Sunday, May 21, 2017

JHULAN GOSWAMI BIOGRAPHY IN HINDI


झूलन गोस्वामी

महिला क्रिकेटर

मैं क्रिकेटर बनना चाहती थी,

 मगर मम्मी-पापा को समझ में नहीं आ रहा था

 कि मुङो क्रिकेट में भेजें या नहीं।

 मां को मेरा देर-सबेर घर लौटना पसंद नहीं था।

 एक दिन मैं मैच के बाद शाम को देर से घर पहुंची, 

तो उन्होंने मुङो घंटों घर के बाहर खड़ा रखा।


वह अपने इलाके की सबसे लंबी लड़की थीं। सड़क पर चलतीं, तो लोग पीछे मुड़कर जरूर देखते। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के छोटे से कस्बे चकदा में पली-बढ़ीं झूलन को बचपन में क्रिकेट का बुखार कुछ यूं चढ़ा कि बस वह जुनून बन गया। एयर इंडिया में नौकरी करने वाले पिता को क्रिकेट में खास दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि उन्होंने बेटी को कभी खेलने से नहीं रोका। मगर मां को उनका गली में लड़कों के संग गेंदबाजी करना बिल्कुल पसंद न था।

बचपन में वह पड़ोस के लड़कों के साथ सड़क पर क्रिकेट खेला करती थीं। उन दिनों वह बेहद धीमी गेंदबाजी करती थीं। लिहाजा लड़के उनकी गेंद पर आसानी से चौके-छक्के जड़ देते थे। कई बार उनका मजाक भी बनाया जाता था। टीम के लड़के उन्हें चिढ़ाते हुए कहते- झूलन, तुम तो रहने ही दो। तुम गेंद फेंकोगी, तो हमारी टीम हार जाएगी। एक दिन यह बात उनके दिल को लग गई। फैसला किया कि अब मैं तेज गेंदबाज बनकर दिखाऊंगी। तेज गेंदबाजी के गुर सीखे और लड़कों को पटखनी देने लगीं। जल्द ही झूलन की गेंदबाजी चर्चा का विषय बन गई।यह बात पिता तक पहुंची। उन्होंने सवाल किया, तो झूलन ने कहा- हां, मैं क्रिकेटर बनना चाहती हूं। प्लीज आप मुङो ट्रेनिंग दिलवाइए। यह सुनकर पिता को अच्छा नहीं लगा।
 तब झूलन 13 साल की थीं। वह चाहते थे कि बेटी पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करे। मगर बेटी क्रिकेट को करियर बनाने का इरादा बना चुकी थी। आखिरकार उन्हें बेटी की जिद माननी पड़ी। उन दिनों नदिया में क्रिकेट ट्रेनिंग के खास इंतजाम नहीं थे। लिहाजा झूलन ने कोलकाता की क्रिकेट अकादमी में ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। माता-पिता के मन में बेटी को क्रिकेटर बनाने को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं। क्रिकेट में आखिर क्या करेगी बच्ची? कैसा होगा उसका भविष्य? मगर क्रिकेट अकादमी पहुंचकर उनकी सारी आशंकाएं दूर हो गईं।

 झूलन बताती हैं- कोच सर ने मम्मी-पापा को समझाया कि अब लड़कियां भी क्रिकेट खेलती हैं। आप चिंता न करें। आपकी बेटी बहुत बढ़िया गेंदबाज है। एक दिन वह आपका नाम रोशन करेगी। कोच की बात सुनने के बाद मम्मी-पापा की फिक्र काफी हद तक कम हो गई।खेल के साथ पढ़ाई भी करनी थी। इसीलिए तय हुआ कि झूलन हफ्ते में सिर्फ तीन दिन कोलकाता जाएंगी ट्रेनिंग के लिए। सुबह पांच बजे चकदा से लोकल ट्रेन पकड़कर कोलकाता स्टेशन पहुंचतीं। इसके बाद सुबह साढ़े सात बजे तक बस से क्रिकेट अकादमी पहुंचना होता था। दो घंटे के अभ्यास के बाद फिर बस और ट्रेन से वापस घर पहुंचतीं और किताबें लेकर स्कूल के लिए चल पड़तीं। शुरुआत में पापा संग जाते थे। बाद में वह अकेले ही सफर करने लगीं। 

झूलन बताती हैं- घर से अकादमी तक आने-जाने में चार घंटे बरबाद होते थे। काफी थकावट भी होती थी। मगर इसने मुङो शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत मजबूत बना दिया। आप जितना संघर्ष करते हैं, आपकी क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है। ट्रेनिंग के दौरान कोच ने उनकी तेज गेंदबाजी पर खास फोकस किया। पांच फुट 11 इंच लंबा कद उनके लिए वरदान साबित हुआ। समय के साथ अभ्यास के घंटे बढ़ते गए। स्कूल जाना कम हो गया। अब क्रिकेट जुनून बन चुका था।
 झूलन बताती हैं- मुङो जमे हुए बल्लेबाज को आउट करने में बड़ा मजा आता था। सच कहूं, तो लंबे कद के कारण गेंद को उछाल देने में काफी आसानी होती है। इसलिए मेरी राह आसान हो गई।कड़ी मेहनत रंग लाई। लोकल टीमों के साथ कुछ मैच खेलने के बाद बंगाल की महिला क्रिकेट टीम में उनका चयन हो गया। बेटी मशहूर हो रही थी, पर मां के लिए अब भी वह छोटी बच्ची थीं। जब तक वह घर लौटकर नहीं आ जातीं, मां को चैन नहीं पड़ता था।

 एक दिन वह मैच खेलकर देर से घर पहुंचीं, तो हंगामा हो गया। झूलन बताती हैं- मैं देर से पहुंची, तो मां बहुत नाराज हुईं। उन्होंने दरवाजा नहीं खोला। मुङो कई घंटे घर के बाहर खड़े रहना पड़ा। तब से मैंने तय किया कि मैं कभी मां को बिना बताए घर देर से नहीं लौटूंगी। उन्हें मेरी फिक्र थी, इसलिए उनका गुस्सा जायज था।

झूलन ने 18 साल की उम्र में अपना पहला टेस्ट मैच लखनऊ में इंग्लैंड के खिलाफ खेला। इसके बाद अगले साल चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ पहला वन-डे अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का मौका मिला। सबसे बड़ी कामयाबी मिली 2006 में, जब उनकी बेहतरीन गेंदबाजी के बल पर इंडियन टीम ने एक टेस्ट मैच में इंग्लैंड को हराकर बड़ी जीत हासिल की।
 इस मैच में उन्होंने 78 रन देकर 10 विकेट हासिल किए। इसके बाद तेज गेंदबाजी की वजह से लोग उन्हें ‘नदिया एक्सप्रेस’ कहने लगे। 2007 में उन्हें आईसीसी की तरफ से महिला क्रिकेटर ऑफ द ईयर अवॉर्ड दिया गया। वर्ष 2010 में अजरुन अवॉर्ड और 2012 में पद्मश्री से सम्मानित की गईं। उनकी गेंदबाजी की गति 120 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसलिए उन्हें दुनिया की सबसे तेज महिला गेंदबाज होने का रुतबा हासिल है। हाल में उन्होंने एक नया रिकॉर्ड अपने नाम किया है। अब वह दुनिया की सबसे ज्यादा विकेट लेने वाली महिला क्रिकेटर बन गई हैं।

साभार - हिंदुस्तान अख़बार 

Friday, May 19, 2017

CHHOTA JADOOGAR JAYSHANKAR PRASAD

छोटा जादूगर

जयशंकर प्रसाद

उसके मुँह पर तिरस्‍कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ''तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्‍य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्‍नता होती!"

कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्‍सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्‍ते थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्‍यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपन्‍नता थी।

मैंने पूछा, ''क्‍यों जी, तुमने इसमें क्‍या देखा?"

''मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्‍छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्‍मा है। उससे अच्‍छा तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।'' उसने बड़ी प्रगल्‍भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रूकावट न थी।

मैंने पूछा, ''और उस परदे में क्‍या है? वहाँ तुम गए थे?"

''नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।''

मैंने कहा, ''तो चलो, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ।'' मैंने मन-ही-मन कहा, 'भाई! आज के तुम्‍हीं मित्र रहे।'

उसने कहा, ''वहाँ जाकर क्‍या कीजिएगा? चलिए, निशाना लगाया जाए।''

मैंने उससे सहमत होकर कहा, ''तो फिर चलो, पहले शरबत पी लिया जाए।'' उसने स्‍वीकार-सूचक सिर हिला दिया।

मनुष्‍यों की भीड़ से जाड़े की संध्‍या भी वहाँ गरम हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा, ''तुम्‍हारे घर में और कौन हैं?"

''माँ और बाबूजी।''

''उन्‍होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?"

''बाबूजी जेल में हैं।''

''क्‍यों?"

''देश के लिए।'' वह गर्व से बोला।

''और तुम्‍हारी माँ?"

''वह बीमार है।''

''और तुम तमाशा देख रहे हो?"

उसके मुँह पर तिरस्‍कार की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ''तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्‍य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्‍नता होती!"

मैं आश्‍चर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।

''हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी! माँजी बीमार हैं, इसीलिए मैं नहीं गया।''

''कहाँ?"

''जेल में! जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्‍यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।''

मैंने दीर्घ नि:श्‍वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्‍यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा, ''अच्‍छा चलो, निशाना लगाया जाए।''

हम दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए।

वह निकला पक्‍का निशानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखनेवाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिये गए।

लड़के ने कहा, ''बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए, मैं चलता हूँ।'' वह नौ-दो ग्‍यारह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा, 'इतनी जल्‍दी आँख बदल गई!"

में घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्‍मात् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा, ''बाबूजी!"

मैंने पूछा, ''कौन?"

''मैं हूँ छोटा जादूगर।''

+

कलकत्‍ते के सुरम्‍य बोटैनिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला, साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्‍सी से बँधी हुई थी। मस्‍तानी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा -

''बाबूजी, नमस्‍ते! आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?"

''नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।''

''फिर इसके बाद क्‍या गाना-बजाना होगा, बाबूजी?"

''नहीं जी, तुमको....'' क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा, ''दिखलाओ जी, तुम तो अच्‍छे आए। भला, कुछ मन तो बहले।'' मैं चुप हो गया, क्‍योंकि श्रीमतीजी की वाणी में वह माँ की-सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।

उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्‍ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्‍याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते लोट-पोट हो गए।

मैं सोच रहा था। बालक को आवश्‍यकता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।

ताश के सब पत्‍ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा, ''अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएँगे।''

श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रूपया दे दिया। वह उछल उठा।

मैंने कहा, ''लड़के!"

''छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।''

मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा, ''अच्‍छा, तुम इस रुपए से क्‍या करोगे?"

''पहले भरपेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कंबल लूँगा।''

मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा, 'ओह! कितना स्‍वार्थी हूँ मैं। उसके एक रुपया पाने पर मैं ईर्ष्‍या करने लगा था न!"

वह नमस्‍कार करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।

उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्‍या साँय-साँय करने लगी थी। अस्‍ताचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शांत वातावरण था। हम लोग धीरे-धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।

रह-रहकर छोटा जादूगर स्‍मरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा, ''तुम यहाँ कहाँ?"

''मेरी माँ यहीं है न! अब उसे अस्‍पताल वालों ने निकाल दिया है।'' मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्‍त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।

छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा, ''माँ!"

मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।

+

बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्‍ते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्‍छा हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी.... मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्‍द लौट आना था।

दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्‍ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्‍याह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्‍नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्‍टा कर रहा था, तब जैसे स्‍वयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्‍चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण भर के लिए स्‍फूर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा, ''आज तुम्‍हारा खेल जमा क्‍यों नहीं?"

''माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है।'' अविचल भाव से उसने कहा।

''तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए!" मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्‍य के सुख-दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है।

उसके मुँह पर वहीं परिचित तिरस्‍कार की रेखा फूट पड़ी।

उसने कहा, ''क्‍यों न आता?"

और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।

क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा, ''जल्‍दी चलो।'' मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।

कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्‍त्री के मुँह से, 'बे...' निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्‍तब्‍ध था। उस उज्‍ज्‍वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्‍य करने लगा।


Thursday, May 18, 2017

KISHORE KUMAR BIOGRAPHY IN HINDI



एक हादसा जिसने किशोर को 

सुरीला बना दिया

KISHORE KUMAR BIOGRAPHY IN HINDI


उनका बचपन से गला खराब रहता था और लगातार खांसते रहते थे | 
बचपन में किशोर कुमार के साथ एक घटना हुयी
 जिसमे उनके पैर की एक अंगुली कट गयी थी | 
अब दर्द के मारे किशोर कुमार का बुरा हाल हो गया था
 और उस समय ऐसी दवाईया नही थी जो दर्द को कम कर सके | 
अब दर्द के कारण दिन के अधिकतर समय रोते रहते थे और दवा देने के बाद चुप होते थे | 
अब एक महीने तक उनके रोने का सिलसिला युही चलता रहा 
और इसी कारण बचपन से खासते रहने वाले किशोर कुमार का गला साफ हो गया |
 उसके बाद उन्होंने गाना शुरू किया |








'खंडवा के किशोर कुमार!' वो किसी जनसभा या महफिलों में जाते थे तो खुद का परिचय इसी नाम से कराते। उन्हें अपने घर मध्यप्रदेश के खंडवा से वैसा ही लगाव था जैसा किसी बच्चे को अपनी मां से होता है। उनका असल नाम आभास कुमार गांगुली था। फिल्मी दुनिया ने उनका नाम बदल कर किशोर कुमार कर दिया। किशोर कुमार एकांतवासी थे। वे अपने में ही मगन रहना पसंद करते थे। उनकी अपनी ही कहानियां थीं, अपने ही गढ़े कुछ दोस्त थे, जिनके साथ खेलना उन्हें खुश कर देता था। हम उन्हें जिन दो रूपों के लिए याद करते हैं, उनमें पहला है गायक और दूजा एक्टर।

जीवन परिचय 


 किशोर कुमार (Kishore Kumar) का जन्म मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में गांगुली परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम कुंजालाल गांगुली और माता का नाम गौरी देवी थे | किशोर कुमार का बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था और वो एक बहुत सम्पन्न परिवार से थे | किशोर कुमार अपने भाई बहनों में सबसे छोटे थे | उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार एक महान और मशहूर अभिनेता रह चुके थे | अशोक कुमार से छोटी उनकी बहन और उनसे छोटा एक भाई अनूप कुमार था | जब किशोर कुमार फिल्मो में अभिनेता बन चुके थे तब किशोर कुमार बालक थे |

 वो हादसा, जिसने किशोर को सुरीला बना दिया

अशोक कुमार बताते है कि उनका बचपन से गला खराब रहता था और लगातार खांसते रहते थे | बचपन में किशोर कुमार के साथ एक घटना हुयी जिसमे उनके पैर की एक अंगुली कट गयी थी | अब दर्द के मारे किशोर कुमार का बुरा हाल हो गया था और उस समय ऐसी दवाईया नही थी जो दर्द को कम कर सके | अब दर्द के कारण दिन के अधिकतर समय रोते रहते थे और दवा देने के बाद चुप होते थे | अब एक महीने तक उनके रोने का सिलसिला युही चलता रहा और इसी कारण बचपन से खासते रहने वाले किशोर कुमार का गला साफ हो गया | उसके बाद उन्होंने गाना शुरू किया | 
अपनी आवाज से खुश किशोर कुमार मस्तमगन होकर गाते रहते थे। ऐसे ही एक दिन अशोक कुमार से मिलने केएल सहगल आये, उन्होंने अशोक से पूछा कि ये कौन गा रहा है। अशोक ने बताया कि मेरा छोटा भाई है और उसे गाने का बहुत शौक है। इसके बाद धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया में लोग किशोर कुमार की आवाज के पीछे पागल होने लगे।


के एल  सेहगल के फैन


किशोर कुमार बचपन से ही  के एल  सेहगल के फैन थे और उनको ही अपनी प्रेरणा बनाकर गाते रहते थे | उनके बड़े भाई उनको अक्सर चिढाया करते थे कि वो सेहगल की तरह नही गा सकते है | अब किशोर कुमार अपने बड़े भाई की मदद से बॉम्बे टॉकीज में Chorus Singer के रूप में अपने करियर की शुरवात की | किशोर कुमार पहली बार अपने बड़े भाई की फिल्म शिकारी (1946 ) में नजर आये जहा उनको अभिनय करने का मौका मिला | संगीतकार खेमचंद ने उनको पहले बार फिल्मो में गाना गाने का मौका दिया और उन्होंने 1948 में देवानंद की फिल्म जिद्दी के लिए “मरने की दुआए क्यों मांगू ” गाना गाया | उनके इस गाने के बाद फिल्मो के कई ऑफर आये लेकिन उस समय फिल्मो में आने के लिए ज्यादा सीरियस नही थे |

1949 में वो मुंबई में रहने लग गये और 1951 में आयी आन्दोलन फिल्म में उन्हें मुख्य अभिनेता का किरदार निभाने को मिला | अपने बड़े भाई की वजह से उनको फिल्मो के कई ऑफर आये लेकिन वो गायक बनने में ज्यादा रूचि रखते थे | अशोक कुमार जो उस समय तक एक मंझे हुए अभिनेता बन गये थे ,चाहते थे कि किशोर कुमार भी उनकी तरह अच्छा अभिनेता बने | अब किशोर कुमार अभिनय तो करते थे लेकिन उनको कॉमेडी रोल करना पसंद था |
फ़िल्मी सफ़र 


 किशोर कुमार ने संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा नही ली थी इसलिए संगीतकार उनको गाने में लेने के लिए कतराते थे फिर भी एक बार संगीतकारसलील चौधरी ने उनकी आवाज सुनकर उनको गाने के कई मौके दिए थे | इसके बाद किशोर कुमार ने न्यू दिल्ली , आशा , चलती का नाम गाडी , हाफ टिकट , गंगा की लहरें और पड़ोसन जैसी फिल्मो में हास्य अभिनेता का काम किया | चलती का नाम गाडी उनकी अभिनय के तौर पर एक सफल फिल्म रही जिसमे कार मेकेनिक के रूप में उनके और मधुबाला के बीच रोमांस को दिखाया गया है | इस फिल्म में उनका गाना “एक लडकी भीगी भागी सी ” बहुत लोकप्रिय हुआ था |

संगीतकार SD बर्मन को किशोर कुमार के टैलेंट को समझने और निखारने का श्रेय जाता है जिन्होंने किशोर कुमार को सेहगल की आवाज की नकल करने के बजाय अपनी खुद की धुन निकालने को कहा | उनसे प्रेरित होकर उन्होंने अपनी खुद की कला “युड्ली” को इजाद किया जो उन्होंने विदेशी संगीतकारो से सुन रखा था | बर्मन ने किशोर कुमार  को कई फिल्मो में काम दिलवाया जिसमे कुछ प्रमुख फिल्मे मुनीमजी , टैक्सी ड्राईवर , House No. 44, फुन्तूश , नौ दो ग्यारह , पेइंग गेस्ट , गाइड , Jewel Thief , प्रेम पुजारी और तेरे मेरे सपने थी | उनके बर्मन साहब के लिए गाय गानों में “माना जनाब ने पुकारा नही ” “हम है राही प्यार के ” “ऐ मेरी टोपी पलट के आ ” “हाल कैसा है जनाब का ” जैसे लोकप्रिय गाने गाये |

1961 में फिल्म झुमरू में उन्हों निर्माता और निर्देशन का काम भी किया | इसके बाद उन्होंने कई गाने गाये लेकिन उस समय तक उनका ज्यादा नाम नही था | 1969 में उन्होंने आराधना फिल्म में “मेरे सपनो की रानी ” गाना गाया जिसने उनको एक स्टार बना दिया और इसी फिल्म के गाने “रूप तेरा मस्ताना ” के लिए उनको पहला फिल्मफेर अवार्ड भी मिला | 1970 और 1980 का दशक उनके लिए स्वर्णिम दशक रहा था जिसमे उन्होंने मशहूर अभिनेताओ राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन , धर्मेन्द्र ,जीतेंद्र ,संजीव कुमार ,देवानंद ,संजय दत्त ,अनिल कपूर ,दिलीप कुमार ,प्राण ,रजनीकान्त ,गोविंदा और जेकी श्राफ के साथ काम किया |किशोर कुमार ने मो.रफी , मुकेश , लता मंगेशकर , आशा भोंसले जैसे दिग्गज गायकों के साथ काम किया | 13 अक्टूबर 1987 को किशोर कुमार की मुत्यु हो गयी और संयोग से उस दिन उनके बड़े भाई अशोक कुमार का जन्मदिन था |


किशोर कुमार ने चार शादिया की थी | उनकी पहली पत्नी गायक और अभिनेत्री रुमा घोष थी और उनकी ये शादी 1950 से 1958 तक चली उनकी दुसरी पत्नी मधुबाला थी जिसके लिए उन्होंने मुस्लिम धर्म परिवर्तन कर दिया था लेकिन उनके परिवार वालो ने कभी मधुबाला को नही अपनाया| 1969 में मधुबाला की मृत्यु हो गयी और उन्होंने योगिता बाली से शादी कर ली जो केवल दो वर्ष 1976 और 1978 तक चली | किशोर कुमार ने अंतिम शादी लीना चंदावर्कर से की और 1980 से लेकर अपनी मौत तक उनसे शादी बनी रही | उनके दो पुत्र है रुमा घोष से उनको अमित कुमार और लीना चंदावर्कर से सुमित कुमार थे |  किशोर कुमार की मौत के बाद भी उनके गाने आज भी हमारे दिलो में जीवित है |

एक्टर किशोर कुमार की कहानी

असल किशोर कुमार को जानना है, उनकी बेचैनी को समझना है, उनके खंडवा प्रेम की गहराई में उतरना है तो उनका ये दिलचस्प इंटरव्यू पढ़ें। इसमें वो ये भी बता रहे हैं, कि कैसे लोगों ने उन्हें एक एक्टर बना दिया जबकि वो अभिनय करना ही नहीं चाहते थे। किशोर कुमार का ये इंटरव्यू प्रीतिश नंदी ने लिया था, जो पहली बार इलेस्ट्रेटेड वीकली के अप्रैल 1985 के अंक में छपा था। इसका हिन्दी अनुवाद रंगनाथ सिंह ने किया है...

मैंने सुना है कि आप बंबई छोड़ कर खंडवा जा रहे हैं?

किशोर: इस अहमक, मित्रविहीन शहर में कौन रह सकता है, जहां हर आदमी हर वक्त आपका शोषण करना चाहता है? क्या तुम यहां किसी का भरोसा कर सकते हो? क्या कोई भरोसेमंद है यहां? क्या ऐसा कोई दोस्त है यहां जिस पर तुम भरोसा कर सकते हो? मैंने तय कर लिया है कि मैं इस तुच्छ चूहा-दौड़ से बाहर निकलूंगा और वैसे ही जीऊंगा जैसे मैं जीना चाहता था, अपने पैतृक निवास खंडवा में। अपने पुरखों की जमीन पर। इस बदसूरत शहर में कौन मरना चाहता है!!

आप यहां आये ही क्यों?

किशोर: मैं अपने भाई अशोक कुमार से मिलने आया था। उन दिनों वो बहुत बड़े स्टार थे। मुझे लगा कि वो मुझे केएल सहगल से मिलवा सकते हैं, जो मेरे सबसे बड़े आदर्श थे। लोग कहते हैं कि वो नाक से गाते थे, लेकिन क्या हुआ? वो एक महान गायक थे। सबसे महान।

ऐसी खबर है कि आप सहगल के प्रसिद्ध गानों का एक एलबम तैयार करने की योजना बना रहे हैं?

किशोर: मुझसे कहा गया था, मैंने मना कर दिया। उन्हें अप्रचलित करने की कोशिश मुझे क्यों करनी चाहिए? उन्हें हमारी स्मृति में बसे रहने दीजिए। उनके गीतों को उनके गीत ही रहने दीजिए। एक भी व्यक्ति को ये कहने का मौका मत दीजिए कि किशोर कुमार उनसे अच्छा गाता है।

यदि आपको बॉम्बे पसंद नहीं था, तो आप यहां रुके क्यों? प्रसिद्धि के लिए? पैसे के लिए?

किशोर: मैं यहां फंस गया था। मैं सिर्फ गाना चाहता था। कभी भी अभिनय करना नहीं चाहता था। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों की कृपा से मुझे अभिनय करने को कहा गया। मुझे हर क्षण इससे नफरत थी और मैंने इससे बचने का हर संभव तरीका आजमाया। मैं सिरफिरा दिखने के लिए अपनी लाइनें गड़बड़ कर देता था, अपना सिर मुंड़वा दिया, मुसीबत पैदा की, दुखद दृश्यों के बीच में बलबलाने लगता था, जो मुझे किसी फिल्म में बीना राय को कहना था वो मैंने एक दूसरी फिल्म में मीना कुमारी को कह दिया– लेकिन फिर भी उन्होंने मुझे जाने नहीं दिया। मैं चीखा, चिल्लाया, बौड़म बन गया। लेकिन किसे परवाह थी? उन्होंने तो बस तय कर लिया था कि मुझे स्टार बनाना है।

क्यों?

किशोर: क्योंकि मैं दादामुनि का भाई था और वह महान हीरो थे।

लेकिन आप सफल हुए

किशोर: बेशक मैं हुआ। दिलीप कुमार के बाद मैं सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला हीरो था। उन दिनों मैं इतनी फिल्में कर रहा था, कि मुझे एक सेट से दूसरे सेट पर जाने के बच ही कपड़ने बदलने होते थे। जरा कल्पना कीजिए, एक सेट से दूसरे सेट तक जाते हुए मेरी शर्ट उड़ रही है, मेरी पैंट गिर रही है, मेरा विग बाहर निकल रहा है। बहुत बार मैं अपनी लाइनें मिला देता था और रुमानियत वाले दृश्य में गुस्सा दिखता था या तेज लड़ाई के बीच रुमानियत। ये बहुत बुरा था और मुझे इससे नफरत थी। इसने स्कूल के दिनों के दुस्वप्न जगा दिये। निर्देशक स्कूल टीचर जैसे ही थे। ये करो, वो करो, ये मत करो, वो मत करो। मुझे इससे डर लगता था। इसीलिए मैं अक्सर भाग जाता था।

खैर, आप अपने निर्देशकों और निर्माताओं को परेशान करने के लिए बदनाम थे। ऐसा क्यों?

किशोर: बकवास। वे मुझे परेशान करते थे। आप सोचते हैं कि वो मेरी परवाह करते थे? वो मेरी परवाह इसलिए करते थे, क्योंकि मैं बिकता था। मेरे बुरे दिनों में किसने मेरी परवाह की? इस धंधे में कौन किसी की परवाह करता है?

इसीलिए आप एकांतजीवी हो गये?

किशोर: देखिए, मैं सिगरेट नहीं पीता, शराब नहीं पीता, घूमता-फिरता नहीं, पार्टियों में नहीं जाता, अगर ये सब मुझे एकांतजीवी बनाता है, तो ठीक है। मैं इसी तरह खुश हूं। मैं काम पर जाता हूं और सीधे घर आता हूं। अपनी भुतहा फिल्में देखने, अपने भूतों के संग खेलने, अपने पेड़ों से बातें करने, गाना गाने। इस लालची संसार में कोई भी रचनात्मक व्यक्ति एकांतजीवी होने के लिए बाध्य है। आप मुझसे ये हक कैसे छीन सकते हैं।

आपके ज्यादा दोस्त नहीं हैं?

किशोर: एक भी नहीं।

यह तो काफी चालू बात हो गयी...

किशोर: लोगों से मुझे ऊब होती है। फिल्म के लोग मुझे खासतौर पर बोर करते हैं। मैं पेड़ों से बातें करना पसंद करता हूं।

इसका मतलब आपको प्रकृति पसंद है?

किशोर: इसीलिए तो मैं खंडवा जाना चाहता हूं। यहां मेरा प्रकृति से संबंध खत्म हो गया है। मैंने अपने बंगले के चारों तरफ नहर खोदने की कोशिश की थी, जिससे मैं उसमें गंडोला चला सकूं। जब मेरे आदमी खुदाई कर रहे थे, तो नगर महापालिका वाले बंदे बैठे रहते थे, देखते थे और ना-ना में अपनी गर्दन हिलाते रहते थे। लेकिन ये काम नहीं आया। एक दिन किसी को एक हाथ का कंकाल मिला, एड़ियां मिलीं। उसके बाद कोई खुदाई करने को तैयार नहीं था। मेरा दूसरा भाई अनूप गंगाजल छिड़कने लगा, मंत्र पढ़ने लगा। उसने सोचा कि ये घर कब्रिस्तान पर बना है। हो सकता ये बना हो, लेकिन मैंने अपने घर को वेनिस जैसा बनाने का मौका खो दिया।

लोगों ने सोचा होगा कि आप पागल हैं! दरअसल, लोग ऐसा ही सोचते हैं।

किशोर: कौन कहता है, मैं पागल हूं? दुनिया पागल है, मैं नहीं।

यहां सुने किशोर का वो फंटास्टिक गीत, जिसे गाना किसी भी सिंगर के लिए बहुत मुश्किल होगा, लेकिन लोगों ने इस गाने को हल्के में ले लिया...
 लोगों ने सोचा, कि किशोर ने खेल-खेल में कोई गीत गा दिया...

साभार -YOURSTORY.COM

Monday, May 15, 2017

NIMAN VICHAR




नीमन विचार (QUOTES IN BHOJPURI)





अबर आदमी से दुश्मनी जादे खतरनाक होखेला 

काहे से की ऊ ओह समय वर करेला 

जेकरा बारे में हमनी के कभी सोच भी ना सकीला सन


ABAR AADMI SE DUSHMANI 
JADE KHATARNAK HOKHE
KAHE SE KI U OH SAMAY WAR KARELA
 JEKRA BARE ME KABHI SOCH BHI NA SAKILA SAN




NIMAN VICHAR


नीमन विचार (QUOTES IN BHOJPURI)

बकलोल से तारीफ सुनला के जगह

 बुद्धिमान से डाट सुनल  ज्यादा नीमन होखेला 




BAKLOL SE TARIF SUNLA KE JAGAH
 BUDHIMAN SE DANT SUNAL JYADA NIMAN HOKHELA