Sunday, March 26, 2017

SHARDA SINHA BIOGRAPHY IN HINDI

शारदा सिन्हा (गायिका)

बिहार में छठ के पारंपरिक गीत हों या विवाह के मौके पर कानों में अक्सर सुनाई देने वाले गीत,इन गीतों का दूसरा नाम ही पद्मश्री शारदा सिन्हा कहा जाता है। शारदा कहती हैं कि बचपन में पटना में रहकर शिक्षा ले रही थी,स्कूल और कॉलेज के दिनों में गर्मी की छुट्टी होने पर अपने गांव हुलास जाती थी। वहां आम के अपने बगीचे या गाछी में दूसरी लड़कियों के साथ शौक से आम को अगोरने(रक्षा करने)जाती थी। इस दौरान रिश्तेदार लड़कियों के साथ लोक गीत गाना सीखा। हम बगीचे में दिन भर रहते और खूब लोक गीत गाती थी।कई बॉलीवुड फिल्मों में गा चुकीं हैं सॉन्ग्स...


-पर्व त्योहारों से लेकर दूसरे शुभ अवसरों पर इनके गाए गीत जहां एक ओर बिहार की लोक संस्कृति की सोंधी महक बिखेरते हैं वहीं यह गीत कानों में मिश्री घोलने का भी काम करते हैं।
-बिहार ही नहीं,बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश,झारखंड समेत मॉरीशस तक में इनके लोकगीतों को खासा पसंद किया जाता है।
-अपने गायन से बिहार के लोकगीतों को इन्होंने जन-जन तक पहुंचाने का काम ही नहीं किया है बल्कि इसे संरक्षित भी किया है।
-शारदा सिन्हा के बारे में आमतौर पर लोग जानते हैं कि वह मैथिली,भोजपुरी आदि भाषाओं की एक ख्यातिप्राप्त लोक गायिका हैं।
-मैंने प्यार किया,हम आपके हैं कौन जैसी चर्चित हिंदी फिल्मों में अपनी आवाज दे चुकी हैं। इनके गाए भजन घर से लेकर मंदिरों तक में सुनने को मिल जाते हैं।
-लेकिन,बहुत कम लोगों को पता होगा कि वह कभी मणिपुरी नृत्य की एक अच्छी नृत्यांगना भी रह चुकी हैं। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की भी उच्च शिक्षा प्रतिष्ठित गुरुओं से ली है।
-शारदा बताती हैं कि जन्म तब के सहरसा और अब के सुपौल जिले के हुलास गांव के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। पिता शुकदेव ठाकुर शिक्षा विभाग में वरिष्ठ अधिकारी थे।

शारदा कहती हैं कि बचपन पटना में बीता

-बांकीपुर गर्ल्स हाईस्कूल की छात्रा रही बाद में मगध महिला कॉलेज से स्नातक किया। इसके बाद प्रयाग संगीत समिति,इलाहाबाद से संगीत में एमए किया।
-समस्तीपुर के शिक्षण महाविद्यालय से बीएड किया। पढ़ाई के दौरान संगीत साधना से भी जुड़ी रही। बचपन से ही नृत्य,गायन और मिमिकरी करती रहती थी,जिसने स्कूल-कॉलेज के दिनों में ही पहचान दिलाई।

तब हरि उप्पल सर ने मेरी आवाज सुन पूछा था कि रेडियो कहां बजा

-शारदा सिन्हा अपने छात्र जीवन से जुड़ा अनुभव सुनाते हुए कहती हैं कि एक बार भारतीय नृत्य कला मंदिर में जब मैं शिक्षा ले रही थी तब एक दिन ऐसे ही सहेलियों के साथ गीत गा रही थी।
-इसे सुन हरि उप्पल सर छात्राओं से पूछा कि यहां रेडियाे कहां बज रहा है। किसकी शरारत है कि यहां रेडियो लेकर आई है।
-सब ने कहा कि शारदा गा रही है,इसे सुन उन्होंने मुझे अपने कार्यालय में बुलाया और टेप रिकार्डर ऑन कर कहा कि अब गाओ।
-मैंने गाना शुरू किया जिसे बाद में उन्होंने सुनाया। सुन कर मुझे भी यकीन नहीं हो रहा था कि मैं इतना अच्छा गा सकती हूं। मैंने पहली बार अपना ही गाया गाना रिकार्डेड रूप में सुना था।

परिवार का रहा हर कदम पर सपोर्ट

शारदा बताती है कि गायन की इस यात्रा में पिता के साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों का भरपूर सहयोग मिला। शादी के बाद पति डॉ. ब्रज किशोर सिन्हा ने हर कदम पर साथ दिया। परिवार में बेटी वंदना, दामाद संजू कुमार, बेटा अंशुमन का भी सहयोग मिलता रहता है। बेटी वंदना खुद एक अच्छी गायिका हैं और उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। अंशुमन ने उनकी गीतों और कामों का डॉक्युमेंटेशन किया है। अंशुमन ने ही उनको नई तकनीक से जोड़ा है। अब वह शारदा सिन्हा ऑफिशियल नाम से यू ट्यूब चैनल पर भी हैं जहां उनके गानों को सुना जा सकता है।


1991 में मिला पद्मश्री सम्मान

शारदा सिन्हा को इनके गायन के लिए राज्य और देश के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। 1991 इन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री अवाॅर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। इसके साथ ही इन्हें संगीत नाटक अकादमी अवाॅर्ड समेत दर्जनों अवाॅर्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

बगीचे में अाम चुनते हुए सीखे लोकगीत

शारदा सिन्हा कहती हैं कि बचपन में पटना में रहकर शिक्षा ले रही थी, स्कूल और कॉलेज के दिनों में गर्मी की छुट्टी होने पर अपने गांव हुलास जाती थी। वहां आम के अपने बगीचे या गाछी में दूसरी लड़कियों के साथ शौक से आम को अगोरने(रक्षा करने) जाती थी। वह हम आम के टिकोले चुनती और खाती। इस दौरान रिश्तेदार लड़कियों के साथ लोक गीत गाना सीखा। हम बगीचे में दिन भर रहते और खूब लोक गीत गाती थी।

1988 में विदेश में पहला शो

शारदा सिन्हा ने अपने गायन से देश की सीमाओं से पार जाकर मॉरीशस में भी खूब लोकप्रियता पाई है। 1988 में उपराष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के साथ मॉरीशस के 20वें स्वतंत्रता दिवस पर जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में यह भी शामिल थीं। वहां इनका भव्य स्वागत किया गया, इनके गायन को पूरे मॉरीशस में सराहा गया। इस यात्रा को याद करते हुए वह बताती हैं कि हम कलाकार होटल जाने के लिए बैठे तब मेरा गाया गीत गाड़ी में बजने लगा, इसे सुन काफी चौंकी, पता किया तो पता चला कि सभी कलाकारों की गाड़ी में मेरा गाया गीत बज रहा है। इसे मॉरीशस ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन की ओर से चलाया जा रहा था। इसे सुन काफी खुशी मिली।




तब के राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधा कृष्णन ने इनके नृत्य की काफी सराहना की थी

शारदा सिन्हा को बचपन से ही नृत्य और गायन से कितना लगाव था। भारतीय नृत्य कला मंदिर में नृत्य की परीक्षा के समय इनका दाहिना हाथ फ्रैक्चर हो गया लेकिन इसके बावजूद इन्होंने मणिपुरी नृत्य किया और अपनी कक्षा में प्रथम आईं। भारतीय नृत्य कला मंदिर के ऑडिटोरियम का उद‌्घाटन करने के लिए तब के राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधा कृष्णन आए, उस कार्यक्रम में इन्होंने मणिपुरी नृत्य पेश किया जिसे उन्होंने काफी सराहा।  याद कर वह कहती हैं कि उनके गांव हुलास में दुर्गापूजा में नाटक होता था उसे देखने के लिए भी लड़कियां नहीं जाती थीं। पिता की दूरदर्शी सोच ने उन्हें घर से बाहर निकाला, घर पर गुरु को बुलाकर संगीत की शिक्षा दिलाई और बाद में भारतीय नृत्य कला मंदिर में नाम लिखवा दिया। उसी गांव में 1964 में पहली बार मंच पर भी गाकर रूढ़िवादी सोच को तोड़ा। बाद में गांव वाले परिवार वालों से पूछते कि शारदा अब कब गांव आएगी और गाएगी। वह कहती हैं कि पिता काफी प्रगतिशील थे इसलिए उन्होंने सपोर्ट किया लेकिन समाज तो रूढ़िवादी ही था इसलिए मायके के लोगों को बुरा लगता कि मैं नृत्य और गायन सीखती हूं।

लोक गीत सहज है इसलिए दिल के करीब

शारदा सिन्हा देशभर में अपने लोक गीतों के लिए जानी जाती हैं। लोक गीतों को इन्होंने एक नई ऊंचाई दी है। इसके बारे में वह कहती हैं, लोक गीतों में सहजता होती है और मैं भी स्वभाव से सहज हूं। लोक गीतों को आसानी से आम लोग समझ सकते हैं, इनके अंदर छिपे संदेशों को ग्रहण कर सकते हैं। इसलिए लोक गीतों को गाना ज्यादा पसंद करती हूं। वह कहती हैं कि आज भी आधुनिकता के दौर में हम कहीं न कहीं अपनी लोक संस्कृति से जुड़ेे हैं। अपने लोक गीतों से उन्होंने हमेशा समाज को सही दिशा देने की कोशिश की है।


गायन में शालीनता व मिट्टी की महक रहे यह कोशिश रही

वह कहती हैं कि उनके जीवन का हमेशा से यह उसूल रहा है कि वह अच्छे गाने गाएं, जो भी गाया उसमें हमेशा गुणवत्ता का ख्याल रखा है। उनका मानना है कि अच्छा गाने वाले बहुत कम गाकर भी लोगों तक पहुंच सकते हैं और लोकप्रियता पा सकते हैं। अगर किसी गाने के बोल अश्लील या अच्छे नहीं हैं तो उसे वह नहीं गातीं। गायन में शालीनता और मिट्टी की सोंधी महक रहे यह कोशिश वह हमेशा करती हैं। यही कारण है कि बॉलीवुड से आए गायन के कई प्रस्ताव को भी नकार चुकी हैं।

Tuesday, March 14, 2017

ANOYARA KHATUN BIOGRAPHY IN HINDI


अनोयरा खातून

(सामाजिक कार्यकर्ता)

पांच साल की थी मैं, जब पापा गुजर गए।
 घर के हालात खराब थे।
 फिर एक तस्कर काम के बहाने मुझे  दिल्ली ले आया। 
छह महीने बाद मैं भागकर वापस गांव पहुंची। 
तब मैंने तय किया कि
 अब गांव के किसी बच्चे का जीवन बर्बाद नहीं होने दूंगी।



पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव में रहने वाली अनोयरा ने होश संभालते ही मुश्किलों का सामना किया। पांच साल की थीं, जब पिता चल बसे। यह बात 2002 की है। इसके बाद पांच बच्चों को पालने की जिम्मेदारी मां पर आ गई।

मां पड़ोस के एक स्कूल में खाना बनाने लगीं। लेकिन उनकी कमाई घर-खर्च के लिए काफी नहीं थी। पांच बच्चों को पढ़ाना और उनके खाने-पीने का इंतजाम करना उनके बस के बाहर था। बड़ी दो बेटियां 13 और 14 साल की हो चुकी थीं। गांव की परंपरा के मुताबिक, उनकी शादी करनी थी। अनोयरा बताती हैं, हमारे गांव में बाल विवाह आम बात है।

लोग कम उम्र में बेटियों की शादी कराके अपना बोझ हल्का कर लेते हैं। काश, मैं अपनी बहनों को बाल विवाह से बचा पाती। मां ने किसी तरह जमा पूंजी से दोनों बेटियों को बिना यह देखे ब्याह दिया कि ससुराल में उनका जीवन कैसा होगा?

परिवार की आर्थिक हालत बहुत खराब थी। अनोयरा तब 12 साल की थीं। वह कक्षा चार में पढ़ रही थीं। पड़ोस के एक व्यक्ति ने लालच दिया कि शहर में नौकरी मिल जाएगी। अच्छे पैसे मिलेंगे और घर के हालात सुधर जाएंगे। अनोयरा बताती हैं, मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। बहुत दुखी थी मैं। पर क्या करती? सोचा, शहर में काम करके परिवार की मदद कर पाऊंगी।

अनोयरा दिल्ली आ गईं। एक घर में चौका-बर्तन व खाना बनाने का काम मिला। तस्कर उन्हें दिल्ली में छोड़कर गायब हो गया। वह बंधुआ मजदूर बन चुकी थीं। घर वालों से संपर्क टूट गया। मां और भाई-बहनों की बहुत याद आती थी उन्हें। किसी तरह छह महीने बीते। वह अपने गांव लौटना चाहती थीं। मगर पास में किराये के पैसे नहीं थे।

आखिर एक दिन हिम्मत जुटाई। भागकर स्टेशन पहुंची और कोलकाता वाली ट्रेन में बैठ गई। पूरा सफर इस डर के साथ बीता कि कहीं कोई देख न ले।गांव आकर पता चला कि नौकरी के नाम पर ठगी जाने वाली वह अकेली लड़की नहीं हैं। गांव के तमाम बच्चे इसी तरह तस्करों के जाल में फंस चुके थे। ज्यादातर मामलों में देखा गया कि शहर में नौकरी के नाम पर भेजे गए बच्चे कभी वापस गांव नहीं लौट पाए।

कई गरीब परिवारों की बेटियों को शादी के नाम पर बेच दिया गया था। वह समझ चुकी थीं कि गांव वालों के साथ कुछ गलत हो रहा है। उन्होंने तय किया कि वह गांव में अब ऐसा कुछ नहीं होने देंगी। उन्होंने गांव वालों को बताया कि दिल्ली में उनके साथ क्या हुआ और उनसे अपील की कि वे अपने बच्चों को बाहर न भेजें| इस बीच अनोयरा सेव द चिल्ड्रन नाम के गैर-सरकारी संगठन के संपर्क में आईं। संगठन की मदद से वह गांव वालों को बच्चों की तस्करी और बाल विवाह के बारे में जागरूक करने लगीं।

अनोयरा कहती हैं, जब आप खुद दर्द सहते हैं, तो आपके अंदर एक तड़प पैदा होती है। मेरी मजबूरी ही मेरी ताकत बन गई। इसी के सहारे मैंने लड़ाई शुरू की। उन्होंने गांव के बच्चों की एक टोली बनाई। इसकी मदद से वह उन लोगों पर नजर रखने लगीं, जो शादी के नाम पर कम उम्र की लड़कियों का सौदा करते थे।

शुरुआत में गांव वालों को यह अच्छा नहीं लगा। वे भड़क जाते थे, यह लड़की क्यों नेता बन रही है? इससे क्या मतलब? यह कौन होती है हमें रोकने वाली? यहां तक कि उनके अपने घर वाले नहीं चाहते थे कि वह गांव में अभियान चलाएं। अनोयरा बताती हैं, मां और भाई नहीं चाहते थे कि मैं यह सब करूं। मगर मैंने किसी की नहीं सुनी।एक दिन रात में उन्हें खबर मिली कि तस्कर गांव की एक लड़की को पकड़ ले जाने वाले हैं।

वह मां को बिना बताए रात में चुपचाप घर से निकलीं। तस्कर का पीछा करने के लिए गांव की नहर पार करनी पड़ी। उन्होंने तस्कर को ललकारा, तो वह लड़की को छोड़कर भाग गया। अब गांव वालों का नजरिया बदलने लगा। देखते-देखते अनोयरा गांव के बच्चों की रोल मॉडल बन गईं। सारे बच्चे उन्हें दीदी बुलाने लगे। आस-पास के गांवों के लोग भी जुड़ते गए।

हालांकि सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने कई बाल विवाह रुकवाए। कई बच्चों को तस्करों के जाल में फंसने से बचाया। कई बार गांव के बड़े-बूढ़ों का विरोध भी सहना पड़ा। कई लोगों को लगता था कि यह लड़की उनके व्यक्तिगत जीवन में दखल दे रही है।

अनोयरा बताती हैं, हमने कभी बड़ों का अपमान नहीं किया। बस उनसे विनती की कि वे अपनी बेटियों का जीवन खराब न करें। उन्हें पढ़ने दें। उनका संघर्ष जारी रहा। उन्होंने दोबारा स्कूल जाना शुरू किया। स्कूल से घर लौटने के बाद बच्चों की टोली के संग शाम को गांव वालों को जागरूक करने निकलती थीं। स्कूल के शिक्षकों ने भी उनका साथ दिया। वह कॉलेज जाने वाली गांव की पहली लड़की हैं।

आस-पास के इलाकों में उनकी चर्चा होने लगी। कई बार बच्चों को बचाने के लिए पुलिस की मदद भी लेनी पड़ी। आज 40 गांवों में उनका नेटवर्क काम करता है। साल 2012 में उन्हें इंटरनेशनल चिल्ड्रन पीस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस महिला दिवस पर राष्ट्रपति ने उन्हें नारी शक्ति अवॉर्ड से सम्मानित किया। अनोयरा कहती हैं, मैं ऐसी दुनिया देखना चाहती हूं, जहां हर बच्चे को खुशियां नसीब हो। हर बच्च स्कूल जाए।


साभार -हिंदुस्तान अख़बार

Monday, March 6, 2017

SADGATI-MUNSHI PREMCHAND



सद्गति 


(रचनाकार: मुंशी प्रेमचंद)



दुखी चमार द्वार पर झाडू लगा रहा था और उसकी पत्नी झुरिया, घर को गोबर से लीप रही थी। दोनों अपने-अपने काम से फुर्सत पा चुके थे, तो चमारिन ने कहा, 'तो जाके पंडित बाबा से कह आओ न। ऐसा न हो कहीं चले जाएं जाएं।'

दुखी -' हाँ जाता हूँ, लेकिन यह तो सोच, बैठेंगे किस चीज पर ?'

झुरिया -' क़हीं से खटिया न मिल जाएगी ? ठकुराने से माँग लाना।'

दुखी -' तू तो कभी-कभी ऐसी बात कह देती है कि देह जल जाती है। ठकुरानेवाले मुझे खटिया देंगे ! आग तक तो घर से निकलती नहीं, खटिया देंगे ! कैथाने में जाकर एक लोटा पानी माँगूँ तो न मिले। भला खटिया कौन देगा ! हमारे उपले, सेंठे, भूसा, लकड़ी थोड़े ही हैं कि जो चाहे उठा ले जाएं। ले अपनी खटोली धोकर रख दे। गरमी के तो दिन हैं। उनके आते-आते सूख जाएगी।'

झुरिया -'वह हमारी खटोली पर बैठेंगे नहीं। देखते नहीं कितने नेम-धरम से रहते हैं।'

दुखी ने जरा चिंतित होकर कहा, 'हाँ, यह बात तो है। महुए के पत्ते तोड़कर एक पत्तल बना लूँ तो ठीक हो जाए। पत्तल में बड़े-बड़े आदमी खाते हैं। वह पवित्तर है। ला तो डंडा, पत्ते तोड़ लूँ।'

झुरिया -'पत्तल मैं बना लूँगी, तुम जाओ। लेकिन हाँ, उन्हें सीधा भी तो देना होगा। अपनी थाली में रख दूँ ?'

दुखी -'क़हीं ऐसा गजब न करना, नहीं तो सीधा भी जाए और थाली भी फूटे ! बाबा थाली उठाकर पटक देंगे। उनको बड़ी जल्दी विरोध चढ़ आता है। किरोध में पंडिताइन तक को छोड़ते नहीं, लड़के को ऐसा पीटा कि आज तक टूटा हाथ लिये फिरता है। पत्तल में सीधा भी देना, हाँ। मुदा तू छूना मत।'

झूरी -' गोंड़ की लड़की को लेकर साह की दूकान से सब चीजें ले आना। सीधा भरपूर हो। सेर भर आटा, आधा सेर चावल, पाव भर दाल, आधा पाव घी, नोन, हल्दी और पत्तल में एक किनारे चार आने पैसे रख देना। गोंड़ की लड़की न मिले तो भुर्जिन के हाथ-पैर जोड़कर ले जाना। तू कुछ मत छूना, नहीं गजब हो जाएगा।'


इन बातों की ताकीद करके दुखी ने लकड़ी उठाई और घास का एक बड़ा-सा गट्ठा लेकर पंडितजी से अर्ज करने चला। खाली हाथ बाबाजी की सेवा में कैसे जाता। नजराने के लिए उसके पास घास के सिवाय और क्या था। उसे खाली देखकर तो बाबा दूर ही से दुत्कारते। पं. घासीराम ईश्वर के परम भक्त थे। नींद खुलते ही ईशोपासन में लग जाते। मुँह-हाथ धोते आठ बजते, तब असली पूजा शुरू होती, जिसका पहला भाग भंग की तैयारी थी। उसके बाद आधा घण्टे तक चन्दन रगड़ते, फिर आईने के सामने एक तिनके से माथे पर तिलक लगाते। चन्दन की दो रेखाओं के बीच में लाल रोरी की बिन्दी होती थी। फिर छाती पर, बाहों पर चन्दन की

गोल-गोल मुद्रिकाएं बनाते। फिर ठाकुरजी की मूर्ति निकालकर उसे नहलाते, चन्दन लगाते, फूल चढ़ाते, आरती करते, घंटी बजाते। दस बजते-बजते वह पूजन से उठते और भंग छानकर बाहर आते। तब तक दो-चार जजमान द्वार पर आ जाते ! ईशोपासन का तत्काल फल मिल जाता। वही उनकी खेती थी। आज वह पूजन-गृह से निकले, तो देखा दुखी चमार घास का एक गट्ठा लिये बैठा है। दुखी उन्हें देखते ही उठ खड़ा हुआ और उन्हें साष्टांग दंडवत् करके हाथ बाँधकर खड़ा हो गया। यह तेजस्वी मूर्ति देखकर उसका ह्रदय श्रृद्धा से परिपूर्ण हो गया ! कितनी दिव्य मूर्ति थी। छोटा-सा गोल-मटोल आदमी, चिकना सिर, फूले गाल, ब्रह्मतेज से प्रदीप्त आँखें। रोरी और चंदन देवताओं की प्रतिभा प्रदान कर रही थी। दुखी को देखकर श्रीमुख से बोले - 'आज कैसे चला रे दुखिया ?'

दुखी -'ने सिर झुकाकर कहा, बिटिया की सगाई कर रहा हूँ महाराज। कुछ साइत-सगुन विचारना है। कब मर्जी होगी ?'

घासी -'आज मुझे छुट्टी नहीं। हाँ साँझ तक आ जाऊँगा।'

दुखी -'नहीं महाराज, जल्दी मर्जी हो जाए। सब सामान ठीक कर आया हूँ। यह घास कहाँ रख दूँ ?

घासी -'इस गाय के सामने डाल दे और जरा झाडू लेकर द्वार तो साफ कर दे। यह बैठक भी कई दिन से लीपी नहीं गई। उसे भी गोबर से लीप दे। तब तक मैं भोजन कर लूँ। फिर जरा आराम करके चलूँगा। हाँ, यह लकड़ी भी चीर देना। खलिहान में चार खाँची भूसा पड़ा है। उसे भी उठा लाना और भुसौली में रख देना।'

दुखी फौरन हुक्म की तामील करने लगा। द्वार पर झाडू लगाई, बैठक को गोबर से लीपा। तब बारह बज गये। पंडितजी भोजन करने चले गये। दुखी ने सुबह से कुछ नहीं खाया था। उसे भी जोर की भूख लगी; पर वहाँ

खाने को क्या धारा था। घर यहाँ से मील भर था। वहाँ खाने चला जाए, तो पंडितजी बिगड़ जाएं। बेचारे ने भूख दबाई और लकड़ी फाड़ने लगा। लकड़ी की मोटी-सी गाँठ थी; जिस पर पहले कितने ही भक्तों ने अपना जोर आजमा लिया था। वह उसी दम-खम के साथ लोहे से लोहा लेने के लिए तैयार थी। दुखी घास छीलकर बाजार ले जाता था। लकड़ी चीरने का उसे अभ्यास न था। घास उसके खुरपे के सामने सिर झुका देती थी। यहाँ कस-कसकर कुल्हाड़ी का भरपूर हाथ लगाता; पर उस गाँठ पर निशान तक न पड़ता था। कुल्हाड़ी उचट जाती। पसीने में तर था, हाँफता था, थककर बैठ जाता था, फिर उठता था। हाथ उठाये न उठते थे, पाँव काँप रहे थे, कमर न सीधी होती थी, आँखों तले अँधेरा हो रहा था, सिर में चक्कर आ रहे थे, तितलियाँ उड़ रही थीं, फिर भी अपना काम किये जाता था। अगर एक चिलम तम्बाकू पीने को मिल जाती, तो शायद कुछ ताकत आती।

उसने सोचा, यहाँ चिलम और तम्बाकू कहाँ मिलेगी। बाह्मनों का पूरा है। बाह्मन लोग हम नीच जातों की तरह तम्बाकू थोड़े ही पीते हैं। सहसा उसे याद आया कि गाँव में एक गोंड़ भी रहता है। उसके यहाँ जरूर चिलम-तमाखू होगी। तुरत उसके घर दौड़ा। खैर मेहनत सुफल हुई। उसने तमाखू भी दी और चिलम भी दी; पर आग वहाँ न थी। दुखी ने कहा, आग की चिन्ता न करो भाई। मैं जाता हूँ, पंडितजी के घर से आग माँग लूँगा। वहाँ तो अभी रसोई बन रही थी। यह कहता हुआ वह दोनों चीज़ें लेकर चला आया और पंडितजी के घर में बरौठे के द्वार पर खड़ा होकर बोला, 'मालिक, रचिके आग मिल जाए, तो चिलम पी लें।'

पंडितजी भोजन कर रहे थे। पंडिताइन ने पूछा, 'यह कौन आदमी आग माँग रहा है ?'

पंडित -'अरे वही ससुरा दुखिया चमार है। कहा, है थोड़ी-सी लकड़ी चीर दे। आग तो है, दे दो।'

पंडिताइन ने भॅवें चढ़ाकर कहा, 'तुम्हें तो जैसे पोथी-पत्रो के फेर में धरम-करम किसी बात की सुधि ही नहीं रही। चमार हो, धोबी हो, पासी हो, मुँह उठाये घर में चला आये। हिन्दू का घर न हुआ, कोई सराय हुई। कह दो दाढ़ीजार से चला जाए, नहीं तो इस लुआठे से मुँह झुलस दूँगी। आग माँगने चले हैं।'

पंडितजी ने उन्हें समझाकर कहा, 'भीतर आ गया, तो क्या हुआ। तुम्हारी कोई चीज तो नहीं छुई। धरती पवित्र है। जरा-सी आग दे क्यों नहीं देती, काम तो हमारा ही कर रहा है। कोई लोनिया यही लकड़ी फाड़ता, तो

कम-से-कम चार आने लेता।'

पंडिताइन ने गरजकर कहा, 'वह घर में आया क्यों !'

पंडित ने हारकर कहा, 'ससुरे का अभाग था और क्या !'

पंडिताइन--'अच्छा, इस बखत तो आग दिये देती हूँ, लेकिन फिर जो इस तरह घर में आयेगा, तो उसका मुँह ही जला दूँगी।'

दुखी के कानों में इन बातों की भनक पड़ रही थी। पछता रहा था, नाहक आया। सच तो कहती हैं। पंडित के घर में चमार कैसे चला आये। बड़े पवित्तर होते हैं यह लोग, तभी तो संसार पूजता है, तभी तो इतना मान है। भर-चमार थोड़े ही हैं। इसी गाँव में बूढ़ा हो गया; मगर मुझे इतनी अकल भी न आई। इसलिए जब पंडिताइन आग लेकर निकलीं, तो वह मानो स्वर्ग का वरदान पा गया। दोनों हाथ जोड़कर जमीन पर माथा टेकता हुआ बोला, 'पड़ाइन माता, मुझसे बड़ी भूल हुई कि घर में चला आया। चमार की अकल ही तो ठहरी। इतने मूरख न होते, तो लात क्यों खाते।'

पंडिताइन चिमटे से पकड़कर आग लाई थीं। पाँच हाथ की दूरी से घूँघट की आड़ से दुखी की तरफ आग फेंकी। आग की बड़ी-सी चिनगारी दुखी के सिर पर पड़ गयी। जल्दी से पीछे हटकर सिर के झोटे देने लगा। उसने मन में कहा, यह एक पवित्तर बाह्मन के घर को अपवित्तर करने का फल है। भगवान ने कितनी जल्दी फल दे दिया। इसी से तो संसार पंडितों से डरता है। और सबके रुपये मारे जाते हैं बाह्मन के रुपये भला कोई मार तो ले ! घर भर का सत्यानाश हो जाए, पाँव गल-गलकर गिरने लगे। बाहर आकर उसने चिलम पी और फिर कुल्हाड़ी लेकर जुट गया। खट-खट की आवाजें आने लगीं। उस पर आग पड़ गई, तो पंडिताइन को उस पर कुछ दया आ गई। पंडितजी भोजन करके उठे, तो बोलीं -'इस चमरवा को भी कुछ खाने को दे दो, बेचारा कब से काम कर रहा है। भूखा होगा।'

पंडितजी ने इस प्रस्ताव को व्यावहारिक क्षेत्र से दूर समझकर पूछा, 'रोटियाँ हैं ?'

पंडिताइन -'दो-चार बच जाएंगी।'

पंडित -'दो-चार रोटियों में क्या होगा ? चमार है, कम से कम सेर भर चढ़ा जाएगा।'

पंडिताइन कानों पर हाथ रखकर बोलीं, 'अरे बाप रे ! सेर भर ! तो फिर रहने दो।'

पंडितजी ने अब शेर बनकर कहा, 'क़ुछ भूसी-चोकर हो तो आटे में मिलाकर दो ठो लिट्टा ठोंक दो। साले का पेट भर जाएगा। पतली रोटियों से इन नीचों का पेट नहीं भरता। इन्हें तो जुआर का लिट्टा चाहिए।'

पंडिताइन ने कहा, 'अब जाने भी दो, धूप में कौन मरे।'

दुखी ने चिलम पीकर फिर कुल्हाड़ी सँभाली। दम लेने से जरा हाथों में ताकत आ गई थी। कोई आधा घण्टे तक फिर कुल्हाड़ी चलाता रहा। फिर बेदम होकर वहीं सिर पकड़ के बैठ गया। इतने में वही गोंड़ आ गया। बोला, 'क्यों जान देते हो बूढ़े दादा, तुम्हारे फाड़े यह गाँठ न फटेगी। नाहक हलाकान होते हो।'

दुखी ने माथे का पसीना पोंछकर कहा, 'अभी गाड़ी भर भूसा ढोना है भाई !'

गोंड़ -'क़ुछ खाने को मिला कि काम ही कराना जानते हैं। जाके माँगते क्यों नहीं ?'

दुखी -'क़ैसी बात करते हो चिखुरी, बाह्मन की रोटी हमको पचेगी !'

गोंड़ -'पचने को पच जाएगी, पहले मिले तो। मूँछों पर ताव देकर भोजन किया और आराम से सोये, तुम्हें लकड़ी फाड़ने का हुक्म लगा दिया। जमींदार भी कुछ खाने को देता है। हाकिम भी बेगार लेता है, तो थोड़ी बहुत मजूरी देता है। यह उनसे भी बढ़ गये, उस पर धर्मात्मा बनते हैं।'

दुखी -'धीरे-धीरे बोलो भाई, कहीं सुन लें तो आफत आ जाए।'

यह कहकर दुखी फिर सँभल पड़ा और कुल्हाड़ी की चोट मारने लगा। चिखुरी को उस पर दया आई। आकर कुल्हाड़ी उसके हाथ से छीन ली और कोई आधा घंटे खूब कस-कसकर कुल्हाड़ी चलाई; पर गाँठ में एक दरार भी न पड़ी। तब उसने कुल्हाड़ी फेंक दी और यह कहकर चला गया तुम्हारे फाड़े यह न फटेगी, जान भले निकल जाए।'

दुखी सोचने लगा, बाबा ने यह गाँठ कहाँ रख छोड़ी थी कि फाड़े नहीं फटती। कहीं दरार तक तो नहीं पड़ती। मैं कब तक इसे चीरता रहूँगा। अभी घर पर सौ काम पड़े हैं। कार-परोजन का घर है, एक-न-एक चीज घटी ही रहती है; पर इन्हें इसकी क्या चिंता। चलूँ जब तक भूसा ही उठा लाऊँ। कह दूँगा, बाबा, आज तो लकड़ी नहीं फटी, कल आकर फाड़ दूँगा। उसने झौवा उठाया और भूसा ढोने लगा। खलिहान यहाँ से दो फरलांग से कम न था। अगर झौवा खूब भर-भर कर लाता तो काम जल्द खत्म हो जाता; फि र झौवे को उठाता कौन। अकेले भरा हुआ झौवा उससे न उठ सकता था। इसलिए थोड़ा-थोड़ा लाता था। चार बजे कहीं भूसा खत्म हुआ। पंडितजी की नींद भी खुली। मुँह-हाथ धोया, पान खाया और बाहर निकले। देखा, तो दुखी झौवा सिर पर रखे सो रहा है। जोर से बोले -'अरे, दुखिया तू सो रहा है ? लकड़ी तो अभी ज्यों की त्यों पड़ी हुई है। इतनी देर तू करता क्या रहा ? मुट्ठी भर भूसा ढोने में संझा कर दी ! उस पर सो रहा है। उठा ले कुल्हाड़ी और लकड़ी फाड़ डाल। तुझसे जरा-सी लकड़ी नहीं फटती। फिर साइत भी वैसी ही निकलेगी, मुझे दोष मत देना ! इसी से कहा, है कि नीच के घर में खाने को हुआ और उसकी आँख बदली।'

दुखी ने फिर कुल्हाड़ी उठाई। जो बातें पहले से सोच रखी थीं, वह सब भूल गईं। पेट पीठ में धॉसा जाता था, आज सबेरे जलपान तक न किया था। अवकाश ही न मिला। उठना ही पहाड़ मालूम होता था। जी डूबा जाता था, पर दिल को समझाकर उठा। पंडित हैं, कहीं साइत ठीक न विचारें, तो फिर सत्यानाश ही हो जाए। जभी तो संसार में इतना मान है। साइत ही का तो सब खेल है। जिसे चाहे बिगाड़ दें। पंडितजी गाँठ के पास आकर खड़े हो गये और बढ़ावा देने लगे हाँ, मार कसके, और मार क़सके मार अबे जोर से मार तेरे हाथ में तो जैसे दम ही नहीं है लगा कसके, खड़ा सोचने क्या लगता है हाँ बस फटा ही चाहती है ! दे उसी दरार में ! दुखी अपने होश में न था। न-जाने कौन-सी गुप्तशक्ति उसके हाथों को चला रही थी। वह थकान, भूख, कमजोरी सब मानो भाग गई। उसे अपने बाहुबल पर स्वयं आश्चर्य हो रहा था। एक-एक चोट वज्र की तरह पड़ती थी। आधा घण्टे तक वह इसी उन्माद की दशा में हाथ चलाता रहा, यहाँ तक कि लकड़ी बीच से फट गई और दुखी के हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी। इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा। भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया।

पंडितजी ने पुकारा, 'उठके दो-चार हाथ और लगा दे। पतली-पतली चैलियाँ हो जाएं। दुखी न उठा। पंडितजी ने अब उसे दिक करना उचित न समझा। भीतर जाकर बूटी छानी, शौच गये, स्नान किया और पंडिताई बाना पहनकर बाहर निकले ! दुखी अभी तक वहीं पड़ा हुआ था। जोर से पुकारा -'अरे क्या पड़े ही रहोगे दुखी, चलो तुम्हारे ही घर चल रहा हूँ। सब सामान ठीक-ठीक है न ? दुखी फिर भी न उठा।'

अब पंडितजी को कुछ शंका हुई। पास जाकर देखा, तो दुखी अकड़ा पड़ा हुआ था। बदहवास होकर भागे और पंडिताइन से बोले, 'दुखिया तो जैसे मर गया।'

पंडिताइन हकबकाकर बोलीं-'वह तो अभी लकड़ी चीर रहा था न ?'

पंडित -'हाँ लकड़ी चीरते-चीरते मर गया। अब क्या होगा ?'

पंडिताइन ने शान्त होकर कहा, 'होगा क्या, चमरौने में कहला भेजो मुर्दा उठा ले जाएं।'

एक क्षण में गाँव भर में खबर हो गई। पूरे में ब्राह्मनों की ही बस्ती थी। केवल एक घर गोंड़ का था। लोगों ने इधर का रास्ता छोड़ दिया। कुएं का रास्ता उधर ही से था, पानी कैसे भरा जाए ! चमार की लाश के पास से होकर पानी भरने कौन जाए। एक बुढ़िया ने पण्डितजी से कहा, अब मुर्दा फेंकवाते क्यों नहीं ? कोई गाँव में पानी पीयेगा या नहीं। इधर गोंड़ ने चमरौने में जाकर सबसे कह दिया ख़बरदार, मुर्दा उठाने मत जाना। अभी पुलिस की तहकीकात होगी। दिल्लगी है कि एक गरीब की जान ले ली। पंडितजी होंगे, तो अपने घर के होंगे। लाश उठाओगे तो तुम भी पकड़ जाओगे। इसके बाद ही पंडितजी पहुँचे; पर चमरौने का कोई आदमी लाश उठा लाने को तैयार न हुआ, हाँ दुखी की स्त्री और कन्या दोनों हाय-हाय करती वहाँ चलीं और पंडितजी के द्वार पर आकर सिर पीट-पीटकर रोने लगीं। उनके साथ दस-पाँच और चमारिनें थीं। कोई रोती थी, कोई समझाती थी, पर चमार एक भी न था। पण्डितजी ने चमारों को बहुत धामकाया, समझाया, मिन्नत की; पर चमारों के दिल पर पुलिस का रोब छाया हुआ था, एक भी न मिनका। आखिर निराश होकर लौट आये।

आधी रात तक रोना-पीटना जारी रहा। देवताओं का सोना मुश्किल हो गया। पर लाश उठाने कोई चमार न आया और ब्राह्मन चमार की लाश कैसे उठाते ! भला ऐसा किसी शास्त्र-पुराण में लिखा है ? कहीं कोई दिखा दे। पंडिताइन ने झुँझलाकर कहा, 'इन डाइनों ने तो खोपड़ी चाट डाली। सभों का गला भी नहीं पकता। पंडित ने कहा, रोने दो चुड़ैलों को, कब तक रोयेंगी। जीता था, तो कोई बात न पूछता था। मर गया, तो कोलाहल मचाने के लिए सब की सब आ पहुँचीं।'

पंडिताइन -'चमार का रोना मनहूस है।'

पंडित -'हाँ, बहुत मनहूस।'

पंडिताइन -'अभी से दुर्गन्ध उठने लगी।'

पंडित -'चमार था ससुरा कि नहीं। साध-असाध किसी का विचार है इन सबों को।'

पंडिताइन -'इन सबों को घिन भी नहीं लगती।'

पंडित-' भ्रष्ट हैं सब।'

रात तो किसी तरह कटी; मगर सबेरे भी कोई चमार न आया। चमारिनें भी रो-पीटकर चली गईं। दुर्गन्ध कुछ-कुछ फैलने लगी। पंडितजी ने एक रस्सी निकाली। उसका फन्दा बनाकर मुरदे के पैर में डाला और फन्दे को खींचकर कस दिया। अभी कुछ-कुछ धुँधलका था। पंडितजी ने रस्सी पकड़कर लाश को घसीटना शुरू किया और गाँव के बाहर घसीट ले गये। वहाँ से आकर तुरन्त स्नान किया, दुर्गापाठ पढ़ा और घर में गंगाजल छिड़का।

उधर दुखी की लाश को खेत में गीदड़ और गिद्ध, कुत्ते और कौए नोच रहे थे। यही जीवन-पर्यन्त की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।

- प्रेमचंद

Sunday, March 5, 2017

PARDA-YASHPAL


परदा

 ( रचनाकार: यशपाल )


कथा-कहानी

चौधरी पीरबख्श के दादा चुंगी के महकमे में दारोगा थे । आमदनी अच्छी थी । एक छोटा, पर पक्का मकान भी उन्होंने बनवा लिया । लड़कों को पूरी तालीम दी । दोनों लड़के एण्ट्रेन्स पास कर रेलवे में और डाकखाने में बाबू हो गये । चौधरी साहब की ज़िन्दगी में लडकों के ब्याह और बाल-बच्चे भी हुए, लेकिन ओहदे में खास तरक्की न हुई; वही तीस और चालीस रुपये माहवार का दर्जा ।


अपने जमाने की याद कर चौधरी साहब कहते-''वो भी क्या वक्त थे ! लोग मिडिल पास कर डिप्टी-कलेक्टरी करते थे और आजकल की तालीम है कि एण्ट्रेन्स तक अंग्रेज़ी पढ़कर लड़के तीस-चालीस से आगे नहीं बढ पाते ।'' बेटों को ऊँचे ओहदों पर देखने का अरमान लिये ही उन्होंने आँखें मूंद लीं ।


इंशा अल्ला, चौधरी साहब के कुनबे में बरक्कत हुई । चौधरी फ़ज़ल कुरबान रेलवे में काम करते थे । अल्लाह ने उन्हें चार बेटे और तीन-बेटियां दीं। चौधरी इलाही बख्श डाकखाने में थे । उन्हें भी अल्लाह ने चार बेटे और दो लड़कियाँ बख्शीं ।


चौधरी-खानदान अपने मकान को हवेली पुकारता था । नाम बड़ा देने पर जगह तंग ही रही । दारोगा साहब के जमाने में ज़नाना भीतर था और बाहर बैठक में वे मोढ़े पर बैठ नैचा गुड़गुड़ाया करते । जगह की तंगी की वजह से उनके बाद बैठक भी ज़नाने में शामिल हो गयी और घर की ड्योढ़ी पर परदा लटक गया। बैठक न रहने पर भी घर की इज्जत का ख्याल था, इसलिए पर्दा बोरी के टाट का नहीं, बढ़िया किस्म का रहता ।


ज़ाहिर है, दोनों भाइयों के बाल-बच्चे एक ही मकान में रहने पर भी भीतर सब अलग-अलग था । डयोढ़ी का पर्दा कौन भाई लाये? इस समस्या का हल इस तरह हुआ कि दारोगा साहब के जमाने की पलंग की रंगीन दरियाँ एक के बाद एक डयोढ़ी में लटकाई जाने लगीं ।


तीसरी पीढ़ी के ब्याह-शादी होने लगे । आखिर चौधरी-खानदान की औलाद को हवेली छोड़ दूसरी जगहें तलाश करनी पड़ी । चौधरी इलाही बख्श के बड़े साहबजादे एण्ट्रेन्स पास कर डाकखाने में बीस रुपये की क्लर्की पा गये । दूसरे साहबजादे मिडिल पास कर अस्पताल में कम्पाउण्डर बन गये ।ज्यों-ज्यों जमाना गुजरता जाता, तालीम और नौकरी दोनों मुश्किल होती जातीं तीसरे बेटे होनहार थे । उन्होंने वज़ीफ़ा पाया । जैसे-तैसे मिडिल कर स्कूल में मुदर्रिस हो देहात चले गये ।


चौथे लड़के पीरबख्श प्राइमरी से आगे न बढ़ सके । आजकल की तालीम माँ-बाप पर खर्च के बोझ के सिवा और है क्या? स्कूल की फीस हर महीने, और किताबों, कापियों और नक्शों के लिए रुपये-ही-रुपये!


चौधरी पीरबख्श का भी ब्याह हो गया मौला के करम से बीबी की गोद भी जल्दी ही भरी । पीरबख्श ने रौजगार के तौर पर खानदान की इज्ज़त के ख्याल से एक तेल की मिल में मुंशीगिरी कर लीं । तालीम ज्यादा नहीं तो क्या, सफेदपोश खानदान की इज्ज़त का पास तो था । मजदूरी और दस्तकारी उनके करने की चीजें न थीं । चौकी पर बैठते । कलम-दवात का काम था ।


बारह रुपया महीना अधिक नहीं होता । चौधरी पीरबख्श को मकान सितवा की कच्ची बस्ती में लेना पड़ा । मकान का किराया दो रुपया था । आसपास गरीब और कमीने लोगों की बस्ती थी । कच्ची गली के बीचों-बीच, गली के मुहाने पर लगे कमेटी के नल से टपकते पानी की काली धार बहती रहती, जिसके किनारे घास उग आयी थी । नाली पर मच्छरों और मक्खियों के बादल उमड़ते रहते । सामने रमजानी धोबी की भट्‌ठी थी, जिसमें से धुँआँ और सज्जी मिले उबलते कपड़ों की गंध उड़ती रहती । दायीं ओर बीकानेरी मोचियों के घर थे । बायीं ओर वर्कशाप में काम करने वाले कुली रहते ।


इस सारी बस्ती में चौधरी पीरबख्श ही पढ़े-लिखे सफ़ेदपोश थे । सिर्फ उनके ही घर की डयोढ़ी पर पर्दा था । सब लोग उन्हें चौधरीजी, मुंशीजी कहकर सलाम करते । उनके घर की औरतों को कभी किसी ने गली में नहीं देखा । लड़कियाँ चार-पाँच बरस तक किसी काम-काज से बाहर निकलती और फिर घर की आबरू के ख्याल से उनका बाहर निकलना मुनासिब न था। पीर बख्श खुद ही मुस्कुराते हुए सुबह-शाम कमेटी के नल से घड़े भर लाते ।


चौधरी की तनख्वाह पद्रह बरस में बारह से अठारह हो गयी । खुदा की बरक्कत होती है, तो रुपये-पैसे की शक्ल में नहीं, आल-औलाद की शक्ल में होती है । पंद्रह बरस में पाँच बच्चे हुए । पहलै तीन लड़कियाँ और बाद में दो लड़के ।


दूसरी लड़की होने को थी तो पीरबख्श की वाल्दा मदद के लिए आयीं । वालिद साहब का इंतकाल हो चुका था । दूसरा कोई भाई वाल्दा की फ़िक्र करने आया नहीं; वे छोटे लड़के के यहाँ ही रहने लगीं ।


जहाँ बाल-बच्चे और घर-बार होता है, सौ किस्म की झंझटें होती ही हैं । कभी बच्चे को तकलीफ़ है, तो कभी ज़च्चा को । ऐसे वक्त में कर्ज़ की जरूरत कैसे न हो ? घर-बार हो, तो कर्ज़ भी होगा ही ।


मिल की नौकरी का कायदा पक्का होता है । हर महीने की सात तारीख को गिनकर तनख्वाह मिल जाती है । पेशगी से मालिक को चिढ़ है । कभी बहुत ज़रूरत पर ही मेहरबानी करते । ज़रूरत पड़ने पर चौधरी घर की कोई छोटी-मोटी चीज़ गिरवी रख कर उधार ले आते । गिरवी रखने से रुपये के बारह आने ही मिलते । ब्याज मिलाकर सोलह ऑने हो जाते और फिर चीज़ के घर लौट आने की सम्भावना न रहती ।


मुहल्ले में चौधरी पीरबख्श की इज्ज़त थी । इज्ज़त का आधार था, घर के दरवाजे़ पर लटका पर्दा । भीतर जो हो, पर्दा सलामत रहता । कभी बच्चों की खींचखाँच या बेदर्द हवा के झोंकों से उसमें छेद हो जाते, तो परदे की आड़ से हाथ सुई-धागा ले उसकी मरम्मत कर देते ।


दिनों का खेल ! मकान की डयोढ़ी के किवाड़ गलते-गलते बिलकुल गल गये । कई दफे़ कसे जाने से पेच टूट गये और सुराख ढीले पड़ गये । मकान मालिक सुरजू पांडे को उसकी फ़िक्र न थी । चौधरी कभी जाकर कहते-सुनते तो उत्तर मिलता--''कौन बड़ी रकम थमा देते हो ? दो रुपल्ली किराया और वह भी छः-छः महीने का बकाया । जानते हो लकड़ी का क्या भाव है । न हो मकान छोड़ जाओ ।'' आखिर किवाड़ गिर गये । रात में चौधरी उन्हें जैसे-तैसे चौखट से टिका देते । रात-भर दहशत रहती कि कहीं कोई चोर न आ जाये ।


मुहल्ले में सफे़दपोशी और इज्ज़त होने पर भी चोर के लिए घर में कुछ न था । शायद एक भी साबित कपड़ा या बरतन ले जाने के लिए चोर को न मिलता; पर चोर तो चोर है । छिनने के लिए कुछ न हो, तो भी चोर का डर तो होता ही है । वह चोर जो ठहरा !


चोर से ज्यादा फ़िक्र थी आबरू की । किवाड़ न रहने पर पर्दा ही अाबरू का रखवारा था । वह परदा भी तार-तार होते-होते एक रात आँधी में किसी भी हालत में लटकने लायक न रह गया । दूसरे दिन घर की एकमात्र पुश्तैनी चीज़ दरी दरवाज़े पर लटक गयी । मुहल्लेवालों ने देखा और चौधरी को सलाह दी-'अरे चौधरी, इस ज़माने में दरी यों-काहे खराब करोगे? बाज़ार से ला टाट का टुकडा न लटका दो! ' पीरबख्श टाट की कीमत भी आते-जाते कई दफे़ पूछ चुके थे । दो गज़ टाट आठ आने से कम में न मिल सकता था । हँसकर बोले-''होने दो क्या है? हमारे यहाँ पक्की हवेली में भी ड्योढी पर दरी का ही पर्दा रहता था । ''


कपड़े की महँगाई के इस ज़माने में घर की पाँचों औरतों के शरीर से कपड़े जीर्ण होकर यों गिर रहे थे, जैसे पेड़ अपनी छाल बदलते हैं; पर चौधरी साहब की आमदनी से दिन में एक दफे़ किसी तरह पेट भर सकने के लिए आटा के अलावा कपड़े की गुंजाइश कहाँ? खुद उन्हें नौकरी पर जाना होता । पायजा मे मे जब पैबन्द सँभालने की ताब न रही, मारकीन का एक कुर्ता-पायजामा जरूरी हो गया, पर लाचार थे ।


गिरवी रखने के लिए घर में जब कुछ भी न हो,गरीब का एक मात्र सहायक है पंजाबी खान । रहने की जगह-भर देखकर वह रुपया उधार दे सकता है । दस महीने पहले गोद के लड़के बर्कत के जन्म के समय पीरबख्श को रुपये की जरूर आ पड़ी । कहीं और कोई प्रबन्ध न हो सकने के कारण उन्होंने पंजाबी खान बबर
अलीखाँ से चार रुपये उधार ले लिये थे ।


बबर अलीखाँ का रोज़गार सितवा के उस कच्चे मुहल्ले में अच्छा-खासा चलता था । बीकानेरी मोची, वर्कशाप के मज़दूर और कभी-कभी रमजानी धोबी सभी बबर मियाँ से कर्ज लेते रहते । कई दफे़ चौधरी परिबख्श ने बबर अली को कर्ज और सूद की किश्त न मिलने पर अपने हाथ के डंडे से ऋणी का दरवाज़ा पीटते देखा था । उन्हें साहूकार और ऋणी में बीच-बचौवल भी करना पड़ा था ।
खान को वे शैतान समझते थे, लेकिन लाचार हो जाने पर उसी की शरण लेनी पड़ी । चार आना रुपया महीने पर चार रुपया कर्ज लिया । शरीफ़ खानदानी, मुसलमान भाई का ख्याल कर बबर अली ने एक रुपया माहवार की किश्त मान ली । आठ महीने में 'कर्ज अदा होना तय हुआ ।


खान की किश्त न दे सकने की हालत में अपने घर के दरवाजे़ पर फ़ज़ीहत हो जाने की बात का ख्याल कर चौधरी के रोएँ खडे़ हो जाते । सात महीने फ़ाका करके भी वे किसी तरह से किश्त देते चले गये; लेकिन जब सावन में बरसात पिछड़ गयी और बाजरा भी रुपये का तीन सेर मिलने लगा,किश्त देना संभव न रहा । खान सात तारीख की शाम को ही आया। चौधरी परिबख्श ने खान की
दाढ़ी छू और अल्ला की कसम खा एक महीने की मुआफ़ी चाही । अगले महीने एक का सवा देने का वायदा किया । खान टल गया ।


भादों में हालत और भी परेशानी की हो गयी । बच्चों की माँ की तबीयत रोज़-रोज़ गिरती जा रही थी । खाया-पिया उसके पेट में न ठहरता । पथ्य के लिए उसको गेहूँ की रोटी देना ज़रूरी हो गया। गेहूँ मुश्किल से रुपये का सिर्फ़ ढाई सेर मिलता । बीमार का जी ठहरा, कभी प्याज के टुकड़े या धनिये की खुशबू के लिए ही मचल जाता। कमी पैसे की सौंफ़, अजवायन, काले नमक की ही ज़रूरत हो, तो पैसे की कोई चीज़ मिलती ही नहीं । बाज़ार में ताँबे का नाम ही नहीं रह गया । नाहक इकन्नी निकल जाती है। चौधरी को दो रुपये महंगाई-भत्ते के मिले; पर पेशगी लेते-लेते तनख्वाह के दिन केवल चार ही रुपये हिसाब में निकले ।


बच्चे पिछले हफ्ते लगभग फ़ाके-से थे । चौधरी कभी गली से दो पैसे की चौराई खरीद लाते, कभी बाजरा उबाल सब लोग कटोरा-कटोरा-भर पी लेते । बड़ी कठिनता से मिले चार रुपयों में से सवा रुपया खान के हाथ में धर देने की हिम्मत चौधरी को न हुई ।


मिल से घर लौटते समय वे मंडी की ओर टहल गये। दो घंटे बाद जब समझा, खान टल गया होगा और अनाज की गठरी ले वे घर पहुंचे । खान के भय से दिल डूब रहा था, लेकिन दूसरी ओर चार भूखे बच्चों, उनकी माँ, दूध न उतर सकने के कारण सूखकर काँटा हो रहे गोद के बच्चे और चलने-फिरने से लाचार अपनी ज़ईफ़ माँ की भूख से बिलबिलाती सूरतें आखों के सामने नाच जातीं । धड़कते हुए हृदय से वे कहते जाते-''मौला सब देखता है, खैर करेगा ।''


सात तारीख की शाम को असफल हो खान आठ की सुबह तड़के चौधरी के मिल चले जाने से पहले ही अपना डंडा हाथ में लिये दरवाजे पर मौजूद हुआ ।


रात-भर सोच-सोचकर चौधरी ने खान के लिए बयान तैयार किया। मिल के मालिक लालाजी चार रोज के लिए बाहर गये हैं। उनके दस्तखत के बिना किसी को भी तनख्वाह नहीं मिल सकी । तनख्वाह मिलते ही वह सवा रुपया हाज़िर करेगा । माकूल वजह बताने पर भी खान बहुत देर तक गुर्राता रहा-''अम वतन चोड़ के परदेस में पड़ा है-ऐसे रुपिया चोड़ देने के वास्ते अम यहाँ नहीं आया है, अमारा भी बाल-बच्चा है । चार रोज़ में रुपिया नई देगा, तो अब तुमारा.... कर देगा ।''


पाँचवें दिन रुपया कहाँ से आ जाता ! तनख्वाह मिले अभी हफ्ता भी नहीं हुआ । मालिक ने पेशगी देने से साफ़ इनकार कर दिया । छठे दिन किस्मत से इतवार था । मिल में छुट्‌टी रहने पर भी चौधरी खान के डर से सुबह ही बाहर निकल गये । जान-पहचान के कई आदमियों के यहाँ गये । इधर-उधर की बातचीत कर
वे कहते--''अरे भाई, हो तो बीस आने पैसे तो दो-एक रोज के लिए देना । ऐसे ही ज़रूरत आ पड़ी है । ''


उत्तर मिला-''मियाँ, पैसे कहाँ इस ज़माने में! पैसे का मोल कौड़ी नहीं रह गया । हाथ में आने से पहले ही उधार में उठ गया तमाम !''


दोपहर हो गयी । खान आया भी होगा, तो इस वक्त तक बैठा नहीं रहेगा--- चौधरी ने सोचा, और घर की तरफ़ चल दिये । घर पहुँचने पर सुना खान आया था और घण्टे-भर तक डचोढी पर लटके दरी के परदे को डंडे से ठेल-ठेलकर गाली देता रहा है ! परदे की आड़ से बड़ी बीबी के बार-बार खुदा की कसम खा यकीन.दिलाने पर कि चौधरी बाहर गये हैं, रुपया लेने गये हैं, खान गाली देकर कहता-''नई, बदजात चोर बीतर में चिपा है! अम चार घंटे में पिर आता है । रुपिया लेकर जायेगा ।रुपिया नई देगा, तो उसका खाल उतारकर बाजार में बेच देगा ।...हमारा रुपिया क्या अराम का है? ''


चार घंटे से पहले ही खान की पुकार सुनाई दी--''चौदरी! '' पीरबख्श' के शरीर में बिजली-सी दौड़ गयी और वे बिलकुल निस्सत्त्व हो गये, हाथ-पैर सुन्न और गला खुश्क ।


गाली दे परदे को ठेलकर खान के दुबारा पुकारने पर चौधरी का शरीर- निर्जीवप्राय होने पर भी निश्चेष्ट न रह सका । वे उठकर बाहर आ गये । खान आग-बबूला हो रहा था--''पैसा नहीं देने का वास्ते चिपता है!... ''एक-से-एक बढ़ती हुई तीन गालियाँ एक-साथ खान के मुँह से पीरबख्श के पुरखों-पीरों के नाम निकल गयीं । इस भयंकर आघात से परिबख्श का खानदानी रक्त भड़क
उठने के बजाय और भी निर्जीव हो गया । खान के घुटने छू, अपनी मुसीबत बता वे मुआफ़ी के लिए खुशामद करने लगे ।


खान की तेजी बढ़ गयी । उसके ऊँचे स्वर से पड़ोस के मोची और मज़दूर चौधरी के दरवाजे़ के सामने इकट्‌ठे हो गये । खान क्रोध में डंडा फटकारकर कह रहा था--''पैसा नहीं देना था, लिया क्यों ? तनख्वाह किदर में जाता ? अरामी अमारा पैसा मारेगा । अम तुमारा खाल खींच लेगा.। पैसा नई है, तो घर पर परदा लटका के शरीफ़ज़ादा कैसे बनता ?.. .तुम अमको बीबी का गैना दो, बर्तन दो, कुछ तो भी दो, अम ऐसे नई जायेगा । ''


बिलकुल बेबस और लाचारी में दोनों हाथ उठा खुदा से खान के लिए दुआ माँग पीरबख्श ने कसम खायी, एक पैसा भी घर में नहीं, बर्तन भी नहीं, कपड़ा भी नहीं; खान चाहे तो बेशक उसकी खाल उतारकर बेच ले ।


खान और आग हो गया-''अम तुमारा दुआ क्या करेगा ? तुमारा खाल क्या करेगा ? उसका तो जूता भी नई बनेगा । तुमारा खाल से तो यह टाट अच्चा ।'' खान ने' ड्योढी पर लटका दरी का पर्दा झटक लिया । ड्योढी से परदा हटने के साथ ही, जैसे चौधरी के जीवन की डोर टूट गयी । वह डगमगाकर ज़मीन पर गिर पड़े ।


इस दृश्य को देख सकने की ताब चौधरी में न थी, परन्तु द्वार पर खड़ी भीड़ ने देखा-घर की लड़कियाँ और औरतें परदे के दूसरी ओर घटती घटना के आतंक से आंगन के बीचों-बीच इकट्‌ठी हो खड़ी काँप रही थीं । सहसा परदा हट जाने से औरतें ऐसे सिकुड गयीं, जैसे उनके शरीर का वस्त्र खींच लिया गया हो । वह परदा ही तो घर-भर की औरतों के शरीर का वस्त्र था । उनके शरीर पर बचे चीथड़े उनके एक-तिहाई अंग ढंकने में भी असमर्थ थे !


जाहिल भीड़ ने घृणा और शरम से आँखें फेर लीं । उस नाग्नता की झलक से खान की कठोरता भी पिघल गयी । ग्लानि से थूक, परदे को आंगन में वापिस फेंक, क्रुद्ध निराशा में उसने ''लाहौल बिला...!'' कहा और असफल लौट गया ।


भय से चीखकर ओट में हो जाने केलिए भागती हुई औरतों पर दया कर भीड़ छँट गयी । चौधरी बेसुध पड़े थे । जब उन्हें होश आया, ड्योढ़ी का परदा आंगन में सामने पड़ा था; परन्तु उसे उठाकर फिर से लटकादेने का सामर्थ्य उनमें शेष न था । शायद अब इसकी आवश्यकता भी न रही थी । परदा जिस भावना का अवलम्ब था, वह मर चुकी थी ।


- यशपाल