्धे में लगी और पुट्‌ठे में निकली। ऐसे अफ़सर के साथ शिकार खेलने में मजा है। क्यों साहब¸ शिमले से तैयार होकर उस नील गाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रेजमेंट की मैस में लगायेंगे।
'हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया।'
" ऐसे बड़े-बड़े सींग! दो-दो फुट के तो होंगे?"
" हाँ¸ लहनासिंह¸ दो फुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पिया?"
" पीता हूँ। साहब¸ दियासलाई ले आता हूँ।" कह कर लहनासिंह खन्दक में घुसा। अब उसे सन्देह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए।
अंधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया।
" कौन? वजीरसिंह?"
" हां¸ क्यों लहना? क्या कयामत आ गई? जरा तो आँख लगने दी होती?"

(चार)
" होश में आओ। कयामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आई है।"
" क्या?"
" लपटन साहब या तो मारे गये है या कैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहन कर यह कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की है। सोहरा साफ उर्दू बोलता है¸ पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।"
" तो अब!"
" अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार होरा¸ कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा। उठो¸ एक काम करो। पल्टन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गए होंगे।
सूबेदार से कहो एकदम लौट आयें। खन्दक की बात झूठ है। चले जाओ¸ खन्दक के पीछे से निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो।"
"हुकुम तो यह है कि यहीं-- "
" ऐसी तैसी हुकुम की ! मेरा हुकुम -- जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सब से बड़ा अफसर है¸ उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ।"
" पर यहाँ तो सिर्फ तुम आठ हो।"
" आठ नहीं¸ दस लाख। एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।"
लौट कर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खन्दक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार सा बांध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी¸ जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जला कर गुत्थी पर रखने ही वाला था कि बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठा कर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तान कर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'आँख मीन गौट्‌ट'कहते हुए चित्त हो गये। लहनासिंह ने तीनों गोले बीन कर खन्दक के बाहर फेंके और साहब को घसीट कर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकाल कर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।
साहब की मूर्छा हटी। लहनासिंह हँस कर बोला - " क्यों लपटन साहब! मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नील गायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो¸ ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आये? हमारे लपटन साहब तो बिन 'डेम'के पाँच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे।"
लहना ने पतलून के जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए¸ दोनों हाथ जेबों में डाले।
लहनासिंह कहता गया - " चालाक तो बड़े हो पर माझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिये चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुए एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछा कर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं। गौ को नहीं मारते। हिन्दुस्तान में आ जायेंगे तो गोहत्या बन्द कर देंगे। मंडी के बनियों को बहकाता कि डाकखाने से रूपया निकाल लो। सरकार का राज्य जानेवाला है। डाक-बाबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्लाजी की दाढ़ी मूड़ दी थी। और गाँव से बाहर निकल कर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रक्खा तो..."
साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिन के दो फायरों ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी। धड़ाका सुन कर सब दौड़ आये।
बोधा चिल्लाया- " क्या है?"
लहनासिंह ने उसे यह कह कर सुला दिया कि 'एक हड़का हुआ कुत्ता आया था¸ मार दिया'और¸ औरों से सब हाल कह दिया। सब बन्दूकें लेकर तैयार हो गये। लहना ने साफा फाड़ कर घाव के दोनों तरफ पट्टियाँ कस कर बाँधी। घाव मांस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू निकलना बंद हो गया।
इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिक्खों की बन्दूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहाँ थे आठ (लहनासिंह तक-तक कर मार रहा था - वह खड़ा था और¸ और लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़ कर जर्मन आगे घुसे आते थे।
अचानक आवाज आई 'वाह गुरूजी का खालसा, वाह गुरूजी की फतह!!'और धड़ाधड़ बन्दूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गये। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।
एक किलकारी और - 'अकाल सिक्खाँ दी फौज आई! वाह गुरूजी दी फतह! वाह गुरूजी दा खालसा! सत श्री अकालपुरूख!!!'और लड़ाई खत्म हो गई। तिरेसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खों में पन्द्रह के प्राण गये। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आरपार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खन्दक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कस कर कमरबन्द की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना को दूसरा घाव -भारी घाव लगा है।
लड़ाई के समय चाँद निकल आया था¸ ऐसा चाँद¸ जिसके प्रकाश से संस्कृत-कवियों का दिया हुआ 'क्षयी'नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी वाणभट्‌ट की भाषा में 'दन्तवीणोपदेशाचार्य' कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर वे उसकी तुरत-बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते।
इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होंने पीछे टेलीफोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाडियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घण्टे के अन्दर-अन्दर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नजदीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएंगे¸ इसलिये मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गये और दूसरी में लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही। पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है सबेरे देखा जायेगा। बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़ कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा - " तुम्हें बोधा की कसम है, और सूबेदारनीजी की सौगन्ध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।"
" और तुम?"
" मेरे लिये वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुरदों के लिये भी तो गाड़ियाँ आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ, वजीरासिंह मेरे पास है ही।"
"अच्छा, पर.."
"बोधा गाड़ी पर लेट गया, भला। आप भी चढ़ जाओ। सुनिये तो, सूबेदारनी होरां को चिठ्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था वह मैंने कर दिया।"
गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़ कर कहा- " तैने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं। लिखना कैसा, साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?"
"अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना, और कह भी देना।"
गाड़ी के जाते लहना लेट गया। - " वजीरा पानी पिला दे¸ और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।"
मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जन्म-भर की घटनायें एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं। समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है।
लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दही वाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं, एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है, तेरी कुड़माई हो गई? तब 'धत्‌' कह कर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा, तो उसने कहा - " हाँ, कल हो गई¸ देखते नहीं यह रेशम के फूलोंवाला सालू!'सुनते ही लहनासिंह को दु:ख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?"
" वजीरासिंह¸ पानी पिला दे।"
पचीस वर्ष बीत गये। अब लहनासिंह नं 77 रैफल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न-मालूम वह कभी मिली थी¸ या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमें की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजिमेंट के अफसर की चिठ्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है¸ फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिठ्ठी मिली कि मैं और बोधसिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे। सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा।
जब चलने लगे¸ तब सूबेदार बेढे में से निकल कर आया। बोला-" लहना¸ सूबेदारनी तुमको जानती हैं¸ बुलाती हैं। जा मिल आ।" लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती हैं? कब से? रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाजे पर जा कर 'मत्था टेकना'कहा। आसीस सुनी। लहनासिंह चुप।
मुझे पहचाना?"
"नहीं।"
'तेरी कुड़माई हो गई -धत्‌ -कल हो गई - देखते नहीं¸ रेशमी बूटोंवाला सालू -अमृतसर में.. '
भावों की टकराहट से मूर्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।
'वजीरा¸ पानी पिला'- 'उसने कहा था।'
स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है - " मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है¸ लायलपुर में जमीन दी है¸ आज नमक-हलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पल्टन क्यों न बना दी¸ जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए¸ पर एक भी नहीं जीया।' सूबेदारनी रोने लगी। 'अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टाँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दूकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे¸ आप घोड़े की लातों में चले गए थे¸ और मुझे उठा-कर दूकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे आँचल पसारती हूँ।'
रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई। लहना भी आँसू पोंछता हुआ बाहर आया।
'वजीरासिंह¸ पानी पिला दे' - 'उसने कहा था।'
लहना का सिर अपनी गोद में रखे वजीरासिंह बैठा है। जब माँगता है¸ तब पानी पिला देता है। आध घण्टे तक लहना चुप रहा¸ फिर बोला - "कौन ! कीरतसिंह?"
वजीरा ने कुछ समझकर कहा- " हाँ।"
" भइया¸ मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।" वजीरा ने वैसे ही किया।
"हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस¸ अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चचा-भतीजा दोनों यहीं बैठ कर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था¸ उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।"
वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे।
कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा - फ्रान्स और बेलजियम -- 68 वीं सूची -- मैदान में घावों से मरा - नं 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी